कहानी पैरा एथलीट संदीप सिंह की, पोलियो को मात देकर दुनिया को दिखाया दम, 40 से ज्यादा मेडल जीत चुके हैं

Last Updated:December 04, 2025, 13:50 IST
Jhunjhunu News : यह कहानी झुंझुनूं के पैरा एथलीट संदीप सिंह की है. संदीप बचपन से पोलियाग्रस्त थे. उनकी कमर के नीचे का हिस्सा बिल्कुल काम नहीं करता है. लेकिन संदीप ने अपनी कमजोरी को ही अपनी ताकत बना लिया. वे 1992 से लेकर अब तक 40 से ज्यादा मेडल जीत चुके हैं. जकार्ता में आयोजित अंतरराष्ट्रीय चैम्पियनशिप में भारत का प्रतिनिधित्व भी कर चुके हैं.
पैरा एथलीट संदीप सिंह ने संघर्षों की लंबी यात्रा तय की है. वे बचपन से पोलियो से ग्रसित हैं.
झुंझुनूं. हौसले अगर मजबूत हो तो शरीर की कोई कमी आपको सफलता दिलाने से रोक नहीं सकती. इसी हौंसले और जज्बे का जीता-जागता उदाहरण हैं झुंझुनूं के सुलताना गांव के संदीप सिंह. बचपन में लोग उन पर हंसते थे. लेकिन आज वही लोग उनकी मिसाल देते नहीं थकते. पोलियो के कारण संदीप की कमर से नीचे का हिस्सा उसका साथ नहीं देता, लेकिन उन्होंने हिम्मत नहीं हारी. पैरा एथलीट (शॉटपुट) बनकर उन्होंने ऐसा दमखम दिखाया कि अब 40 से ज्यादा मेडल जीतकर देश-दुनिया में अपना और अपने राज्य का नाम रोशन कर चुके हैं. उनका मूलमंत्र है कमजोरी नहीं, हिम्मत इंसान को विजेता बनाती है.
झुंझुनूं जिले के सुलताना गांव के पैरा एथलीट संदीप सिंह ने संघर्षों की लंबी यात्रा तय की है. वे बचपन से पोलियो से ग्रसित हैं. उनकी कमर के नीचे का हिस्सा न के बराबर काम करता है. लेकिन संदीप ने अपनी सीमाओं को अपनी ताकत बना लिया. वे 1992 से लेकर अब तक 40 से ज्यादा मेडल जीत चुके हैं और जकार्ता में आयोजित अंतरराष्ट्रीय चैम्पियनशिप में भारत का प्रतिनिधित्व भी कर चुके हैं. वे बचपन में जब दूसरों को खेलता देखते थे तो उनके मन में कसक उठती थी. वही कसक उन्हें आज सफलता के शिखर तक ले आई. संदीप आज खुद को ही अपना आइकन बताते हैं.
कमजोरियों को ही अपनी ताकत बना लियासंदीप बताते हैं कि पोलियो के बावजूद खेलने का सपना उन्होंने कभी नहीं छोड़ा. ट्राईसाइकिल के सहारे राजकीय स्कूल के मैदान तक पहुंचते थे. फिर वहीं से शुरू हुआ उनके खेल का सफर. शुरुआत में लोग देखकर हंसते थे. ताने मारते थे. लेकिन संदीप ने उन पर ध्यान नहीं दिया. अपनी कमजोरियों को ही अपनी ताकत बना लिया. संसाधनों का अभाव था. लिहाजा तैयारी पूरी नहीं हो पाती. फिर भी संदीप जब भी मैदान में उतरते तो मेडल जीतकर ही लौटते.
गोल्ड मेडल जीतकर दमदार वापसी कीसंदीप का कहना है कि सरकार की तरफ से दिव्यांग खिलाड़ियों के लिए कई योजनाएं तो हैं लेकिन उनका लाभ धरातल पर कम ही मिलता है. पदक जीतने के बाद मिलने वाली इनामी राशि के लिए महीनों और कई बार बरसों तक इंतजार करना पड़ता है. इन्हीं परेशानियों के कारण संदीप को एक समय खेल बीच में छोड़ना पड़ा. लेकिन 2008 में फिर से मैदान में लौटे. फरीदाबाद में शॉटपुट में गोल्ड मेडल जीतकर दमदार वापसी की.
ताने और मजाक को कभी दिल पर नहीं लियाउनके दोस्त शंकर सिंह बताते हैं कि संदीप ने शरीर का हिस्सा भले खो दिया हो, लेकिन उनका जज्बा कभी नहीं टूटा. ताने और मजाक को उन्होंने कभी दिल पर नहीं लिया. बस मंजिल पर नजर रखी. आज संदीप दूसरों के लिए प्रेरणा है. दिव्यांग बच्चों और युवाओं को बिल्कुल निशुल्क खेल प्रशिक्षण देते हैं. उन्हें नई दिशा दिखा रहे हैं. संदीप सिंह ने साबित कर दिया कि इच्छाशक्ति के सामने कोई कमजोरी मायने नहीं रखती. अपनी हिम्मत और जज्बे से उन्होंने ना सिर्फ सफलता पाई. बल्कि अब वे क्षेत्र के दिव्यांग खिलाड़ियों के लिए उम्मीद का उजाला बन चुके हैं. संदीप की यही कहानी उन्हें न सिर्फ हीरो बनाती है. बल्कि समाज के लिए एक प्रेरक संदेश भी देती है. कमजोरी नहीं, हिम्मत इंसान को विजेता बनाती है.
About the AuthorSandeep Rathore
संदीप राठौड़ ने वर्ष 2000 में भास्कर सुमूह से पत्रकारिता की जयपुर से शुरुआत की. बाद में कोटा और भीलवाड़ा में राजस्थान पत्रिका के रेजीडेंट एडिटर की जिम्मेदारी निभाई. 2017 से के साथ नए सफर की शुरुआत की. वर…और पढ़ें
Location :
Jhunjhunu,Jhunjhunu,Rajasthan
First Published :
December 04, 2025, 13:50 IST
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कहानी पैरा एथलीट संदीप सिंह की, पोलियो को मात देकर दुनिया को दिखाया दम



