योद्धा: रेलवे के सीनियर टीटीई बने ‘जिंदगी बचाने वाले योद्धा’, 60 बार रक्त और प्लेटलेट डोनेट कर बचाई कई जानें

पाली. ड्यूटी के साथ-साथ लोगों के जीवन को महत्व देते हुए उनकी जान बचाने का काम करना शायद हर किसी के लिए संभव नही. हो पाता, लेकिन उत्तर पश्चिम रेल मंडल जोधपुर में कार्यरत सीनियर ट्रेवल टिकट एग्जामिनर प्रकाश चौधरी इन दोनों दायित्वों को बखूबी निभाने का काम कर रहे हैं. अपनी रेलवे की ड्यूटी के साथ-साथ जब-जब भी उनको यह पता चलता है कि किसी को ब्लड की जरूरत है, वहां पर भी उसकी जान बचाने से पीछे नहीं हटते हैं. यही वजह है कि गोयल अस्पताल में भर्ती मरीज हीरालाल की आपातकालीन आवश्यकता को देखते हुए एसडीपी (सिंगल डोनर प्लेटलेट्स ) डोनेट करने का काम किया और उसकी जिंदागी को भी बचाया.
प्रकाश चौधरी का यह पहला नहीं बल्कि 40वीं बार था, जब वह एसडीपी डोनेट कर रहे हैं. इसके साथ ही अब तक उनके द्वारा किए गए कुल डोनेशन की संख्या 60 पूरी हो चुकी है. चाहे जोधपुर हो या पाली ड्यूटी के दौरान प्रकाश होते हैं तो वह मरीज की जान बचाने से पीछे नहीं हटते. जरूरतमंद मरीजों के लिए जिंदगी बचाने वाले योद्धा के रूप में प्रकाश चौधरी काम कर रहे हैं जिसके चलते उनको रेलवे द्वारा भी कई पुरस्कार मिल चुके हैं.
जीवन बचाने से बड़ा पुण्य कोई नहीं है
प्रकाश चौधरी का कहना है कि “अगर हमारे रक्त या प्लेटलेट से किसी की जान बच सकती है, तो इससे बड़ा कोई पुण्य नहीं.” उनकी यह सोच समाज के लिए प्रेरणा बन रही है. रेलवे सेवा के साथ-साथ लगातार जरूरतमंदों की मदद करना आसान नहीं होता, लेकिन प्रकाश चौधरी ने यह साबित कर दिया है कि इच्छाशक्ति हो तो सेवा के रास्ते खुद बन जाते हैं. उनके इस कार्य से न केवल मरीजों को नई जिंदगी मिल रही है, बल्कि युवाओं को भी रक्तदान के लिए प्रेरणा मिल रही है.
ऐसे रक्तदान करने के लिए हुआ प्रेरित
2008 की बात है जब जोधपुर में मेरे पिता की बायपास सर्जरी थी उस समय ब्लड की जरूरत थी, तो उनको ब्लड देने में सक्षम नहीं था. उस दौरान कई भाई ऐसे थे, जिन्होंने उस समय में मेरी मदद की. वहीं से मैने तय किया कि मेरी उम्र जब 18 वर्ष जब हो जाएगी तब मैं भी रक्तदान कर लोगों की इसी तरह से सहायता करूंगा.
ड्यूटी और सेवा के कार्य दोनों के बीच रखते हैं बैलेंस
ड्यूटी और रक्तदान दोनों काम चलता रहाता है. दोनों के बीच बैलेंस बनाकर चलता हूं. ड्यूटी भी सर्वौपरी है उसके बाद जो समय होता है, उसमें रेस्ट की बजाय अगर मेरे पास कॉल आता है तो मैं यह नहीं सोचता कि मैं रेस्ट करूं. कोशिश यही रहती है लोगों की जान बचा सकू. मैं रक्तदान या एसडीपी देता हूं तो गर्व होता है कि मेरी वजह से उनकी जान बची. ड्यूटी के दौरान भी कई बार ऐसे पल आए हैं,जब लोगों को ब्लड की जरूरत पड़ी है और समय पर रक्तदान कर लोगों की जान बचाई है. इस कार्य में सभी बड़े अधिकारियों का पूा सपोर्ट मिलता है. यही वजह है कि जरूरतमंदों की सेवा कर पाता हूं. उन्होंने बताया कि अब तक 17 बार रक्तदान, 40 बार एसडीवी, 3 बार प्लाज्मा डोनेट कर चुके हैं.



