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बाबरी पर बवाल: हुमायूं कबीर ने क्या खोद दी ममता की सियासी कब्र? मुस्लिम वोट बैंक दरकने का खतरा

बाबरी मस्‍ज‍िद की नींव डालने का ख्‍वाब देखना हुमायूं कबीर को भारी पड़ा. ममता को लगा क‍ि इससे ह‍िन्‍दू एकजुट हो जाएंगे और उनका सिंहासन डोल जाएगा. आनन फानन में उन्‍होंने हुमायूं कबीर को ही पार्टी से सस्‍पेंड कर द‍िया. लेकिन ममता के इस एक्‍शन ने पश्च‍िम बंगाल का सियासी समीकरण उलझा द‍िया है. ममता बनर्जी के लिए यह स्थिति ‘आगे कुआं, पीछे खाई’ जैसी हो गई है. एक तरफ भाजपा का बढ़ता हिंदुत्व कार्ड है, तो दूसरी तरफ उनकी अपनी पार्टी का कोर वोटर मुस्लिम समुदाय, जो अब हुमायूं कबीर की बर्खास्तगी को एक ‘विश्वासघात’ की तरह देख सकता है. क्या आगामी विधानसभा चुनावों में ममता का यह दांव उल्टा तो नहीं पड़ेगा?

हुमायूं कबीर कोई साधारण विधायक नहीं हैं. मुर्शिदाबाद की राजनीति में उनकी हैसियत एक मास लीडर की है. उनका करियर कांग्रेस से शुरू हुआ, वे मंत्री बने, फिर टीएमसी में आए, बीच में 2019 में भाजपा में गए और फिर टीएमसी में लौट आए. इतनी बार पाला बदलने के बावजूद, उनकी निजी लोकप्रियता खासकर भारतपुर और रेजीनगर इलाके में कभी कम नहीं हुई.

मुस्लिमों में उनकी पकड़

हुमायूं कबीर की छवि एक ऐसे नेता की है जो समुदाय के मुद्दों पर अपनी ही सरकार से भिड़ने को तैयार रहता है. जब उन्होंने मुर्शिदाबाद में 6 दिसंबर 2025 को ‘बाबरी मस्जिद’ की आधारशिला रखने की बात कही, तो यह महज एक बयान नहीं था. उन्होंने साफ कहा, 25 बीघा जमीन पर इस्लामिक अस्पताल, रेस्ट हाउस, होटल-कम-रेस्टोरेंट, हेलीपैड, पार्क और मेडिकल कॉलेज बनेगा… हुमायूं कबीर को कौन रोक सकता है? मैं चुनौती देता हूं.

उनका यह ‘रॉबिनहुड’ वाला अंदाज उन्हें मुस्लिम युवाओं और ग्रामीण वोटरों के बीच बेहद लोकप्रिय बनाता है. उनके समर्थकों को लगता है कि ममता दीदी दिल्ली के डर से या हिंदू वोटों के लिए मुस्लिम मुद्दों को दबा रही हैं, जबकि हुमायूं कबीर उनकी आवाज उठा रहे हैं.

बाबरी मस्जिद का दांव और ममता की मजबूरी

ममता बनर्जी खुद को सेक्यूलरिज्म की सबसे बड़ी पैरोकार मानती हैं. लेकिन हुमायूं कबीर का दांव उनके लिए गले की हड्डी बन गया. अगर ममता बनर्जी हुमायूं कबीर को बाबरी मस्जिद या उसके नाम पर कोई स्मारक बनाने देतीं, तो भाजपा इसे पूरे बंगाल और देश भर में भुना लेती. भाजपा इसे ‘तुष्टिकरण की पराकाष्ठा’ और ‘हिंदुओं का अपमान’ बताकर ध्रुवीकरण करती. यही वजह है कि ममता के सिपहसालार फिरहाद हकीम ने तुरंत प्रेस कॉन्फ्रेंस कर कबीर को सस्पेंड किया. हकीम ने तर्क दिया, हम धर्म के नाम पर भेद करने वाली राजनीति नहीं करते. हुमायूं कबीर भाजपा की मदद कर रहे हैं और बंगाल में आग लगाने की कोशिश कर रहे हैं. ममता बनर्जी ने भी अपनी रैली में बिना नाम लिए कहा, हम सांप्रदायिक राजनीति के खिलाफ हैं, मुर्शिदाबाद के लोग दंगा नहीं चाहते.

एक्सपर्ट्स का कहना है कि ममता ने यह कदम ‘हिंदू वोट बैंक’ को खिसकने से बचाने के लिए उठाया है. वे नहीं चाहतीं कि संदेशखाली या आरजी कर की घटनाओं के बाद उन पर ‘एंटी-हिंदू’ होने का एक और ठप्पा लगे.

क्या मुस्लिम वोट बैंक छिटक जाएगा?

यही वह बिंदु है जहां ममता बनर्जी के लिए खतरा सबसे बड़ा है. कांग्रेस नेता अधीर रंजन चौधरी ने बिल्कुल सटीक नस पकड़ी है. उन्होंने कहा, ममता बनर्जी की पार्टी उन्हें लंबे समय से बचा रही थी… अब जब लगा कि मामला हाथ से निकल रहा है, तो इस्तेमाल करो और फेंको की नीति अपना ली.

पश्चिम बंगाल में करीब 30% मुस्लिम आबादी है. मुर्शिदाबाद, मालदा और उत्तर दिनाजपुर में यह आंकड़ा 60-70% तक जाता है. अब तक यह वोट बैंक एकमुश्त टीएमसी को मिलता रहा है. लेकिन हुमायूं कबीर का सस्पेंशन मुस्लिम समुदाय में यह संदेश दे सकता है कि ममता बनर्जी अब ‘सॉफ्ट हिंदुत्व’ की राह पर हैं. राम मंदिर पर भाजपा मुखर है, लेकिन बाबरी के नाम पर टीएमसी अपने ही विधायक का गला घोंट रही है. अगर यह नैरेटिव जमीन पर सेट हो गया, तो टीएमसी को भारी नुकसान उठाना पड़ सकता है.

अगर कबीर ने अलग पार्टी बनाई तो क्या होगा?

राजनीतिक पंडितों का मानना है कि हुमायूं कबीर शांत बैठने वालों में से नहीं हैं. उन्होंने पहले ही कहा था कि वे अगले दिन पार्टी छोड़ देंगे. अगर वे निर्दलीय लड़ते हैं या अपनी नई पार्टी बनाते हैं, तो इसके तीन बड़े असर होंगे.

वोट कटवा भूमिका: कबीर मुर्शिदाबाद की 4-5 विधानसभा सीटों पर सीधा प्रभाव रखते हैं और पूरे जिले में 10-12 सीटों पर टीएमसी का खेल बिगाड़ सकते हैं.
ISF और कांग्रेस को संजीवनी: अगर हुमायूं कबीर, पीरजादा अब्बास सिद्दीकी (ISF) और कांग्रेस के साथ कोई गठबंधन कर लेते हैं, तो यह ‘तीसरा मोर्चा’ मुर्शिदाबाद में टीएमसी का सूपड़ा साफ कर सकता है. अधीर रंजन चौधरी पहले से ही मौके की ताक में हैं.
भाजपा को फायदा: टीएमसी नेता कुणाल घोष और फिरहाद हकीम बार-बार कह रहे हैं कि कबीर भाजपा की ‘पाइपलाइन’ का हिस्सा हैं. अगर मुस्लिम वोट टीएमसी और कबीर/कांग्रेस के बीच बंटता है, तो इसका सीधा फायदा भाजपा को होगा. हिंदू वोट एकजुट होकर भाजपा की झोली में जा सकता है. भाजपा सांसद खगेन मुर्मू का बयान इसी आत्मविश्वास को दिखाता है. जनता ने टीएमसी की विदाई की तैयारी कर ली है.

6 दिसंबर का अल्टीमेटम

मामला सिर्फ राजनीति तक सीमित नहीं है. हुमायूं कबीर के ऐलान के खिलाफ कलकत्ता हाईकोर्ट में एक याचिका भी दायर की गई है, जिसमें 6 दिसंबर 2025 को बेलडांगा में होने वाले शिलान्यास कार्यक्रम पर रोक लगाने की मांग की गई है. याचिकाकर्ता का कहना है कि कबीर के बयान भड़काऊ हैं और इससे सांप्रदायिक सौहार्द बिगड़ सकता है. अगर प्रशासन उन्हें रोकता है तो कबीर इसे ‘शहादत’ की तरह पेश करेंगे. वे कहेंगे कि पुलिस और सरकार ने उन्हें समुदाय के लिए काम करने से रोका. यह ‘विक्टिम कार्ड’ उन्हें और ज्यादा हीरो बनाएगा.

क्या यह टीएमसी का ‘सेल्फ गोल’ है?

राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि ममता बनर्जी ने हुमायूं कबीर को सस्पेंड तो कर दिया, लेकिन उन्हें निष्कासित नहीं किया. अधीर रंजन चौधरी ने भी इस पर तंज कसा है कि उन्हें पहले भी सस्पेंड किया गया था और फिर बहाल कर दिया गया. यह दर्शाता है कि टीएमसी अभी भी कबीर के प्रभाव से डर रही है. वे दरवाजे पूरी तरह बंद नहीं करना चाहते.

नुकसान का गणित

अगर कबीर बगावत पर उतर आए, तो मुर्शिदाबाद, जो टीएमसी का गढ़ बन चुका था, वहां दरार पड़ जाएगी. 2021 के चुनावों में टीएमसी ने यहां क्लीन स्वीप किया था, लेकिन 2024 के लोकसभा चुनावों में कांग्रेस और वामपंथियों ने अपनी उपस्थिति दर्ज कराई थी. कबीर का जाना टीएमसी के किले में बारूद बिछाने जैसा होगा. इस प्रकरण ने ममता की छवि को ‘सर्वमान्य नेता’ से बदलकर एक ‘असुरक्षित नेता’ की तरह पेश किया है जो अपनी ही पार्टी के भीतर उठ रही आवाजों को संभालने में नाकाम हो रही हैं.

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