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मुस्लिम तलाकशुदा महिलाओं को मेहर और गहनों पर सुप्रीम कोर्ट का हक

मुस्लिम महिलाओं के अधिकारों और गरिमा को सुनिश्चित करने की दिशा में सुप्रीम कोर्ट ने मंगलवार को एक मील का पत्थर साबित होने वाला फैसला सुनाया. शीर्ष अदालत ने स्पष्ट कर दिया है कि एक तलाकशुदा मुस्लिम महिला अपने पूर्व पति से मेहर, शादी के समय मिले सोने के गहने, कैश और अन्य सभी तोहफे वापस पाने की कानूनी हकदार है. कोर्ट ने कहा कि शादी के वक्त या उसके बाद मिले ये सभी सामान महिला की ‘निजी संपत्ति’ माने जाएंगे, और तलाक होने पर पति को इन्हें लौटाना ही होगा. जस्टिस संजय करोल और जस्टिस एन. कोटिश्वर सिंह की पीठ ने यह फैसला सुनाते हुए न केवल कानून की व्याख्या की, बल्कि समाज में व्याप्त पितृसत्तात्मक सोच पर भी तीखी टिप्पणी की.

यह मामला रौशनआरा बेगम बनाम एस.के. सलाहउद्दीन से जुड़ा है. दोनों की शादी साल 2005 में हुई थी. शादी के वक्त लड़की के परिवार ने लड़के पक्ष को काफी दहेज, सोना और नकद राशि दी थी. हालांकि, आपसी मनमुटाव के चलते 2011 में इनका तलाक हो गया. तलाक के बाद महिला ने ‘मुस्लिम महिला (तलाक पर अधिकारों का संरक्षण) अधिनियम, 1986’ की धारा 3 के तहत अदालत का दरवाजा खटखटाया. महिला ने दावा किया कि उसके पूर्व पति के पास उसका 30 भरी (तोल) सोना, करीब 17.67 लाख रुपये कैश और अन्य सामान है, जिसे वापस किया जाना चाहिए. निचली अदालत ने महिला के पक्ष में फैसला सुनाया था, लेकिन कलकत्ता हाईकोर्ट ने इस दावे को खारिज कर दिया था. हाईकोर्ट का तर्क था कि इस बात के पर्याप्त सबूत नहीं हैं कि शादी के समय दिए गए उपहार सीधे दूल्हे को दिए गए थे या दुल्हन को. हाईकोर्ट ने तकनीकी आधार पर महिला की याचिका को खारिज कर दिया था.

सुप्रीम कोर्ट ने हाईकोर्ट को लगाई फटकार

सुप्रीम कोर्ट ने कलकत्ता हाईकोर्ट के फैसले को पलटते हुए उसे ‘कानून के उद्देश्य को समझने में विफल’ (Missed the goalpost) करार दिया. जस्टिस संजय करोल ने फैसले में लिखा, हाईकोर्ट ने इस मामले को एक सामान्य दीवानी विवाद (Civil Dispute) की तरह देखा, जबकि यह महिला की गरिमा और उसके जीवन के अधिकार से जुड़ा मामला था. छोटे शहरों और ग्रामीण इलाकों में आज भी महिलाओं के खिलाफ पितृसत्तात्मक भेदभाव आम बात है. ऐसे में अदालतों को कानून की व्याख्या इस तरह करनी चाहिए जो महिलाओं को न्याय दिला सके, न कि उन्हें तकनीकी पेंच में फंसाए.”

एक्ट 1986 की धारा 3(1)(d) की नई व्याख्या

सुप्रीम कोर्ट का यह फैसला 1986 के अधिनियम की धारा 3(1)(d) की ‘उद्देश्यपरक व्याख्या’ पर आधारित है. यह धारा कहती है कि एक तलाकशुदा महिला उन सभी संपत्तियों को वापस पाने की हकदार है जो उसे शादी के समय, पहले या बाद में मिली हों. चाहे वे उसके रिश्तेदारों, दोस्तों या पति के रिश्तेदारों ने दी हों. कोर्ट ने साफ किया कि भले ही शादी के समय कोई सामान या कैश पति के हाथ में दिया गया हो, लेकिन कानूनन वह संपत्ति पत्नी की ही मानी जाएगी. पति उसे अपने पास नहीं रख सकता.

फैसले की खास बातें

सुप्रीम कोर्ट ने पूर्व पति को आदेश दिया है कि वह 6 सप्ताह के भीतर 17.67 लाख रुपये और 30 तोल सोने की कीमत महिला के बैंक खाते में जमा कराए.
यदि पति तय समय सीमा में पैसा नहीं लौटाता है, तो उसे 9% वार्षिक ब्याज भी देना होगा.
कोर्ट ने कहा कि यह कानून संविधान के अनुच्छेद 14 (समानता) और 21 (गरिमा के साथ जीने का अधिकार) के तहत महिलाओं को मिले वादों को पूरा करने का जरिया है.

कानूनी और सामाजिक मायने

यह फैसला इसलिए भी अहम है क्योंकि अक्सर तलाक के मामलों में देखा जाता है कि पति पक्ष शादी में मिले ‘स्त्रीधन’ (मेहर, गहने, गृहस्ती का सामान) को लौटाने से मना कर देता है. कई बार यह कहा जाता है कि सामान का कोई लिखित सबूत नहीं है या वह खर्च हो गया. सुप्रीम कोर्ट ने इस ‘बहानेबाजी’ पर रोक लगा दी है. कोर्ट ने माना कि शादी के रजिस्टर या गवाहों के बयानों में अगर छोटी-मोटी विसंगतियां भी हों, तो भी महिला के न्याय के अधिकार को नकारा नहीं जा सकता. यह फैसला उन हजारों मुस्लिम महिलाओं के लिए उम्मीद की किरण है जो तलाक के बाद आर्थिक तंगी से जूझ रही हैं और अपनी ही संपत्ति वापस पाने के लिए अदालतों के चक्कर काट रही हैं.

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