Public Opinion: स्मार्टफोन बन रहा छोटे बच्चों के मौत का कारण, पब्लिक बोली -बच्चों की नहीं, माता-पिता की गलती!

Last Updated:November 07, 2025, 15:56 IST
Public Opinion : धौलपुर के कुरदी गांव में 13 वर्षीय बच्चे द्वारा मोबाइल गेम की लत के चलते की गई आत्महत्या ने समाज को झकझोर दिया है. यह घटना सिर्फ एक घर की त्रासदी नहीं, बल्कि हर माता-पिता के लिए चेतावनी है कि तकनीक की अंधी दौड़ में कहीं बचपन खोता जा रहा है और मासूम मन स्क्रीन की गिरफ्त में कैद हो रहे हैं.
सीकर : तकनीक ने जहां जीवन को आसान बनाया है, वहीं यह नई पीढ़ी के लिए खतरे का कारण भी बनती जा रही है. अभी हालही में धौलपुर के कुरदी गांव से आई एक दर्दनाक खबर ने पूरे समाज को झकझोर दिया. 13 वर्षीय विष्णु ने पिता द्वारा मोबाइल गेम खेलने से रोके जाने पर अपनी जान दे दी. यह घटना न केवल एक परिवार को दुखी करने वाली खबर नहीं है बल्कि पूरे समाज के लिए चेतावनी की घंटी है कि स्क्रीन की दुनिया अब बच्चों की मानसिकता पर गहरा असर छोड़ रही है.
जानकारी के अनुसार, विष्णु पिछले एक वर्ष से लगातार मोबाइल पर गेम खेलने का आदी हो चुका था. पढ़ाई और परिवार से उसका जुड़ाव कम होता जा रहा था. ऐसा ही आज हर घर में हो रहा है. यह दिल दहला देने वाली घटना को लेकर आज लोकल 18 की टीम ने ग्राउंड पर जाकर पेरेंट्स और आम लोगों से बात की, हमने लोगों से पूछा कि क्या छोटे बच्चों से पीछा छुड़ाने के लिए उन्होंने मोबाइल देना सही है या गलत ?
माता-पिता या तकनीकी युग का अंधा मोहघटना के बाद सोशल मीडिया और स्थानीय जनचर्चा में यह सवाल तेजी से उठने लगा कि आखिर जिम्मेदार कौन है, बच्चा, माता-पिता या तकनीकी युग का अंधा मोह? सीकर जिले के नीवर्तमान पार्षद अनुराग बगड़िया सी जब हमने इस मुद्दे पर बात की तो उन्होंने बताया कि आज के दौर में माता-पिता बच्चों को व्यस्त रखने के लिए उन्हें मोबाइल थमा देते हैं, जिससे धीरे-धीरे यह मनोरंजन नहीं बल्कि लत बन जाती है. यह लत नशे के समान असर करती है और बच्चे का मस्तिष्क गेम की एक अलग ही दुनिया में कैद हो जाता है.
अवसाद का शिकार बन रहे बच्चेडॉ. अर्जुन सिंह शेखावत का इस मामले को लेकर कहना है कि हर महीने 25 से 30 ऐसे मामले सामने आते हैं, जहां बच्चे गेम या सोशल मीडिया की लत के कारण तनाव, गुस्सा या अवसाद का शिकार बन रहे हैं. उन्होंने कहा माता-पिता को बच्चों के मोबाइल उपयोग पर नियंत्रण रखना चाहिए, साथ ही उन्हें खेल, संवाद और सामाजिक मेलजोल से जोड़ना जरूरी है. उन्होंने कहा कि हर स्कूल में साइकोलॉजिकल काउंसलिंग और डिजिटल एजुकेशन का एक सत्र अनिवार्य होना चाहिए ताकि बच्चे मोबाइल को मनोरंजन नहीं, जिम्मेदारी के साथ उपयोग करना सीखें.
मोबाइल ही नहीं साइकिल से भी रख दूरी सीकर के मोचीवाड़ा क्षेत्र के अभिभावक फूलचंद टांक से जब हमने बात की तो उन्होंने बताया कि बच्चों को मोबाइल ही नहीं बल्कि साइकिल से भी दूर रखना चाहिए. माता पिता अक्सर वे अपने बच्चों को लाड प्यार जताने के लिए उन्हें की हर ख्वाहिश को पूरा करते हैं. इसी ख्वाहिश को पूरा करने के लिए वह उन्हें मोबाइल और साइकिल देते हैं. यह दोनों ही छोटे बच्चों के लिए किसी बम से काम नहीं है. मोबाइल छोटे बच्चों को धीरे-धीरे माता-पिता से ही दूर कर देता है वही साइकिल से बच्चे दुर्घटनाग्रस्त हो सकते हैं. ऐसे में माता-पिता को बच्चों से लाड प्यार जताने के लिए मोबाइल और साइकिल ना देने की बजाय उनके साथ खेल कर और समय बिताए.
Rupesh Kumar Jaiswal
रुपेश कुमार जायसवाल ने दिल्ली यूनिवर्सिटी के ज़ाकिर हुसैन कॉलेज से पॉलिटिकल साइंस और इंग्लिश में बीए किया है. टीवी और रेडियो जर्नलिज़्म में पोस्ट ग्रेजुएट भी हैं. फिलहाल नेटवर्क18 से जुड़े हैं. खाली समय में उन…और पढ़ें
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Location :
Sikar,Rajasthan
First Published :
November 07, 2025, 15:56 IST
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बच्चों की नहीं, माता-पिता की गलती! मौत का कारण बन रहा स्मार्टफोन…



