जैविक खेती का कमाल! जयपुर के किसान ऑर्गेनिक नींबू से कमा रहे लाखों, खुद बनाते हैं कीटनाशक

जयपुर. प्राकृतिक खेती में रुचि रखने वाले किसान सुरेश कुमावत जैविक पद्धति से नींबू की खेती कर लाखों रुपये की कमाई कर रहे हैं. इन्होंने रासायनिक खेती छोड़कर पूरी तरह जैविक तरीके से खेती कर अपने खेत की मिट्टी को जीवंत बनाया है. सुरेश कुमावत ने नींबू की खेती में शानदार उत्पादन लेकर खेती में नई पहचान बनाई है. उनकी मेहनत व नवाचार का परिणाम यह है कि जैविक नींबू बाजार में अधिक दाम पर बिक रहे हैं और उनकी आमदनी लगातार बढ़ रही है.
सुरेश कुमावत बताते हैं कि कुछ साल पहले उनके खेत की मिट्टी लगातार कमजोर हो रही थी और नींबू के पौधे भी पहले जैसे फल नहीं दे रहे थे. गांव में आम धारणा थी कि बिना यूरिया और डीएपी खेती करना संभव नहीं है, लेकिन सुरेश ने इस मानसिकता को बदलने की ठानी. उन्होंने फैसला किया कि वे रासायनिक उर्वरकों को पूरी तरह छोड़कर जैविक खेती का रास्ता अपनाएंगे. शुरुआत में चुनौती बड़ी थी, क्योंकि रासायनिक खाद बंद करने के बाद उत्पादन में थोड़ी कमी आई, लेकिन सुरेश ने हिम्मत नहीं हारी और निरंतर प्रयोग जारी रखे.
नींबू की खेती में भट्टे के चूने का उपयोग
धीरे-धीरे उन्होंने मिट्टी को फिर से उर्वर बनाने के लिए देसी और प्राकृतिक तरीकों का सहारा लिया. वे बताते हैं कि पहले उन्होंने यूरिया का सीधा उपयोग बंद किया और उसके प्रभाव को कम करने के लिए एक प्रयोग शुरू किया. पानी से भरे ड्रम में यूरिया घोलकर ऊपर आने वाले झाग को हटाते थे, जिससे इसकी तीव्रता कम हो जाती थी. बाद में उन्होंने यह प्रयोग भी समाप्त कर दिया और पिछले दो वर्षों से अपने खेतों में यूरिया का एक भी दाना नहीं डाला. यूरिया की कमी पूरी करने के लिए वे भट्टे का चूना पानी में घोलकर सिंचाई के साथ मिट्टी तक पहुंचाते हैं, जिससे जमीन की संरचना सुधरती है और पौधों को प्राकृतिक कैल्शियम मिलता है.
सुरेश की सफलता का असली राज
जयपुर के किसान सुरेश की सफलता का असली राज उनका स्वनिर्मित जैविक मिश्रण है, जिसे वे 20 दिन तक रोज हिलाकर तैयार करते हैं. इस मिश्रण में 10 लीटर गोमूत्र, 10 किलो देसी गाय का गोबर, 2 किलो गुड़, 2 किलो बेसन, बरगद और पीपल की मिट्टी, नीम के पत्ते, आकड़ा, किसी भी फूल के हिस्से, प्याज़ के छिलके और 100 ग्राम तंबाकू की पत्ती शामिल रहती है. इन सबको पीसकर 100 लीटर पानी में घोलकर बड़ा ड्रम भर तैयार किया जाता है. जब यह मिश्रण पूरी तरह किण्वित हो जाता है, तो इसे छानकर ड्रिप या सिंचाई के माध्यम से नींबू के पौधों में दिया जाता है. इस जैविक घोल से मिट्टी की उर्वरता इतनी बढ़ी कि पौधों की रोग प्रतिरोधक क्षमता भी मजबूत हुई और नींबू बड़े, रसदार व ज्यादा टिकाऊ होने लगे.
जैविक खेती में है अधिक मुनाफा
उन्नत किसान सुरेश सिंचाई के लिए ड्रिप सिस्टम का उपयोग करते हैं, जिससे पानी की काफी बचत होती है. पानी सीधे जड़ों तक पहुंचने से पौधे स्वस्थ रहते हैं और उत्पादन भी बढ़ता है. आज उनके नींबू आकार और गुणवत्ता दोनों में बेहतरीन हैं, इसी कारण बाजार में जैविक नींबू की कीमत भी अधिक मिल रही है. उनके खेत में लगे नींबू को खरीदने के लिए खुद व्यापारी उनके पास आते हैं. सुरेश ने बताया कि लगातार जैविक खेती से उगाए गए उत्पादों की मांग बढ़ती जा रही है. रासायनिक खेती से तैयार फसलों के मुकाबले जैविक फसलों में गुणवत्ता अधिक मिलती है.



