धरोहर: अनूठी स्थापत्य कला और जुड़वा मंदिर परंपरा समेटे खड़ा है सास-बहू मंदिर

Last Updated:December 03, 2025, 19:13 IST
धरोहर: उदयपुर के कैलाशपुरी स्थित सास-बहू मंदिर, जिसे सहस्त्रबाहु मंदिर भी कहते हैं, जुड़वा मंदिर परंपरा, स्थापत्य कला और पर्यटन का अनूठा केंद्र बन गया है.
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उदयपुर : Local 18 की धरोहर सीरीज में आज हम आपको उदयपुर शहर की एक ऐसी अनोखी और प्राचीन धरोहर से रूबरू करवाने जा रहे हैं, जो इन दिनों प्री-वेडिंग शूट और पर्यटन के लिए एक खास आकर्षण बन चुकी है. बात हो रही है कैलाशपुरी स्थित प्रसिद्ध सास-बहू मंदिर, जिसे इतिहास में सहस्त्रबाहु मंदिर के नाम से जाना जाता है. यह मंदिर नागदा के समय की स्थापत्य कला का उत्कृष्ट उदाहरण माना जाता है और मेवाड़ के उस कालीन राजा द्वारा इसका निर्माण कराया गया था.
कहा जाता है कि यहां बने दो मंदिरों में से एक भगवान विष्णु को समर्पित था, जबकि दूसरा भगवान शिव की पूजा के लिए निर्मित किया गया था. इतिहास में वर्णन मिलता है कि राजा की माता विष्णु भक्त थीं और उनकी पत्नी शिव की उपासक थीं. इसी वजह से इस मंदिर का निर्माण करवाया गया, जो आगे चलकर जुड़वां मंदिरों की परंपरा का प्रतीक भी माना गया.
मुगल हमलों में खंडित हुईं मंदिर की मूर्तियांमुगल काल के आक्रमणों के दौरान मंदिरों को काफी क्षति पहुंचाई गई. हमले में दोनों मंदिरों की मूर्तियां खंडित कर दी गईं, जिसके कारण आज यहां पूजा-अर्चना सामान्य रूप से नहीं होती. इसके बावजूद यह स्थान धार्मिक आस्था से अधिक इतिहास, कला और स्थापत्य के अद्भुत स्वरूप के रूप में अपनी अलग पहचान बनाए हुए है.
भारत की जुड़वा मंदिर परंपरा का अनूठा उदाहरणउदयपुर के प्रख्यात इतिहासकार श्री कृष्णा जुगनू बताते हैं कि भारत में जुड़वा मंदिरों की परंपरा हजारों साल पुरानी है. इसी परंपरा का अनूठा उदाहरण यह सास-बहू मंदिर भी है, जो भगवान विष्णु और शिव दोनों को समर्पित था. हालांकि आक्रमणकारियों द्वारा मूर्तियां हटा दी गईं, लेकिन मंदिर की नक्काशी और कलाकृति अपनी भव्यता आज भी बरकरार रखे हुए है.
फोटोग्राफी का नया हॉटस्पॉट बना सास-बहू मंदिरमंदिर परिसर में बनी सूक्ष्म नक्काशी, देवकला, हजारों साल पुराने पत्थरों की कारीगरी और दीवारों पर उकेरी गई लघु आकृतियां इतनी मनमोहक हैं कि हर पर्यटक को मंत्रमुग्ध कर देती हैं. यहां आने वाले विदेशी पर्यटक भी भारतीय शिल्पकला की इस अनमोल धरोहर को देखकर आश्चर्यचकित रह जाते हैं.आज यह मंदिर पूजा स्थल से अधिक फोटोग्राफी, प्री-वेडिंग शूट और पर्यटन का लोकप्रिय बन चुका है. चारों ओर फैला शांत वातावरण और पहाड़ों से घिरा प्राकृतिक सौंदर्य यहां के दृश्य को और भी खूबसूरत बना देता है. सास-बहू मंदिर केवल एक प्राचीन संरचना नहीं, बल्कि मेवाड़ की सांस्कृतिक विरासत, स्थापत्य प्रतिभा और हजारों साल पुरानी कला का जीवंत प्रतीक है, जो आज भी उदयपुर की धरोहरों में गर्व से खड़ा है.
About the AuthorRupesh Kumar Jaiswal
रुपेश कुमार जायसवाल ने दिल्ली यूनिवर्सिटी के ज़ाकिर हुसैन कॉलेज से पॉलिटिकल साइंस और इंग्लिश में बीए किया है. टीवी और रेडियो जर्नलिज़्म में पोस्ट ग्रेजुएट भी हैं. फिलहाल नेटवर्क18 से जुड़े हैं. खाली समय में उन…और पढ़ें
Location :
Udaipur,Rajasthan
First Published :
December 03, 2025, 19:13 IST
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धरोहर : उदयपुर का प्राचीन ‘सास-बहू मंदिर’, जहां इतिहास और स्थापत्य साथ बसा है



