Nagaur Farmer Tips | Jeli Making Process | Jeli Benefits for Farmers | Oat Uses Agriculture | Jeli or Oat Farming

Last Updated:November 29, 2025, 12:30 IST
Nagaur Farmer Tips: नागौर के किसानों के लिए जेली या जई एक भरोसेमंद साथी बन गई है. यह पौष्टिक और सस्ती सामग्री खेत और पशुपालन दोनों में इस्तेमाल होती है. किसान इसे आसानी से घर पर या खेत में बना सकते हैं. सही तरीका अपनाकर यह उत्पादन बढ़ाने और खर्च कम करने में मदद करता है, जिससे किसान की आय में बढ़ोतरी होती है.
किसानों का असली मित्र कहा जाने वाला पारंपरिक औजार जेली या जई आज भी खेती-बाड़ी में उतना ही उपयोगी है, जितना पहले था. खेतों में मौजूद खरपतवार, सूखी पत्तियां, कचरा या चारा हटाने के लिए यह औजार मिनटों में काम पूरा कर देता है. किसान जब खेत में जाता है तो अक्सर उसके हाथ में जेली नजर आ जाती है, क्योंकि यह उसके रोज़मर्रा के कामों को आसान बनाती है. आधुनिक औजारों के बीच भी जेली का महत्व कम नहीं हुआ है, बल्कि यह खेती की बुनियादी जरूरतों को पूरा करती हुई किसान का भरोसा बनी हुई है.

जेली को बनाने में सबसे महत्वपूर्ण है उसकी मजबूत और टिकाऊ लकड़ी, जिसके लिए आमतौर पर खेजड़ी, सागवान जैसी कठोर लकड़ियों का उपयोग होता है. सबसे पहले एक लंबे और पकड़ने में सहज बड़े हत्थे को आकार दिया जाता है, जिसे पूरी तरह चिकना और गोल बनाया जाता है. इसके बाद पतली लेकिन मजबूत लकड़ियों को गोलाकार बांधकर नालीनुमा दांत तैयार किए जाते हैं. ये 6 से 8 नालियां एक साथ जोड़कर एक हक में फिट की जाती हैं. हक और हत्था आपस में मजबूती से जोड़े जाते हैं, जिससे चलाने में स्थिरता और ताकत मिलती है.

जेली की मजबूती सुनिश्चित करने के लिए लकड़ी के हिस्सों को जोड़ने के बाद उसे चमड़े या मोटे कपड़े से कसकर बांधा जाता है, ताकि चलाते समय ढीलापन न आए. पारंपरिक तरीकों से बनी जेली वर्षों तक बिना टूटे चलती है और इससे खेतों में काम करना आसान हो जाता है. यह आकार में हल्की होती है लेकिन ताकत से भरपूर होती है. लकड़ी को पहले सुखाया जाता है ताकि नमी खत्म हो जाए और औजार लंबे समय तक टिक सके. यही कारण है कि ग्रामीण कारीगर इसकी बनावट में खास सावधानी रखते हैं.
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खेतों में जेली का उपयोग सबसे ज्यादा निराई-गुड़ाई, मिट्टी को ढीला करने और जमीन को समतल करने में किया जाता है. जब खेत में घास या खरपतवार बढ़ जाते हैं, तो जेली उन्हें खींचकर निकालने में बेहद प्रभावी होती है. इसके अलावा चारा, घास या फूंस को एक स्थान से दूसरे स्थान तक ले जाने में भी यह बहुत काम आती है. किसान इसे उंटगाड़ियों, ट्रॉलियों या चारे वाले पात्रों में भरने के लिए भी इस्तेमाल करते हैं.

जहां पहले जेली केवल लकड़ी से बनाई जाती थी, वहीं अब समय के साथ इसका आधुनिक रूप भी सामने आया है. बाजार में लगभग 900 से 1500 रुपए तक की लकड़ी की जेली मिल जाती है, जिसमें उपयोग की गई लकड़ी की गुणवत्ता के अनुसार कीमत तय होती है. वहीं लोहे से बनी जेली और अधिक टिकाऊ और मजबूत मानी जाती है, जिसकी कीमत लगभग 2000 रुपए तक पहुंच जाती है. राजस्थान के नागौर जिले के बुटाटी, जायल, परबतसर और सुजानगढ़ जैसे कस्बे जेली निर्माण के प्रमुख केंद्र माने जाते हैं, जहां यह पारंपरिक कला आज भी जिंदा है.

किसानों के बीच जेली केवल एक औजार नहीं बल्कि पहचान का प्रतीक मानी जाती है. खेतों में काम करते समय किसान के हाथ में जेली होना उसकी मेहनत और छवि को दर्शाता है. यह औजार उनके दैनिक कामों को आसान बनाता है, खासकर खेती से जुड़े छोटे लेकिन जरूरी कामों में. आधुनिक मशीनरी आने के बाद भी जेली का महत्व कम नहीं हुआ है, क्योंकि इसका उपयोग आसान है, रखरखाव कम है और लागत भी बहुत कम आती है. इसलिए यह औजार आज भी किसानों की पहली पसंद बना हुआ है.
First Published :
November 29, 2025, 12:30 IST
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किसान का भरोसेमंद साथी! जानें क्यों जेली या जई है खास, कैसे बनती है जानें



