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जयपुर के विंटर फेयर में साऊथ की लेदर पपेट्स कला का जलवा, 20 हजार तक बिके आर्ट पीस

Last Updated:January 03, 2026, 13:26 IST

Jaipur Winter Fair : जयपुर अपनी कला और संस्कृति के लिए हमेशा से खास पहचान रखता है. सर्दियों के मौसम में आयोजित विंटर फेयरों में देशभर की पारंपरिक कलाओं का संगम देखने को मिल रहा है. राजसखी राष्ट्रीय मेले में इस बार साऊथ इंडिया की प्राचीन लेदर पपेट्स कला लोगों के बीच खास आकर्षण का केंद्र बनी हुई है.

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जयपुर : जयपुर कला संस्कृति से जुड़ा हुआ ऐसा अनोखा शहर है जहां आज भी लोग पेंटिंग, शिल्पकला, मूर्तिकला और हर प्रकार की कला के महत्व देते हैं इसलिए राजस्थान के साथ साथ यहां लोग भारत के हर राज्य की कला को खूब पंसद करते हैं ऐसे ही अभी सर्दियों के सीजन में जयपुर के अलग-अलग इलाकों में चल रहे विंटर फेयरों में भारत के अलग-अलग राज्यों से कलाकार ऐसी कलाओं को लेकर पहुंचे हैं जो प्राचीन समय से भारत की संस्कृति के साथ जुड़ी रही हैं, राजसखी राष्ट्रीय मेले में ऐसे ही साऊथ इंडिया से आर्टिस्ट ख़ासतौर पर साऊथ इंडिया की फेमस लेदर पपेट्स कला को लेकर पहुंचे हैं जो राजस्थान की कठपुतली कला से ही मिलती जुलती हैं, लोकल-18 कर्नाटक और आंध्रप्रदेश से आए लेदर पपेट्स कला के कलाकारों से इस खास कला को लेकर बात की तो कर्नाटक के चिपबलापुर जिले से आए रमणा बताते हैं कि यह कला साऊथ इंडिया की सबसे प्राचीन कलाओं में से एक हैं जिसमें खासतौर पर छाया-कठपुतली के रूप में देखा जाता है.

जिसमें अलग-अलग जानवरों के चमड़े को सुखाकर उनपर बेहतरीन चित्रण किया जाता है इसलिए इसे चर्म चित्रकला भी कहते हैं. इस कला में खासतौर पर पौराणिक कथाओं, लोककथाओं और भगवान की तस्वीरें जैसे भगवान राम, हनुमान, शिव, कृष्ण के चित्रों को उकेरा जाता है प्राचीन समय में इस कला से रंगीन डिज़ाइन बनाकर पर्दे के पीछे से रोशनी के ज़रिए कठपुतली शो दिखाया जाता था जैसे राजस्थान में कठपुतली कला है वैसे ही यह लेदर पपेट्स की कला है जो अब घरों में वॉल हैंगिंग, डोर हैंगिंग और लैम्प सेट के रूप में होम डेकोर की सजावट के रूप में इन्हें लोग सबसे ज्यादा पंसद करते हैं.

कैसे तैयार होती है लेदर पपेट्स की यह कला लोकल-18 से बात करते हुए रमणा बताते हैं कि वर्षों से हम पीढ़ी दर पीढ़ी इस कला कै आगे बढ़ाते आ रहे हैं, कला सिर्फ़ मनोरंजन ही नहीं, बल्कि एक सांस्कृतिक परंपरा है जो भारतीय इतिहास, धर्म और नैतिक शिक्षाओं को दर्शाती है. जैसे जिस लेदर से ढोलक बनती है, उसी तरह के चमड़े का उपयोग पपेट आर्ट में किया जाता है. लेदर पपेट्स बनाने के लिए पहले लेदर को सुखाया जाता है और सूख जाने के बाद इस पर सुंदर चित्रण किया जाता है, लेकिन अब इस कला को हम सबसे ज्यादा वॉल पेंटिंग, टेबल लैंप पेंटिंग, फ्लोर लैंप पेटिंग, कैलेंडर लैंप पेंटिंग के रूप में तैयार करते हैं जिनमें बेहतरीन लाइटिंग के साथ लोग घरों में सजावट के रूप में सबसे ज्यादा पंसद करते हैं. लेदर पपेट्स की इस कला की सबसे खास बात यह है कि एक बार बनाए गए चित्र पानी से भी खराब नहीं होती है. इस लेदर सीट को एक खांचे से तैयार किया जाता है उसके बाद उसमें सूई से छेद क्या जाता है और अलग-अलग कलर के हिसाब से चित्रकारी की जाती है इस तरह काफी बारिकी से लेदर पपेट्स आर्ट तैयार होता है.

20 हजार रुपए तक होती हैं लेदर पपेट्स तैयारजयपुर के विंटर फेयरों में अभी साऊथ इंडिया की इस लेदर पपेट्स की कला लोग ख़ूब पंसद करते हैं. लेदर पपेट्स की कला की आर्ट से तैयार चीजों की जयपुर में खूब डिमांड है, रमणा बताते हैं वह अपने घर से जितनी भी चीजें लेदर पपेट्स की वस्तुएं लेकर आए थे लोगों ने उनकी जमकर खरीदारी की है अगर बात करें लेदर पपेट्स की कीमत की तो अलग-अलग लैंप और चर्म चित्रों की पेंटिंग की कीमत 400 रूपए से लेकर हजारों रुपए तक होती हैं जिसमें लोग लेदर पपेट्स की सुंदरता और अपने बजट के हिसाब से इन्हें खरीद रहे हैं. जयपुर के राजसखी फेयर में लेदर पपेट आर्ट के काउंटर पर लोगों की भीड़ देखने को मिल रही है, लोग इस कला को बेहद गोर करके देखते हैं क्योंकि राजस्थान में ऐसी कला नहीं हैं यहां पेंटिंग का आर्ट सबसे ज्यादा फेमस है. जिसके चलते लेदर पपेट्स की कला को लोग खूब पंसद कर रहे हैं.

About the AuthorRupesh Kumar Jaiswal

A Delhi University graduate with a postgraduate Diploma in Journalism and Mass Communication, I work as a Content Editor with the Rajasthan team at India Digital. I’m driven by the idea of turning raw in…और पढ़ें

Location :

Jaipur,Rajasthan

First Published :

January 03, 2026, 13:26 IST

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जयपुर विंटर फेयर में साउथ इंडिया की लेदर पपेट्स की लोकप्रियता

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