Rajasthan

कारगिल युद्ध में साहस की अनोखी मिसाल! जयराम सिंह ने मौत से लड़कर तिरंगा फहराया, पढ़िए वीर चक्र विजेता की कहानी

सीकर. राजस्थान की वीरभूमि शेखावाटी हमेशा से देश की सीमाओं की ढाल रही है. इसी धरती ने ऐसे योद्धा पैदा किए जिन्होंने मौत को भी मात देकर तिरंगे को हमेशा ऊंचा रखा. वॉरियर ऑफ इंडिया सीरीज के तहत आज हम आपको राजपूताना राइफल्स के नायक जयराम सिंह की साहसिक कहानी बताएंगे, जिन्होंने 1999 के कारगिल युद्ध में दुश्मनों के बंकर ध्वस्त करने से लेकर जख्मी हालत में भी अपनी कंपनी को बचाने तक अद्भुत शौर्य दिखाया.

ह कहानी सिर्फ एक सैनिक की नहीं बल्कि भूखे-प्यासे, ठंड और मौत से लड़ते हुए मातृभूमि के लिए हर सांस समर्पित कर देने वाले योद्धा की है, जिसकी बहादुरी के किस्से आज भी सुनाए जाते हैं. इनके पराक्रम और बहादुरी के लिए देश के तीसरे सर्वोच्च वीरता पुरस्कार वीरचक्र से सम्मानित किया गया.

19 साल की उम्र में सेना में भर्ती हुए जयराम

सीकर जिले के नीमकाथाना उपखंड के डाबला गांव में किसान परिवार में जयराम का जन्म हुआ, वे बचपन से ही फौलादी हिम्मत वाले थे. गांव की गलियों में खेलते हुए उनका सपना सिर्फ एक था, एक दिन भारत की वर्दी पहननी है और दुश्मन को करारा जवाब देना है. इसी सपने को पूरा करने के लिए वे महज 19 साल की उम्र में 1997 में वे सेना में भर्ती हो गए. इसके बाद बाद वे देश की सरहदों की रक्षा करने लगे. करीब दो साल बाद वो पल आया जिसमें उन्हें अपनी बहादुरी और साहस दिखाने का मौका मिला.

पहाड़ी, बर्फ, भूख और हर ओर दुश्मन नजर आ रहे थे

मई 1999 कश्मीर की वादियों में चारों ओर बर्फ ही बर्फ थी. कड़ाके की ठंड और पहाड़ी क्षेत्र का फायदा उठाकर पाकिस्तान ने टाइगर हिल, तोलोलिंग और आसपास की चोटियों पर कब्जा कर लिया था. यहां भारतीय सेना के जवान गाड़ियों से जाते थे. पाकिस्तान दुश्मनों से लड़ने के लिए राजपूताना राइफल्स के नायक जयराम सिंह और सेना के दर्जनों जवान रवाना हुए. यहां पहुंचने के लिए गाड़ियों की लाइट बंद रखनी पड़ती थी. दुश्मन हर रास्ते पर घात लगाए बैठा था, दिन में चढ़ाई संभव नहीं थी. रात को ही आगे बढ़ना होता. प्यास लगती तो बर्फ पिघलाकर पानी पीते. बैग में थोड़े से ड्राई फ्रूट होते, बस वही पेट भरने का सहारा था, हर कदम मौत के साये में उठता था.

चढ़ाई के दौरान घंटों लेटे रहना पड़ता था

टाइगर हिल और तोलोलिंग पर चढ़ाई के दौरान कई जवान कई घंटे लेटे रहते थे, उन्हें उठने भी नहीं दिया जाता था. ताकि दुश्मन की नजर उन पर न पड़ें. इस दौरान दुश्मन तक पहुंचने में भारत की कई कोशिशें नाकाम हो चुकी थी. दुश्मन ऊंचाई पर था. उनके लिए हमला करना बहुत आसान था, वहीं, भारतीय जवानों के लिए मुश्किल था. दोनों ओर से हो रही गोलीबारी से कई भारतीय जवानों की जान जा चुकी थी. भारतीय सैनिकों के शव भी पाकिस्तानी गोलाबारी के कारण करीब जाकर उठाए नहीं जा रहे थे. यहां भारतीय जवानों के चार बड़े अटैक फेल हो चुके थे, लेकिन भारतीय सेना के जवान पीछे नहीं हटे.

इस तरह जवानों ने तोलोलिंग पर फहराया तिरंगा

12 जून की रात अल्फा कंपनी के जयराम और दूसरे जवानों ने कवर फायर किया और डेल्टा कंपनी के जवान चुपचाप आगे बढ़ते चले गए. तभी अंधेरे को चीरती दुश्मन की आवाज आई अल्लाह-हू-अकबर और उसी क्षण भारतीय फौज की गूंज ने आसमान कंपा दिया. राजा रामचंद्र की जय यह सिर्फ नारा नहीं बल्कि हमला बोलने की चेतावनी थी. सुबह 6 बजे तक भीषण लड़ाई के बाद भारतीय सेना ने तोलोलिंग पर तिरंगा फहरा दिया, यह कारगिल का टर्निंग पॉइंट था.

जयराम के पैर में लगी गोली पर नहीं रुके कदम

तोलोलिंग जीतने के बाद अगला लक्ष्य था थ्रीपिंपल पोस्ट, जहां से दुश्मन लगातार गोलाबारी कर रहा था. 27 जून की रात 8 बजे हमला शुरू हुआ. अचानक एक जवान रस्सियों में उलझकर गिरा और फिर चारों तरफ से पाकिस्तानी गोलियों की बौछार होने लगी. वह दस मिनट नर्क जैसा था. लेकिन हम रुके नहीं. रात 1:30 बजे तक लड़ाई चल. उस मोड़ पर नायक जयराम सिंह और अन्य जवान वहां पहुंच गए, जहां से चढ़ाई एकदम खड़ी और रास्ता संकरा था. इस दौरान नायक जयराम सिंह के पलटन के सभी साथी शहीद हो गए, अब वे अकेले बचे थे और ऑपरेशन की पूरी जिम्मेदारी उन पर पर थी. इसके बाद उन्होंने खुद को पत्थरों की ओट में छुपाया और गोलियां बरसाने लगे. दुश्मनों के एक के बाद शव गिरते चले गए. फायरिंग रुकी तो वे ऊपर पहुंचे, वहां से दुश्मन का सफाया हो चुका था.

इसके बाद कवर देने के लिए आई दूसरी टुकड़ी आई और अंत में थ्रीपिंपल पर कब्जा कर लिया गया. इसी लड़ाई में नायक जयराम सिंह डाबला के पैर के घुटने में गोली लगी, जो आरपार निकल चुकी थी. खून बहता रहा लेकिन उन्होंने हार नहीं मानी. उनके पास वायरलेस था, इसलिए गोली लगी होने के बावजूद वे नाले में उतरकर वायरलेस लेकर ऊपर चढ़े, ताकि घायल जवानों का रेस्क्यू के लिए टीम बुलाईजा का सके. इसके बाद वे चोटी पर पहुंचे और गहरी सांस ली, युद्ध खत्म हो चुका था. भारतीय सेवा ने पाकिस्तान दुश्मनों को हराकर टाइगर हिल और तोलोलिंग को जीत लिया था.

वीर चक्र से किया गया सम्मानित

युद्ध खत्म होने के बाद नायक जयराम सिंह का ईलाज चला, शारीरिक रूप से कमजोर होने के बाद सेवा के अधिकारियों ने उन्हें रिटायर करने का फैसला लिया. वहीं, उनके अदम्य साहस और वीरता के लिए भारतीय सेवा ने उन्हें वीर चक्र से सम्मानित किया. कारगिल का युद्ध जितने के बाद नायक जयराम सिंह अपने गांव वापस आ गए.

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