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Shayar and Poet Aalok Shrivastava Interview Aameen by Aalok Shrivastava Movies and Hindi Ghazals – रचनाकार को राजनीति की गोद में जाकर नहीं बैठना चाहिए

प्रसिद्ध शायर और पत्रकार आलोक श्रीवास्तव का चर्चित गजल संग्रह ‘आमीन’ नए रूप-रंग और कलेवर में अब पेंगुइन बुक्स से छपकर आया है. इस बार विश्व पुस्तक मेला में ‘आमीन’ का लोकार्पण किया गया. इस अवसर पर आलोक श्रीवास्तव से उनकी इस पुस्तक सहित कई मुद्दों पर विस्तार से चर्चा हुई. प्रस्तुत हैं इस चर्चा के चुनिंदा अंश-

पत्रकारिता की दुनिया में धमाल मचाया, फिल्मों में अलग पहचान बनाई, गीत-गज़ल में भी एक मुकाम पाने वाले आलोक श्रीवास्तव के व्यक्तित्व को किस फ्रेम में रखकर देखा जाए, इस सवाल पर वह कहते हैं- आपके दोस्त के तौर पर! जो एक सहाफी भी है, जो शायर भी है लेकिन जो कुछ है वह थोड़ा-थोड़ा है. लर्निंग की स्टेज पर, सीख रहा है सब कुछ.

पाठकों को लेकर तमाम तरह की बातें कही जाती हैं कि अब पुस्तक पढ़ने वाले कम हो रहे हैं, इस सवाल पर आलोक कहते हैं- कहा जाता है कि पढ़ने वाले कम हो रहे हैं, लेकिन मुझे तो कहीं कोई कमी नजर नहीं आती है. हालांकि कुछ फर्क पड़ता है सुविधाजनक तरीकों से. जब कोई चीज आपको ऑनलाइन मिल जाती है तो आप उसे खोजने बाजार तक नहीं जाते हैं. इस बार पुस्तक मेला में उमड़ी भीड़ को देखकर यह कतई नहीं लगता कि पढ़ने वाले कम हो रहे हैं.

इसलिए पाठकों को लेकर मुझे कभी निराशा नहीं होती. हां, किताबों के मामले में हम सोशल मीडिया को तोहमत देते हैं, लेकिन मुझे लगता है कि सोशल मीडिया पर पढ़ने वाले भी बढ़े हैं. केवल कैनवास बदल गया है. कागज से आप स्क्रीन पर आ गए हैं. पढ़ने वालों की कहीं कोई कमी नहीं है.

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साहित्य और फिल्मी दुनिया के बीच ऐसा आरोप-प्रत्यारोप लगता रहता है कि फिल्मी दुनिया वाले साहित्य, खासकर हिंदी भाषा को बिगाड़ रहे हैं, जबकि फिल्मी दुनिया वाले कहते हैं कि फिल्में हिंदी को वैश्विक फलक तक पहुंचा रही हैं. इस सवाल पर आलोक श्रीवास्तव कहते हैं कि यह तो देखने और पढ़ने वाला का नजरिया है. आप ओटीटी पर क्या देखते हैं? ओटीटी पर सिर्फ गालियां ही नहीं हैं बल्कि टैगोर की कहानियां भी हैं. तमाम अच्छा साहित्य और फिल्में उपलब्ध हैं. यह सब तो दर्शक की रुचि पर निर्भर करता है कि वह देख क्या रहा है या फिर देखना क्या चाहता है.

यही बात साहित्य पर भी लागू होती है. पुस्तक मेला में हजारों विषयों पर हजारों प्रकार की किताबें उपलब्ध हैं. पाठक को मनोरंजन के लिए सस्ता साहित्य चाहिए तो वह भी उपलब्ध है. और पाठक को अपनी भाषा, व्यवहार, विचार और सोच में सुधार लाना है तो उस विषय की किताबें भी उपलब्ध हैं.

यह दुनिया एक बाजार है, यहां सब कुछ उपलब्ध है. तय आपको करना है कि मुझे क्या लेना है.

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दुष्यंत कुमार के बाद हिंदी गजल में आए एक खालीपन को भरने का काम आलोक श्रीवास्तव ने किया है, इस सवाल पर खिलखिलाते हुए वह कहते हैं- ऐसा मेरे वरिष्ठ कहते हैं, यह सब उनका बड़प्पन है, उनका आशीर्वाद है. हां, मैंने बस यह किया कि हिंदी गजल की जो वर्जना थी, हिंदी गजल का जो मंचीय दायरा था, उसको मौसीकी, संगीत और फिल्मों की तरफ मोड़ने में थोड़ा बहुत योगदान दिया है.

मैं हिंदी पट्टी से आता हूं, लेकिन मेरी गजलें नामचीन गायकों ने गायी हैं. मेरी पीढ़ी के रचनाकारों में इस काम का छोटा-मोटा क्रेडिट मैं ले लेता हूं. मैंने गजल की भाषा को उस तरह बरता कि जिस तरह से आम फहम होती है. वह ऐसी हिंदी या उर्दू नहीं जो समझी ना जा सके. आम आदमी के साथ संवाद की भाषा होती है मेरी गजल.

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मंचों पर हिंदी गजल की स्थित पर आलोक श्रीवास्तव कहते हैं- मेरी एक गजल है “जो दिख रहा है सामने वह दृश्य मात्र है, लिखी रखी है पटकथा मनुष्य पात्र है” इसे आशुतोष राणा जी ने पढ़ा और देखते ही देखते वायरल हो गई. अब मैं कैसे मान लूं कि हिंदी गजलों में वह बात नहीं है. जो इस प्रकार की गजलों को सोशल मीडिया पर वायरल कर रहे हैं वे ही लोग मंचों पर सुनने के लिए आते हैं. यह वही समाज है जो किताब पढ़ रहा है, वही लोग हैं जो कवि सम्मेलन सुन रहे हैं और सोशल मीडिया पर भी आकर चीजों को वायरल कर रहे हैं.

वर्तमान परिदृश्य साहित्य को लेकर कितना समृद्ध है, इस पर आलोक कहते हैं- मुझे लगता है कि राजनीति और रचनाकार ये दोनों, एक सिक्के को दो पहलू हैं. इसमें रचनाकार को राजनीति के ऊपर दंड और व्यंग्य, दोनों करने चाहिए. उसकी गोद में जाकर नहीं बैठना चाहिए. क्योंकि हमारा समाज भी लेखक से उम्मीद करता है कि वह जनमानस का स्वर बने. लेकिन कुछ लोग अपने निजी प्रलोभन के चलते अपनी रीढ़ की हड्डी को सीधा नहीं रख पाते हैं. उनकी कलम झुक जाती है.

मैं यह सोचता हूं कि आप एक रचनाकार हैं और रचनाकार हर राजनीतिक दल से कहीं ऊपर का व्यक्ति है. रचनाकार को इसी भूमिका में रहना चाहिए.

लेकिन यहां यह भी सच है कि आज के समय में स्वीकारोक्ति खत्म हुई है. कुछ लोग सच सुनना नहीं चाहते. पहले उदारवादी लोगों की संख्या अधिक थी. उनकी सोच का फलक बड़ा था. अगर कोई व्यक्ति कोई बात कह रहा है तो उसकी बात को पहले समझा जाता था. अब स्थिति यह हो गई है कि जो आपको दिखाया जाता है आप केवल वही देखते हैं.

आलोक श्रीवास्तव की रचनाओं में मानवीय रिश्तों की गूंज सुनाई देती है. इससे इतर वह कौन-सा पहलू है जो आपको स्पर्श करता है, इस पर वह कहते हैं- मुझे इनसानी रिश्तों में विशेष रुचि इसलिए है क्योंकि मैं सोचता हूं कि अगर ये बचे रहेंगे तो समाज में संबंधों की जो परिभाषा है, संबंधों की जो डोर है वह और मजबूत बनी रहेगी. इसलिए मेरा झुकाव रिश्तों की तरफ अधिक है. इसके अलावा आपके अनुभव, आप किन परिस्थियों से गुजर रहे हैं, वे हालात मुझे छूते हैं. जैसे मेरी गजल का एक मतला है- “जरा सा तुमसे क्या आगे बढ़ा हूं, तुम्हारी आंख में चुभने लगा हूं”.

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जगबीती को अगर आप आपबीती करते हैं तो आपकी बात दूर तलक जाएगी और बड़े जनमानस को प्रभावित करेगी.

‘आमीन’ के बाद क्या नया आ रहा है. इस पर पेंगुइन बुक्स के कमीशनिंग एडिटर सुशांत झा की तरफ इशारा करते हुए कहते हैं- अगर ये छाप दें तो एक नई किताब आ रही है ‘आसान’. पेंगुइन से दो किताबों का अनुबंध हुआ है. ‘आसान’ की भूमिका आशुतोष राणा और जावेद अख्तर साहब ने लिखी है. ‘आसान’ में भी गजलें हैं. ‘आमीन’ में 2007 तक की गजलें हैं. ‘आसान’ में शिव तांडव स्त्रोत भी है. इसमें वे रचनाएं भी पढ़ने को मिलेंगी जिन्हें फिल्मों में इस्तेमाल किया गया है या किसी गायक ने गाया है.

यहां बता दें कि शिव तांडव स्त्रोत का आलोक श्रीवास्तव ने हिंदी में अनुवाद किया है और इसको स्वर दिए हैं आशुतोष राणा ने. यह स्त्रोत इन दिनों सोशल मीडिया पर धूम मचाए हुए है.

Tags: Books, Hindi Literature, Literature, Poet

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