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सर्दी-खांसी पास नहीं भटकेगी! ‘सोंठ लड्डू’ परंपरा बनी गांव से शहर तक का सुपरफूड, डिलीवरी के बाद दें खुराक – Chhattisgarh News

बिलासपुर. ठंड के मौसम में छत्तीसगढ़ के ग्रामीण इलाकों में आज भी परंपरा और स्वास्थ्य एक साथ चलते हैं, जहां आधुनिक दवाइयों और सप्लीमेंट की उपलब्धता बढ़ गई है. वहीं गांवों में आज भी प्रसव के बाद महिलाओं की मजबूती और देखभाल के लिए सोंठ, अर्शी और तिल के लड्डू तैयार किए जाते हैं. ये सिर्फ प्रसूति आहार नहीं, बल्कि ठंड में सभी उम्र के लोगों के लिए सेहत का प्राकृतिक कवच माने जाते हैं. खासकर सोंठ वाला लड्डू, जिसे ग्रामीण महिलाएं कहती हैं “सुबह खा लो, सर्दी-खांसी पास भी नहीं फटकेगी.”

डिलीवरी के बाद पहला पोषणछत्तीसगढ़ की ग्रामीण महिलाएं प्रसव के बाद नई मां को कमजोरी, दर्द और ऊर्जा की कमी से उबारने के लिए तीन तरह के लड्डू तैयार करती हैं– सोंठ के लड्डू, अर्शी (अरसी) के लड्डू, तिल के लड्डू, चिकित्सा और आयुर्वेद मानते हैं कि प्रसव के बाद शरीर को पाचन, ऊर्जा, और गर्माहट देने वाला भोजन बेहद ज़रूरी होता है और ये लड्डू उसी जरूरत को पूरा करते हैं.

गयाबाई की रसोई की पारंपरिक विधिबिलासपुर की गयाबाई बताती हैं, “हम लोग ये लड्डू बहुत पहले से बना रहे हैं. सोंठ में ड्राई फ्रूट, गुड़ और करैर मिलाते हैं. ये नई माई ला ताकत देथे, दूध बढ़ते, हड्डी मजबूत होते.” सोंठ, गुड़ और करैर से बना मिश्रण शरीर को भीतर से गर्म करता है और दर्द, कमजोरी और थकान को कम करता है.

तिल और अर्शी के लड्डूतिल खून बढ़ाता है और शरीर में गर्माहट बनाए रखता है. अर्शी (अरसी आटा) कैल्शियम और आयरन से भरपूर होता है, जो हड्डियों और हड्डी दर्द में बेहद फायदेमंद है.

सिर्फ प्रसूता नहीं — सर्दी-खांसी से बचाने में भी कारगरछत्तीसगढ़ में कई परिवारों में सोंठ के लड्डू को सिर्फ नई माताओं तक सीमित नहीं रखा जाता, बल्कि ठंड में बच्चों, बुजुर्गों और कमजोर लोगों को भी दिया जाता है.लोग मानते हैं — सुबह खाली पेट या शाम चाय के साथ एक सोंठ लड्डू सर्दी-खांसी दूर रखता है. बलगम, जुकाम, गले के दर्द और संक्रमण से शरीर को बचाता है. मौसम बदलने पर प्रतिरोधक क्षमता (इम्युनिटी) बढ़ाता है.

इन लड्डुओं के प्रमुख फायदेप्रतिरोधक क्षमता बढ़ाते हैं, दूध उत्पादन बढ़ाने में मददगार, ठंड में शरीर को गर्म रखते हैं, पाचन मजबूत करते हैं, हड्डियों और जोड़ के दर्द में राहत, प्रसव के बाद कमजोरी दूर करते हैं.

परंपरा जो स्वाद नहीं, सेहत की विरासत हैआज जब शहरों में इंस्टेंट फूड और रेडी-टू-ईट प्रोडक्ट्स का चलन बढ़ रहा है, वहीं गयाबाई जैसी महिलाएं इस पारंपरिक ज्ञान को आगे बढ़ा रही हैं. उनके लिए ये सिर्फ लड्डू नहीं, मातृत्व की जिम्मेदारी, परिवार की सेहत और पीढ़ियों का अनुभव है. ठंड में इन पारंपरिक लड्डुओं की मांग न सिर्फ ग्रामीण इलाकों में, बल्कि अब शहरी परिवारों में भी बढ़ने लगी है. आधुनिक दुनिया में प्राकृतिक पोषण की ओर लौटने की यह परंपरा बताती है कि कभी-कभी समाधान दवा में नहीं, बल्कि दादी-नानी की रसोई में ही मिलता है.

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