Lung cancer cases rise sharply by 2030: देश भर में 2030 तक इस कैंसर का बढ़ेगा खतरा, हाई रिस्क में होंगी महिलाएं

देश में कई तरह के कैंसर से लाखों लोग ग्रस्त हैं. इसमें फेफड़े का कैंसर भी प्रमुख है. लंग कैंसर का इलाज शुरुआती स्टेज में शुरू नहीं किया जाए, तो मौत तय है. ये बेहद ही घातक कैंसर है. आजकल जिस तरह से प्रदूषण का स्तर बढ़ रहा है, उसमें फेफड़ों के कैंसर होने की संभावना काफी हद तक बढ़ गई है. इतना ही नहीं, हाल ही में हुए एक अध्ययन में एक बेहद ही चौंकाने वाली बात सामने आई है. अध्ययन के अनुसार, देश के उत्तर-पूर्वी (सिक्किम, मिजोरम, अरुणाचल प्रदेश, मणिपुर, मेघालय आदि) क्षेत्र 3-4 सालों में सबसे अधिक प्रभावित होंगे, जिसमें महिलाओं में फेफड़ों के कैंसर के मामलों में तेजी से वृद्धि होगी. इस नई स्टडी के अनुसार, भारत में फेफड़ों के कैंसर का बोझ 2030 तक तेजी से बढ़ने का अनुमान है. यह स्टडी इंडियन जर्नल ऑफ मेडिकल रिसर्च में प्रकाशित की गई है.
टीओआई में छपी एक रिपोर्ट के अनुसार, छह क्षेत्रों में फैली 57 आबादियों के आंकड़ों से पता चलता है कि फेफड़ों के कैंसर की घटनाएं उत्तर-पूर्व में सबसे अधिक हैं, जिसमें महिलाओं में इसकी दर अब पुरुषों के करीब पहुंच गई है. यह बेहद ही चौंकाने वाली बात है, क्योंकि उत्तर-पूर्वी राज्यों में प्रदूषण न के बराबर है. ये बेहद ही साफ-सुथरे पहाड़ी इलाके हैं, तो फिर यहां फेफड़े के कैंसर के मामले में वृद्धि होना भारत के लिए एक असामान्य पैटर्न है. स्टडी के अनुसार, आइज़ोल (Aizawl) में सबसे अधिक मामले दर्ज किए गए, जहां आयु-मानकीकृत घटना (age-standardised incidence) दर पुरुषों में प्रति लाख 35.9 और महिलाओं में प्रति लाख 33.7 रही, साथ ही मृत्यु दर भी सबसे अधिक पाई गई.
उत्तर-पूर्वी क्षेत्र में फेफड़ों के कैंसर होने की मुख्य वजहस्टडी के अनुसार, तंबाकू के अधिक सेवन से उत्तर-पूर्वी इलाकों में लंग्स कैंसर होने का जोखिम अधिक है. लगभग 68% पुरुष और 54% महिलाएं यहां तंबाकू का सेवन करती हैं. टीओआई को दिए एक इंटरव्यू में एम्स के पल्मोनोलॉजी विभाग के डॉ. सौरभ मित्तल ने कहा है कि रोग का स्वरूप बदल रहा है. जो महिलाएं धूम्रपान नहीं करती हैं, उनमें फेफड़ों के कैंसर के अधिक मामले सामने आ रहे हैं. इसकी वजह है घर के अंदर का वायु प्रदूषण, बायोमास ईंधन का उपयोग, सेकेंड-हैंड स्मोक आदि.
यह बदलाव देशभर में ट्यूमर के पैटर्न में भी दिखाई दे रहा है. धूम्रपान से जुड़ा स्क्वैमस-सेल कार्सिनोमा अब प्रमुख उपप्रकार नहीं रहा, उसकी जगह एडेनोकार्सिनोमा ने ले ली है. बेंगलुरु में यह अब महिलाओं में फेफड़ों के कैंसर के आधे से अधिक मामलों में पाया जा रहा है, जबकि दिल्ली में लार्ज-सेल कार्सिनोमा के मामलों में तेजी से वृद्धि देखी गई है.
कन्नूर, कासरगोड और कोल्लम जैसे दक्षिणी जिलों में अपेक्षाकृत कम तंबाकू और शराब सेवन के बावजूद पुरुषों में अधिक मामले दर्ज किए गए. इसका मतलब है कि सिर्फ तंबाकू ही नहीं, बल्कि फेफड़ों के कैंसर के कुछ अन्य जोखिम कारक भी हैं. वहीं, दक्षिण भारत में हैदराबाद और बेंगलुरु में महिलाओं में सबसे अधिक मामले सामने आए. श्रीनगर में पुरुषों के बीच फेफड़ों के कैंसर की दर अधिक पाई गई, जबकि कम नशीले पदार्थों के उपयोग के बावजूद श्रीनगर और पुलवामा की महिलाओं में भी अधिक मामले दर्ज किए गए.
ट्रेंड विश्लेषण में ये बात आई सामने
ट्रेंड विश्लेषण से पता चलता है कि कुछ क्षेत्रों में महिलाओं में फेफड़ों के कैंसर की घटनाएं सालाना 6.7% तक और पुरुषों में 4.3% तक बढ़ रही हैं. महिलाओं में सबसे तेज वृद्धि तिरुवनंतपुरम में दर्ज की गई, जबकि पुरुषों में डिंडीगुल में सबसे अधिक बढ़ोतरी देखी गई. शोधकर्ताओं का कहना है कि देशभर में महिलाओं में तंबाकू का सेवन अब भी 10% से कम है, बावजूद इसके लंग्स कैंसर होने की मुख्य वजह घर में बिगड़ती वायु गुणवत्ता, घरेलू संपर्क, सेकेंड-हैंड स्मोक हो सकता है. शोधकर्ताओं के अनुसार, एक अनुमान ये है कि साल 2030 तक केरल के कुछ हिस्सों में पुरुषों में फेफड़ों के कैंसर रेट प्रति लाख 33 से अधिक हो सकती है, जबकि महिलाओं में बेंगलुरु में प्रति लाख 8 से ऊपर पहुंच सकती है.



