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PHOTO: एम्स में 20 रुपये में बेड और भरपेट खाने का जुगाड़, अब फुटपाथ पर नहीं, यहां रात गुजारें मरीज और घरवाले aiims new delhi patients-caretakers would not to sleep on footpath now they can stay and feed in vishram sadan shelter homes at rupees 20 per day

Last Updated:January 02, 2026, 11:56 IST

एम्स नई दिल्ली में इलाज कराने के लिए आने वाले मरीजों को अब सड़कों या फुटपाथ पर सोने, अंडरपास और मेट्रो स्टेशनों के आसपास रात गुजारने या रहने के लिए भटकने की जरूरत नहीं है. एम्स के आश्रय स्थलों में वे सिर्फ 20 रुपये रोजाना के खर्च पर न केवल ठहर सकते हैं बल्कि आराम से दो वक्त का गर्म खाना भी खा सकते हैं. आइए जानते हैं मरीज और तीमारदार इस सुविधा का लाभ कैसे उठा सकते हैं..
एम्स में ज्यादातर मरीज गंभीर हालत में ही आते हैं. कुछ मरीजों को लंबा इलाज चाहिए होता है. बार-बार तारीखें मिलने के कारण वे अपने घर भी नहीं लौट पाते और उन्हें यहां ठहरना पड़ता है, लेकिन बहुत सारे मरीज ऐसे होते हैं जो दिल्ली में रहना अफॉर्ड नही कर सकते, तो ऐसे मरीजों को बाहर कड़कड़ाती ठंड में सड़क या फुटपाथ पर रात गुजारने की जरूरत नहीं है, क्योंकि एम्स के आश्रय स्थल हैं, जिनमें मरीजों और उनके परिजनों को रुकने के लिए करीब 1500 बेड की क्षमता है.

एम्स में ज्यादातर मरीज गंभीर हालत में ही आते हैं. कुछ मरीजों को लंबा इलाज चाहिए होता है. बार-बार तारीखें मिलने के कारण वे अपने घर भी नहीं लौट पाते और उन्हें यहां ठहरना पड़ता है, लेकिन बहुत सारे मरीज ऐसे होते हैं जो दिल्ली में रहना अफॉर्ड नही कर सकते, तो ऐसे मरीजों को बाहर कड़कड़ाती ठंड में सड़क या फुटपाथ पर रात गुजारने की जरूरत नहीं है, क्योंकि एम्स के आश्रय स्थल हैं, जिनमें मरीजों और उनके परिजनों को रुकने के लिए करीब 1500 बेड की क्षमता है.

एम्स पीआईसी इंचार्ज और प्रोफेसर डॉ. रीमा दादा बताती हैं कि ये विश्राम सदन एम्स परिसर में ही बना है. यह एम्स और सफदरजंग के बीच में एम्स ट्रॉमा सेंटर के नजदीक है. इसके अंतर्गत कई धर्मशालाएं या सदन हैं. जैसे श्री सांई धर्मशाला में 100 बेड हैं, राजगढ़िया धर्मशाला में 140 बेड हैं, सीआरपीएफ के विश्राम सदन में 281 बेड हैं, इसी के एक और आश्रय शेल्टर में 180 बेड हैं. सुरेका विश्राम सदन में 216 बेड हैं. यहीं एक पॉवर ग्रिड नाम से भी आश्रय स्थल है, जहां 400 लोगों के रहने की व्यवस्था है.

एम्स पीआईसी इंचार्ज और प्रोफेसर डॉ. रीमा दादा बताती हैं कि ये विश्राम सदन एम्स परिसर में ही बना है. यह एम्स और सफदरजंग के बीच में एम्स ट्रॉमा सेंटर के नजदीक है. इसके अंतर्गत कई धर्मशालाएं या सदन हैं. जैसे श्री सांई धर्मशाला में 100 बेड हैं, राजगढ़िया धर्मशाला में 140 बेड हैं, सीआरपीएफ के विश्राम सदन में 281 बेड हैं, इसी के एक और आश्रय शेल्टर में 180 बेड हैं. सुरेका विश्राम सदन में 216 बेड हैं. यहीं एक पॉवर ग्रिड नाम से भी आश्रय स्थल है, जहां 400 लोगों के रहने की व्यवस्था है.

एम्स दिल्ली के अलावा एम्स के झज्जर स्थित कैंसर इंस्टीट्यूट एनसीआई में इंफोसिस का एक विश्राम सदन है जहां करीब 806 बेड हैं. सबसे खास बात है कि एम्स-सीआरपीएफ के आश्रय स्थलों में सिर्फ 20 रुपये रोजाना पर ठहरा जा सकता है. इन 20 रुपयों में रहने के लिए बेड के अलावा मरीजों या तीमारदारों को भरपेट खाना भी मिलता है. जबकि पावर ग्रिड के आश्रय स्थल में 50 रुपये बेड औ 200 रुपये कमरे के लिए चार्ज किया जाता है.

एम्स दिल्ली के अलावा एम्स के झज्जर स्थित कैंसर इंस्टीट्यूट एनसीआई में इंफोसिस का एक विश्राम सदन है जहां करीब 806 बेड हैं. सबसे खास बात है कि एम्स-सीआरपीएफ के आश्रय स्थलों में सिर्फ 20 रुपये रोजाना पर ठहरा जा सकता है. इन 20 रुपयों में रहने के लिए बेड के अलावा मरीजों या तीमारदारों को भरपेट खाना भी मिलता है. जबकि पावर ग्रिड के आश्रय स्थल में 50 रुपये बेड औ 200 रुपये कमरे के लिए चार्ज किया जाता है.

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डॉ. दादा कहती हैं कि एम्स के आसपास मरीज और उनके परिजनों को ठहरने की पूरी व्यवस्था है, लेकिन सबसे बड़ी बात है कि मरीजों और उनके परिजनों को इस बात की जानकारी ही नहीं है, कि उनके ठहरने की व्यवस्था एम्स के अंदर ही है. इसके लिए मरीजों को अपने डॉक्टर को बताना है और पर्चे पर लिखवाना है. जब एक बार डॉक्टर पर्चे पर लिख देते हैं तो आश्रय स्थलों में बेड की उपलब्धता के आधार पर बेड दे दिया जाता है.

डॉ. दादा कहती हैं कि एम्स के आसपास मरीज और उनके परिजनों को ठहरने की पूरी व्यवस्था है, लेकिन सबसे बड़ी बात है कि मरीजों और उनके परिजनों को इस बात की जानकारी ही नहीं है, कि उनके ठहरने की व्यवस्था एम्स के अंदर ही है. इसके लिए मरीजों को अपने डॉक्टर को बताना है और पर्चे पर लिखवाना है. जब एक बार डॉक्टर पर्चे पर लिख देते हैं तो आश्रय स्थलों में बेड की उपलब्धता के आधार पर बेड दे दिया जाता है.

इन आश्रय स्थलों में 7 से 14 दिन तक ठहर सकते हैं, लेकिन अगर मरीज इलाज के लिए यहां ज्यादा दिनों तक रहने की जरूरत है और डॉक्टर भी इसकी सिफारिश करते हैं तो इन आश्रय सदनों में ठहरने की अवधि महीने भर तक या उससे ज्यादा भी बढ़ाई जा सकती है. कई बार कैंसर आदि बीमारियों से जूझ रहे मरीजों को बार-बार डेट मिलती है, लेकिन दूर-दराज से होने के कारण उन्हें यहीं रुकना पड़ता है.

इन आश्रय स्थलों में 7 से 14 दिन तक ठहर सकते हैं, लेकिन अगर मरीज इलाज के लिए यहां ज्यादा दिनों तक रहने की जरूरत है और डॉक्टर भी इसकी सिफारिश करते हैं तो इन आश्रय सदनों में ठहरने की अवधि महीने भर तक या उससे ज्यादा भी बढ़ाई जा सकती है. कई बार कैंसर आदि बीमारियों से जूझ रहे मरीजों को बार-बार डेट मिलती है, लेकिन दूर-दराज से होने के कारण उन्हें यहीं रुकना पड़ता है.

डॉ. दादा कहती हैं कि बेड देने का यह सिस्टम पूरी तरह पारदर्शी है जो बताता है कि कितने बेड खाली हैं, कितने बेड भर गए हैं. इसका रियल टाइम डाटा वहां चलता रहता है. यहां डोरमेट्री और सेमी डोरमेट्री भी हैं. यहां दो, तीन और चार बेड वाले भी कमरे हैं, जिनका चार्ज अलग-अलग है. ये सदन पूरी तरह सुरक्षित हैं और वहां सीसीटीवी कैमरे लगे हैं. यहां साफ-सुथरे बेड, गर्म और हाईजीनिक खाना, साफ शौचालयों की सुविधा है.

डॉ. दादा कहती हैं कि बेड देने का यह सिस्टम पूरी तरह पारदर्शी है जो बताता है कि कितने बेड खाली हैं, कितने बेड भर गए हैं. इसका रियल टाइम डाटा वहां चलता रहता है. यहां डोरमेट्री और सेमी डोरमेट्री भी हैं. यहां दो, तीन और चार बेड वाले भी कमरे हैं, जिनका चार्ज अलग-अलग है. ये सदन पूरी तरह सुरक्षित हैं और वहां सीसीटीवी कैमरे लगे हैं. यहां साफ-सुथरे बेड, गर्म और हाईजीनिक खाना, साफ शौचालयों की सुविधा है.

सबसे जरूरी बात है कि जिन लोगों के पास आभा आईडी कार्ड है या एम्स का यूएचआईडी नंबर है और आधार कार्ड है, उन्हीं मरीजों और उनके केयरटेकर्स को ये बेड अलॉट होते हैं और अंदर आने की परमिशन होती है. इन मरीजों को अस्पताल के गेट से आश्रय स्थल पहुंचाने के लिए ई-शटल्स लगी हैं.

सबसे जरूरी बात है कि जिन लोगों के पास आभा आईडी कार्ड है या एम्स का यूएचआईडी नंबर है और आधार कार्ड है, उन्हीं मरीजों और उनके केयरटेकर्स को ये बेड अलॉट होते हैं और अंदर आने की परमिशन होती है. इन मरीजों को अस्पताल के गेट से आश्रय स्थल पहुंचाने के लिए ई-शटल्स लगी हैं. वे कहती हैं कि अगर किसी और एम्स से कोई मरीज यहां रैफर होकर आ रहा है तो वह डॉक्टर से लिखवाकर ऑनलाइन भी इन आश्रय सदनों में बुकिंग कर सकता है. आमतौर पर यहां वेटिंग रहती है लेकिन बहुत सारे मरीजों और परिजनों को उनका फायदा मिलता है.

बता दें कि एम्स में इलाज कराने के लिए दिल्ली ही नहीं बल्कि यूपी, बिहार, एमपी, जम्मू और कश्मीर, दक्षिण भारत के राज्यों से भी लोग इलाज कराने आते हैं. इनमें ज्यादातर मरीज ऐसे होते हैं जो दिल्ली में रहने और खाने का खर्च नहीं उठा पाते. ऐसे में बहुत सारे मरीज एम्स के बाहर मेट्रो स्टेशन, अंडरपास आदि में रहने के लिए जमीन का सहारा लेते हैं. जब मरीज को एक्स्ट्रा केयर की जरूरत होती है, वहां उनका जमीन पर पड़े रहना और खाने-पीने का इंतजाम न हो पाना काफी दुखदायी होता है.

बता दें कि एम्स में इलाज कराने के लिए दिल्ली ही नहीं बल्कि यूपी, बिहार, एमपी, जम्मू और कश्मीर, दक्षिण भारत के राज्यों से भी लोग इलाज कराने आते हैं. इनमें ज्यादातर मरीज ऐसे होते हैं जो दिल्ली में रहने और खाने का खर्च नहीं उठा पाते. ऐसे में बहुत सारे मरीज एम्स के बाहर मेट्रो स्टेशन, अंडरपास आदि में रहने के लिए जमीन का सहारा लेते हैं. जब मरीज को एक्स्ट्रा केयर की जरूरत होती है, वहां उनका जमीन पर पड़े रहना और खाने-पीने का इंतजाम न हो पाना काफी दुखदायी होता है.

डॉ. दादा ने बताया कि इस सुविधा के अलावा एम्स निदेशक डॉ. एम श्रीनिवास ने प्रस्ताव दिया है कि आने वाले समय में एम्स का एक मेगा विश्राम सदन भी बनेगा, जिसकी क्षमता 2 हजार बेड की होगी. इससे ज्यादा से ज्यादा मरीजों और तीमारदारों को रहने की सुविधा मिलेगी. बता दें कि सिर्फ एम्स की ओपीडी में ही हजारों की संख्या में मरीज रोजाना दिखाने आते हैं और तारीखें मिलने के कारण उन्हें यहीं रहना पड़ता है.

डॉ. दादा ने बताया कि इस सुविधा के अलावा एम्स निदेशक डॉ. एम श्रीनिवास ने प्रस्ताव दिया है कि आने वाले समय में एम्स का एक मेगा विश्राम सदन भी बनेगा, जिसकी क्षमता 2 हजार बेड की होगी. इससे ज्यादा से ज्यादा मरीजों और तीमारदारों को रहने की सुविधा मिलेगी. बता दें कि सिर्फ एम्स की ओपीडी में ही हजारों की संख्या में मरीज रोजाना दिखाने आते हैं और तारीखें मिलने के कारण उन्हें यहीं रहना पड़ता है.

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January 02, 2026, 11:56 IST

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