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राजस्थान टेराकोटा कला: 200 साल पुराना इतिहास और रोजगार

Last Updated:January 05, 2026, 11:34 IST

Rajasthan Terracotta Art History and Demand: राजस्थान की 200 साल पुरानी टेराकोटा कला आज हजारों लोगों की आजीविका का साधन है. जयपुर के विंटर फेयर में इस कला के उत्पादों की भारी मांग देखी जा रही है. यह कला न केवल सजावटी सामान बनाती है, बल्कि ग्रामीण महिलाओं को भी आर्थिक रूप से सशक्त कर रही है.

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Rajasthan Terracotta Art History and Demand: राजस्थान की माटी में रची-बसी कला: टेराकोटा का गौरवशाली इतिहास राजस्थान की पहचान केवल उसके किलों और महलों से ही नहीं, बल्कि यहाँ की मिट्टी-मिट्टी में रची-बसी कला संस्कृति से भी है. प्रदेश की विश्वप्रसिद्ध ‘टेराकोटा कला’ इसका सबसे जीवंत उदाहरण है. लगभग 200 वर्षों से अधिक पुरानी यह कला आज भी हुनरमंद शिल्पकारों के जरिए जीवित है. खासतौर पर राजसमंद जिले से शुरू हुई यह कला अब राजस्थान के हर कोने में अपनी अलग पहचान बना चुकी है. जयपुर में आयोजित विंटर फेयर में इन दिनों टेराकोटा से बनी मूर्तियों, पेंटिंग्स और गुलदस्तों को देखने के लिए लोगों की भारी भीड़ उमड़ रही है.

विंटर फेयर में हिस्सा लेने आए शिल्पकार सुनित प्रजापति ने ‘लोकल-18’ से खास बातचीत में बताया कि वह अपने परिवार की तीसरी पीढ़ी हैं जो इस मिट्टी की कला को आगे बढ़ा रहे हैं. सुनित के अनुसार, टेराकोटा कला में सभी सुंदर आइटम्स प्राकृतिक मिट्टी से तैयार होते हैं. इनमें सबसे ज्यादा मांग वॉटर फाउंटेन, फ्लावर पॉट और देवी-देवताओं की मूर्तियों की रहती है. बड़े शहरों और आधुनिक घरों में सजावटी सामान (डेकोरेटिव आइटम्स) के रूप में इनकी खूब डिमांड है, जिससे यह कला आज भी हजारों लोगों को रोजगार दे रही है.

परंपरा और आधुनिकता का अनूठा संगम टेराकोटा की कला

केवल मिट्टी को आकार देना नहीं है, बल्कि यह पवित्र परंपराओं को दर्शाने का एक माध्यम भी है. इसमें बनने वाली कलाकृतियां अक्सर आदिवासी मान्यताओं और मंदिर अनुष्ठानों पर आधारित होती हैं. जटिल डिजाइनों के माध्यम से शिल्पकार मिट्टी में जान फूंक देते हैं. राजस्थान के ग्रामीण इलाकों में बनने वाले गमले, फूलों के स्टैंड और मूर्तियां अपनी मजबूती और फिनिशिंग के लिए जानी जाती हैं. यही कारण है कि स्थानीय बाजारों के साथ-साथ विदेशों में भी इन उत्पादों की भारी मांग बनी रहती है.

महिला सशक्तिकरण का जरिया बनी टेराकोटा कला

यह कला न केवल सांस्कृतिक विरासत को सहेज रही है, बल्कि ग्रामीण अर्थव्यवस्था की रीढ़ भी बन गई है. जिला प्रशासन और स्वयं सहायता समूहों (SHG) के सहयोग से हजारों महिलाएं इस काम से जुड़ी हैं. घर बैठे मिट्टी के सजावटी सामान तैयार कर महिलाएं महीने में 15 से 20 हजार रुपए तक कमा रही हैं. यह कला महिलाओं को आर्थिक रूप से आत्मनिर्भर बना रही है. राजस्थान के अलग-अलग जिलों में टेराकोटा के स्वरूप में भिन्नता जरूर है, लेकिन इसकी आत्मा वही पुरानी मिट्टी और शिल्पकारों की मेहनत है.

About the Authorvicky Rathore

Vicky Rathore is a multimedia journalist and digital content specialist with 8 years of experience in digital media, social media management, video production, editing, content writing, and graphic, A MAJMC gra…और पढ़ें

Location :

Jaipur,Jaipur,Rajasthan

First Published :

January 05, 2026, 11:34 IST

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राजस्थान की मिट्टी में बसी 200 साल पुरानी टेराकोटा विरासत, जो आज भी करा रही…

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