भीलवाड़ा का दूधाधारी मंदिर | Dudhadhari Temple Bhilwara History & Architecture

Last Updated:December 26, 2025, 09:35 IST
भीलवाड़ा का 473 साल पुराना दूधाधारी मंदिर अब ‘राजस्थान का प्रेम मंदिर’ कहला रहा है. संवत 1609 में स्थापित यह मंदिर निंबार्क संप्रदाय की मान्यताओं का केंद्र है. जहाँ ठाकुरजी के दूध पीने के चमत्कार ने इसे नई पहचान दी. गुरु महाराज के संकल्प से इसे वृंदावन के प्रेम मंदिर जैसा भव्य बनाया गया है. वर्तमान में यहाँ भगवान की शीतकालीन सेवा जारी है. जिसमें उन्हें गर्म पोशाकें पहनाई जा रही हैं और केसरिया भोग लगाया जा रहा है.
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भीलवाड़ा. राजस्थान के भीलवाड़ा शहर के सांगानेरी चौराहे पर स्थित श्री दूधाधारी मंदिर आज आस्था और स्थापत्य कला का अद्भुत केंद्र बन चुका है. निंबार्क संप्रदाय का यह प्राचीन मंदिर करीब 473 साल पुराना है. जिसकी स्थापना विक्रम संवत 1609 में हुई थी. इस मंदिर की सबसे बड़ी खासियत इसका आधुनिक स्वरूप है. जो वृंदावन के सुप्रसिद्ध ‘प्रेम मंदिर’ की तर्ज पर बनाया गया है. यहाँ आने वाले भक्तों को ब्रजभूमि का दिव्य अहसास होता है. जिससे अब स्थानीय लोगों को दर्शन के लिए वृंदावन जाने की आवश्यकता महसूस नहीं होती.
मंदिर के नामकरण के पीछे एक बेहद चमत्कारी मान्यता जुड़ी हुई है. कहा जाता है कि प्राचीन समय में ठाकुरजी महाराज ने अपने परम भक्त संत और उनके शिष्य के समक्ष प्रत्यक्ष रूप से दूध का पान किया था. इस अलौकिक घटना के बाद से ही इस मंदिर का नाम ‘दूधाधारी मंदिर’ पड़ गया. आज भी यह मंदिर समूचे मेवाड़ और राजस्थान में इसी विशिष्ट नाम से पहचाना जाता है. यहाँ भगवान कृष्ण के जन्म से लेकर नंद महोत्सव तक के सभी आयोजन बड़ी धूमधाम से मनाए जाते हैं.
मुगल काल का संघर्ष और गुरु का सपनामंदिर का इतिहास संघर्षपूर्ण रहा है. मंदिर परिसर में आज भी एक छोटा कमरे जैसा मंदिर बना हुआ है. बताया जाता है कि मुगल काल में जब मंदिरों को तोड़ा जा रहा था. तब तत्कालीन पुजारी ने ठाकुरजी की प्रतिमाओं को इसी गुप्त स्थान पर छिपाकर सुरक्षित रखा था. समय के साथ मंदिर जर्जर होने लगा था और छत को बलियों का सहारा देना पड़ता था. ऐसे में निंबार्क संप्रदाय के गुरु महाराज ने सपना देखा कि मेवाड़ की इस मिट्टी में वृंदावन की अनुभूति होनी चाहिए. इसी संकल्प को साकार करते हुए इसे प्रेम मंदिर जैसा भव्य स्वरूप दिया गया.
शीत ऋतु में शाही सेवा: सिगड़ी और पकौड़ी का भोगवर्तमान में बढ़ती ठंड को देखते हुए ठाकुरजी की दिनचर्या और सेवा पूजा में विशेष बदलाव किए गए हैं. मुख्य पुजारी कल्याण शर्मा के अनुसार. भगवान को अब गुनगुने गर्म जल से स्नान करवाया जा रहा है. ठंडे इत्र के स्थान पर हिना और केसर के इत्र का लेपन किया जाता है ताकि शरीर में गर्माहट बनी रहे. पहनावे में कॉटन की जगह ऊनी और वेलवेट की पोशाकें धारण करवाई जा रही हैं. भगवान के पास सुबह-शाम सिगड़ी (अंगीठी) लगाई जाती है और रात में रजाई-कंबल ओढ़ाए जाते हैं. भोग में भी अब गाजर का हलवा. बाजरे का खिचड़ा और तिल्ली के गर्म व्यंजनों को शामिल किया गया है.
About the Authorvicky Rathore
Vicky Rathore is a multimedia journalist and digital content specialist with 8 years of experience in digital media, social media management, video production, editing, content writing, and graphic, A MAJMC gra…और पढ़ें
Location :
Bhilwara,Bhilwara,Rajasthan
First Published :
December 26, 2025, 09:35 IST
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भीलवाड़ा का दूधाधारी मंदिर जहां ठाकुरजी करते हैं साक्षात निवास, जानें 473 साल.



