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पुतिन के लिए भारत क्यों है रूस का सबसे भरोसेमंद रणनीतिक साझेदार, जानिए

राष्ट्रपति व्लादिमीर पुतिन का भारत के प्रति स्नेह केवल औपचारिक नहीं, बल्कि एक गहरी रणनीतिक समझ पर आधारित है. पूर्व KGB अधिकारी होने के नाते वह इशारों और इरादों को पढ़ने की क्षमता रखते हैं—और भारत में उन्हें जो विरला गुण दिखता है, वह है साफ-सच्चाई, वह भी बिना किसी दिखावे के. भारत वह साझेदार है जिसने हर परीक्षा में भरोसा दिया है. न शोर-शराबा, न दिखावा—बस स्थिर, विश्वसनीय और सम्मानजनक रिश्ता, इसीलिए पुतिन को दुनिया की किसी भी बड़ी शक्ति की तुलना में भारत के साथ कहीं ज़्यादा सहजता और भरोसा महसूस होता है और पुतिन इसी का सम्मान करते हैं.

इसे गहराई से समझने के लिए तीन परतों को समझना होगा—पहली, पुतिन का व्यक्तित्व; दूसरी, भारत-रूस रिश्तों का स्वभाव; और तीसरी, वह भू-राजनीति जो दोनों देशों को एक रणनीतिक धागे में पिरोती है.

पुतिन वह नेता नहीं हैं जो केवल चुनावी या तात्कालिक राजनैतिक लाभ में सोचते हैं. वह दशकों में सोचते हैं. एक केजीबी-प्रशिक्षित रणनीतिकार की तरह, जिसे पता है कि राष्ट्र ऊँचे-ऊँचे बयानों या अस्थायी गठजोड़ों पर नहीं, बल्कि लंबे समय से परखे गए भरोसेमंद संबंधों पर टिकते हैं. पुतिन की नजर में रूस का भविष्य कुछ चुनिंदा विश्वसनीय साझेदारों पर निर्भर करता है—ऐसे देश जो वैश्विक शक्ति-संतुलन कायम रख सकें, मास्को को रणनीतिक सहारा दे सकें, कभी-कभी शत्रुतापूर्ण वैश्विक माहौल में रूस को स्थिरता दे सकें. इस छोटी सी सूची में सबसे प्रमुख, सबसे भरोसेमंद और सबसे निरंतर साझेदार भारत है—और यही कारण है कि पुतिन भारत को सिर्फ एक मित्र नहीं, बल्कि रूस की दीर्घकालिक रणनीति का साझेदार मानते हैं.

पुतिन की कूटनीति की जड़ें शोर में नहीं, बल्कि मौन, निरीक्षण और वफादारी में हैं. केजीबी में बिताए वर्षों ने उन्हें यह सिखाया कि सबसे भरोसेमंद साथी वह होते हैं जो कम बोलते हैं, ज्यादा करते हैं. वह सामने वाले की हर चीज़ पढ़ते हैं—भाषा, स्वर, झिझक, आत्मविश्वास, आक्रामकता और संयम. और जब वह भारत के नेतृत्व को देखते हैं, तो उन्हें पूर्वानुमेयता, ईमानदारी और भू-राजनीतिक परिपक्वता का वह दुर्लभ मिश्रण दिखता है जो आज की वैश्विक राजनीति में लगभग खो चुका है. भारत न जल्दबाज़ी में फैसले लेता है, न भावनात्मक प्रतिक्रियाओं में बहता है और न ही नए संबंधों के लिए पुराने साझेदारों को त्यागता है. पुतिन की दृष्टि में रूस का भविष्य उन चुनिंदा, भरोसेमंद साझेदारों पर टिका है जो रणनीतिक गहराई, स्थिरता और संतुलन दे सकें. भारत उनके लिए सबसे विश्वसनीय, स्थिर और परिपक्व साझेदार के रूप में उभरता है.

रूस एक नए और अनिश्चित दौर में प्रवेश कर चुका है और पुतिन इससे पूरी तरह वाकिफ हैं. 2022 के बाद पश्चिम ने अपने दरवाज़े बंद कर दिए, यूरोप ने रूस से दूरी बना ली और वाशिंगटन ने मास्को को घेरने के लिए एक नया वैश्विक दबाव-तंत्र खड़ा कर दिया. पुतिन को इस सिकुड़ते कूटनीतिक दायरे का पूरा अहसास है. वह किसी से बेहतर जानते हैं कि रूस केवल चीन पर अपना भविष्य नहीं बना सकता, क्योंकि चीन-रूस साझेदारी उपयोगी तो है पर कभी पूरी तरह समान या पूरी तरह भरोसेमंद नहीं. बीजिंग तेजी से उभर रहा है, मध्य एशिया, आर्कटिक और यहां तक कि रूस के सुदूर पूर्वी बाजारों में भी अपना प्रभाव बढ़ा रहा है. पुतिन इन बदलावों को समझते हैं. वह चीन का सम्मान करते हैं, लेकिन रूस का भविष्य सिर्फ चीन पर, दांव पर लगाने के पक्ष में नहीं हैं.

एक ऐसा देश जो न तो मास्को पर हावी होने की कोशिश करता है, न ही उसके भू-राजनीतिक स्पेस में दखल देता है. भारत रूस के लिए वह संतुलन है जो न चीन दे सकता है, न पश्चिम. भारत आर्थिक रूप से बढ़ रहा है, सैन्य रूप से आधुनिक हो रहा है और कूटनीति में एक स्वतंत्र, संतुलित और आत्मविश्वास से उभर रहा है. यही वह तीन बातें हैं जो पुतिन को भारत में एक दीर्घकालिक साझेदार का भविष्य दिखाती हैं.

इसके अलावा, भारत ने पिछले एक दशक में कभी भी रूस को सार्वजनिक मंचों पर अकेला नहीं छोड़ा. चाहे S-400 की खरीद हो, चाहे आर्कटिक सहयोग या ऊर्जा साझेदारी—भारत हमेशा मुद्दे पर आधारित, सिद्धांत आधारित और दीर्घकालिक हितों पर आधारित निर्णय लेता रहा है. पुतिन के लिए यह ‘विश्वसनीयता’ सोने से भी अधिक कीमती है. दुनिया जहां तेजी से ध्रुवीकृत हो रही है, भारत उन कुछ देशों में से है जो हर शक्ति से बात कर सकता है, पर किसी शक्ति के दबाव में नहीं झुकता.

भारत न रूस की सीमा छूता है, न उसके भू-राजनीतिक प्रभाव क्षेत्र को चुनौती देता है. भारत का उत्थान रूस के लिए प्रतिस्पर्धा नहीं, बल्कि पूरक शक्ति है. पुतिन की दृष्टि में, एक मजबूत भारत एक स्थिर एशिया बनाता है — और एक स्थिर एशिया रूस के लिए अनिवार्य है. यही कारण है कि पुतिन के लिए भारत “दोस्त” नहीं, बल्कि “Pillar of Stability” है. एक ऐसा स्तंभ जिस पर रूस मुश्किल समय में भरोसा कर सकता है, वैश्विक असंतुलन में टिक सकता है और एशिया में अपनी रणनीतिक गहराई बनाए रख सकता है.

अंततः, पुतिन भारत को रूस के दीर्घ भविष्य के लिए स्थिरता प्रदान करने वाले स्तंभ के रूप में देखते हैं. एक ऐसा साझेदार जो चीन को संतुलित करने, पश्चिमी वर्चस्व का विरोध करने, आर्थिक अवसर देने और वैश्विक उथल-पुथल के दौरान मास्को के साथ खड़े होने में मदद कर सकता है. एक ऐसा देश जिसका उदय रूस को लाभ पहुंचाता है, नुकसान नहीं. एक ऐसा साथी जिसकी मित्रता गरिमा के साथ आती है, निर्भरता के साथ नहीं.

पुतिन भारत के प्रति भावनात्मक नहीं हैं—वह एक रणनीतिक, भविष्य-केंद्रित समझ के साथ भारत को महत्व देते हैं. उनके लिए, भारत सिर्फ एक मित्र नहीं है. भारत, रूस के भू-राजनीतिक संतुलन का सबसे मजबूत आधार है.

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