Rajasthan

अलवर मंदिर में पुंगनूर गाय पहुँची

Alwar News: अलवर शहर स्थित वेंकटेश बालाजी दिव्य धाम मंदिर में आंध्र प्रदेश की प्रसिद्ध पुंगनूर गाय लाई गई है. यह नस्ल देशभर में अपनी दुर्लभता और खूबसूरत छोटे आकार के लिए जानी जाती है. मंदिर प्रशासन ने बताया कि इन गायों को विशेष रूप से यहाँ लाया गया है, जिसके बाद मंदिर आने वाले लोग लगातार इनको देखने पहुंच रहे हैं. इन गायों का आगमन मंदिर परिसर में एक नया और दिव्य आकर्षण बन गया है.

मंदिर समिति के अनुसार पुंगनूर नस्ल के एक बछड़े और एक बछड़ी को लाया गया है. इनका नाम क्रमशः राधा और कृष्ण रखा गया है. इनका छोटा आकार और आकर्षक रूप इन्हें देखने वालों का ध्यान अपनी ओर खींच रहा है. ये गायें भारतीय देसी नस्लों में सबसे छोटी मानी जाती हैं.

दूध में 8% फैट, औषधीय गुणों से भरपूरहालांकि यह गाय प्रतिदिन केवल 2 से 2.5 लीटर दूध देती है, लेकिन इसका दूध सामान्य गायों के मुकाबले अधिक पौष्टिक माना जाता है. जहां सामान्य दूध में 3–5% फैट होता है, वहीं पुंगनूर नस्ल के दूध में 8% तक फैट पाया जाता है, जिसे अत्यधिक पौष्टिक और औषधीय गुणों से युक्त माना जाता है. यह दूध शारीरिक विकास और प्रतिरक्षा के लिए बेहद उत्तम माना जाता है.

कम जगह और कम भोजन में भी रह सकती हैइस गाय की सबसे बड़ी विशेषता इसका छोटा आकार है. आमतौर पर इनकी ऊंचाई 24 से 27 इंच और वजन 125 से 150 किलो तक होता है. इस कारण यह कम जगह में भी आसानी से पालने योग्य है और शहरी क्षेत्रों में गोपालन के लिए एक उत्तम विकल्प है.

महंत सुदर्शनाचार्य का बयानमंदिर के महंत सुदर्शनाचार्य ने बताया कि पुंगनूर गाय छोटी जगह में भी आराम से रह सकती है. मंदिर में दोनों बछड़ा–बछड़ी फिलहाल एक कमरे में रखे गए हैं. ये कम भोजन लेती हैं और स्वास्थ्यवर्धक दूध देती हैं. लोगों के लिए यह आकर्षण का बड़ा कारण बनी हुई है.

उन्होंने कहा –“ये गाय घर में भी आराम से घूम-खेल सकती है, जिससे घर में सकारात्मक ऊर्जा बढ़ती है.”

पीएम मोदी के आवास पर भी मौजूद है पुंगनूर गाययह भी उल्लेखनीय है कि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के सरकारी आवास पर भी पुंगनूर नस्ल की गायें हैं, जिनके साथ उनके कई फोटो सोशल मीडिया पर वायरल हुए थे, जिससे इस नस्ल की प्रसिद्धि और बढ़ी है.

मूत्र में एंटीबैक्टीरियल गुण, किसान करते उपयोगपुंगनूर गाय के मूत्र में एंटीबैक्टीरियल गुण पाए जाते हैं. किसान इसका उपयोग फसल पर छिड़काव के रूप में करते हैं, जिससे फसल को कीटों से सुरक्षा मिलती है और यह जैविक खेती को बढ़ावा देता है.

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