दिवाली के दियों की रोशनी से पकता है यह फल: त्रेतायुग से है संबंध, शबरी ने भगवान राम को खिलाया था यही फल

Last Updated:October 20, 2025, 18:52 IST
राजस्थान के करौली जिले के डांग क्षेत्रों में दीपावली के आसपास प्राकृतिक रूप से उगने वाला बेर फल, जिसे “जंगलों का सेब” कहा जाता है, धार्मिक, आयुर्वेदिक और सांस्कृतिक दृष्टि से अत्यंत महत्वपूर्ण है. यह फल बिना बीज के झाड़ियों के बीच स्वतः उगता है और इंसानों के साथ-साथ पशुओं को भी प्रिय है.
राजस्थान के जंगलों में बड़ी मात्रा में स्वतः ही पैदा होने वाला एक खास फल ऐसा है जिसे जंगलों का सेब कहा जाता है. दीपावली पर करौली के डांग क्षेत्रों में बेर नाम का यह फल इतनी बड़ी मात्रा में उगता है कि लोग 4 महीने इसका फ्री में ही स्वाद लेते हैं. औषधीय गुणों से भरपूर यह फल धार्मिक महत्व के हिसाब से भी सभी फलों में सबसे आगे हैं.

बीज के बिना जंगलों में झाड़ियां के बीच उगने वाला यह फल हिंदू धर्म में देवताओं से लेकर भगवान शिव को प्रसन्न करने के लिए सबसे ज्यादा चढ़ाया जाता है. इस खास फल का जिक्र रामायण जैसे ग्रंथ में भी आया है. इसलिए इसे भगवान राम का भी पसंदीदा फल कहा जाता है.

इस बेर फल को खाना हर किसी को पसंद होता है. जंगलों में उगने वाला यह एकमात्र ऐसा फल है, जिसे इंसान और पशु दोनों ही खूब खाते हैं. दिवाली के बाद जैसे ही बेर का सीजन आता है बाजारों में भी इसकी मांग बढ़ जाती है. खाने में खट्टा – मीठा लगने वाला यह छोटा सा फल सेहत के लिए भी काफी फायदेमंद होता है.

बेर कई बीमारियों का रामबाण इलाज भी कहा जाता है. इसमें पाए जाने वाले कई गुण ऐसे हैं जो बड़ी-बड़ी बीमारियों को जड़ से समाप्त कर देते हैं.

यह फल त्रेतायुग का फल कहा जाता है. इसका जिक्र भगवान राम के समय में भी आया है. लोगों का मानना है कि बेर फल दीपावली के दियों की रोशनी से ही पकता हैं. इसलिए दिवाली के बाद ही इसका सेवन करना ठीक रहता है. डांग क्षेत्र के स्थानीय निवासी राजेश शर्मा का कहना है कि बैर नाम का यह फल बरसात के दिनों में आना शुरू कर देता है और दिवाली के आसपास पक्कर एकदम तैयार हो जाता है.

देवउठनी एकादशी पर देवताओं को प्रसन्न करने और जागने के लिए इसी फल का सबसे ज्यादा प्रयोग किया जाता हैं. त्रेतायुग में भी भगवान राम ने शबरी का यही झूठा फल बेर खाया था. माता शबरी ने भी उस समय भगवान राम को यही फल खिलाया था. इसी फल को खिलाने के बाद भगवान राम ने उन्हें नविधा भक्ति का आशीर्वाद दिया था.

भगवान शिव से भी इस फल का गहरा संबंध है. यदि देखा जाए तो बेर की आकृति शिवलिंग जैसी ही होती हैं.

हालांकि वास्तु की दृष्टि से यह फल घरों में प्रतिबंधित रहता है. इसके बारे में ज्योतिषाचार्य बताते हैं कि यह फल कांटों के बीच पैदा होता है. ऐसे में अगर इसकी डाली या फिर कोई कांटा घर में गिर जाए तो वह छोटे बच्चें के अलावा किसी को भी चुभ सकता हैं. इसलिए घर में बेर का पेड़ लगाना वास्तु के हिसाब से प्रतिबंधित रहता है लेकिन घर से बाहर इसका पेड़ लगाया जा सकता है.
First Published :
October 20, 2025, 18:52 IST
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राजस्थान के जंगलों का बेर फल है दिवाली पर खास, जानिए सेहत और धार्मिक महत्व



