राजस्थान विश्वविद्यालय में राष्ट्रीय महिला लोककला उत्सव में 13 राज्यों की कलाकारों की पेंटिंग्स की धूम!

जयपुर. शहर में सालभर आर्ट लवर्स के लिए वर्कशॉप और पेंटिंग की एग्ज़िबिशन चलते रहते हैं, ऐसे ही अभी राजस्थान विश्वविद्यालय के विज़ुअल आर्ट विभाग में राष्ट्रीय महिला लोककला उत्सव और वर्कशॉप 2026 का आयोजन चल रहा है. यहां अलग-अलग राज्यों से आई महिलाएं फोक पेंटिंग और क्राफ्ट आर्टिस्ट्स अपने खास पेंटिंग के हुनर के साथ पहुंची हैं. राजस्थान विश्वविद्यालय में इस वर्कशॉप का उद्देश्य विश्वविद्यालय के आर्ट विभाग के छात्रों के लिए लोककलाओं के संरक्षण, संवाद और सीखने के लिए साझा मंच उपलब्ध कराना है.
लोकल-18 ने विश्वविद्यालय में चल रही वर्कशॉप में पहुंचकर पेंटिंग्स, कलाकारों और राजस्थान विश्वविद्यालय के विज़ुअल आर्ट विभाग के हेड रजत पंडेल से बातचीत की, उन्होंने बताया कि वर्कशॉप में राजस्थान के अलावा गुजरात, महाराष्ट्र, पश्चिम बंगाल, जम्मू-कश्मीर, केरल सहित 13 राज्यों की स्थानीय पेंटिंग कलाकार महिलाएं पहुंची हैं. इनके माध्यम से विश्वविद्यालय में छात्रों को अलग-अलग राज्यों की लोककलाओं की पेंटिंग सीखने का मौका मिल रहा है. रजत पंडेल बताते हैं कि वर्कशॉप में ऐसी महिलाएं पहुंची हैं जो वर्षों से पेंटिंग कला से रोजगार के रूप में जुड़ी हैं. ये महिलाएं हर राज्य की स्थानीय संस्कृति और लोककलाओं से जुड़ी पेंटिंग का हुनर जानती हैं, जिससे विश्वविद्यालय के छात्रों को बेहतरीन पेंटिंग सीखने का मौका मिल रहा है.
वर्कशॉप में झारखंड की डोगरा पेंटिंग से लेकर अन्य राज्यों की खास पेंटिंग
राजस्थान विश्वविद्यालय में चल रहे राष्ट्रीय महिला लोककला उत्सव और वर्कशॉप में खासतौर पर झारखंड की मिट्टी से उभरती जीवंत परंपराएं—कटकम, सोहराय और खोबर पेंटिंग—प्रदर्शित की जा रही हैं. यह पेंटिंग त्योहारों और विशेष अवसरों पर घरों की दीवारों पर क्ले, सफेद, काली, पीली और गेरुआ मिट्टी से बनाई जाती थी, जिसमें जानवर, पक्षी, मोर, हाथी, फूल और पत्तियों के मोटिफ़ दिखाई देते हैं, इसे 2021 में GI टैग प्राप्त हुआ.
इसके अलावा पश्चिम बंगाल के पुरुलिया जिले की छाऊ मास्क आर्ट भी प्रदर्शित है, ये मास्क पेपर मेश, कपड़ा और कार्डबोर्ड की परतों से बनाए जाते हैं. स्थानीय रूप से इन्हें “नज़र कटि” कहा जाता है, घर में रखने पर इन्हें शुभ और संरक्षक प्रतीक माना जाता है. दुर्गा पूजा और नवरात्रि के दौरान इन्हें महिषासुर मर्दिनी जैसी कथात्मक प्रस्तुतियों में प्रयोग किया जाता है. एक मास्क तैयार करने में पांच से छह दिन लगते हैं, इस कला को 2018 में GI टैग प्राप्त हुआ था. मध्य प्रदेश के झाबुआ जिले की भील पेंटिंग भी वर्कशॉप में प्रदर्शित है, इसकी शुरुआत विवाह और त्योहारों के दौरान दीवारों पर प्राकृतिक रंगों से चित्र बनाने की परंपरा से हुई थी. इस पेंटिंग की खास पहचान डॉट-पैटर्न है, जिसे पूर्वज अंगूठे से बनाते थे, समय के साथ यह सूक्ष्म और आधुनिक शैली में विकसित हुई.
लोककला उत्सव में अलग-अलग पेंटिंग्स की स्टॉल्स
राजस्थान विश्वविद्यालय के मैन गेट पर स्थित संविधान पार्क में यह भव्य वर्कशॉप आयोजित की जा रही है. अलग-अलग राज्यों की पेंटिंग कलाकारों की स्टॉल्स लगी हैं, जहां छात्र सोराई पेंटिंग, चंबा रुमाल और डोगरा आर्ट को लाइव बनते हुए देख सकते हैं और सीख सकते हैं. इसके अलावा अलग-अलग राज्यों की मिट्टी, कपड़ा, लकड़ी और अन्य धातुओं पर बनी पेंटिंग यहां खरीद भी सकते हैं. वर्कशॉप में छात्रों के लिए पेंटिंग आर्ट से जुड़े कलाकारों और प्रोफेसर्स द्वारा टॉक शो का आयोजन भी किया जा रहा है, इसमें परंपरा और आधुनिकता के बीच लोक कला की जड़ों, उसके अर्थ और समाज में महिलाओं की भूमिका पर चर्चा की जा रही है. यह सत्र छात्रों के लिए खास हैं जो आर्ट और पेंटिंग से जुड़े हैं.



