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लाल पत्थर, शेर की आकृति और गुरु की कथा, धौलपुर का शेर शिकार गुरुद्वारा क्यों है इतना खास

Last Updated:January 01, 2026, 16:35 IST

Dahulpur News : धौलपुर का शेर शिकार गुरुद्वारा, गुरु हरगोबिंद सिंह जी से जुड़ी कथा, 1857 में राना भगवंत सिंह द्वारा निर्मित, हर साल भव्य मेला और हिंदू पुजारी की अनूठी परंपरा के लिए प्रसिद्ध है. इतिहासकार अरविंद शर्मा बताते हैं कि सिखों के छठवें गुरु श्री हरगोबिंद सिंह जी का जन्म वर्ष 1595 में माता गंगा और पिता गुरु अर्जुन देव जी के यहां हुआ था.

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धौलपुर. राजस्थान का धौलपुर जिला रणछोड़ नगरी और मचकुंड नगरी के नाम से जाना जाता है. शहर में हिंदू मंदिरों और धार्मिक स्थलों की संख्या काफी अधिक है, जो प्राचीन होने के साथ-साथ आस्था के प्रमुख केंद्र भी हैं. इसके अलावा यहां सिख समुदाय सहित अन्य धर्मों के भी कई प्रसिद्ध धार्मिक स्थल मौजूद हैं. वर्ष भर अलग-अलग धर्मों के लोग इन स्थलों पर दर्शन के लिए पहुंचते हैं. इन्हीं में से एक है सिख समुदाय का पवित्र गुरुद्वारा, जिसे शेर शिकार गुरुद्वारे के नाम से जाना जाता है. इस गुरुद्वारे से जुड़ा इतिहास और कथा आज भी लोगों को आकर्षित करती है.

इतिहासकार अरविंद शर्मा बताते हैं कि सिखों के छठवें गुरु श्री हरगोबिंद सिंह जी का जन्म वर्ष 1595 में माता गंगा और पिता गुरु अर्जुन देव जी के यहां हुआ था. वर्ष 1612 में दिल्ली सल्तनत के शासक जहांगीर धौलपुर क्षेत्र में शिकार करने आए थे. इसी दौरान जंगल में उनके सामने एक भयानक शेर आ गया. शेर को देखकर जहांगीर घबरा गया और उसने सिखों के छठवें गुरु श्री हरगोबिंद सिंह जी को स्मरण कर उनसे रक्षा की प्रार्थना की. मान्यता है कि उसी समय गुरु हरगोबिंद सिंह जी ने तलवार के एक ही वार से शेर का वध कर दिया. तभी से इस स्थान को शेर शिकार गुरुद्वारा कहा जाने लगा.

1857 की क्रांति और गुरुद्वारे का निर्माण
इतिहासकार अरविंद शर्मा के अनुसार वर्ष 1857 की क्रांति के दौरान क्रांतिकारियों ने धौलपुर रियासत पर कब्जा कर लिया था. उस समय धौलपुर महाराज राना भगवंत सिंह की सहायता के लिए पटियाला से सिख सैनिक आए थे. इसी दौरान महाराज राना भगवंत सिंह ने शेर शिकार गुरुद्वारे का निर्माण करवाया. इस पवित्र गुरुद्वारे का निर्माण धौलपुर के प्रसिद्ध लाल बलुआ पत्थर से किया गया है. गुरुद्वारे की छतरी पर लाल पत्थर से बने शेर आज भी इसकी ऐतिहासिक पहचान को दर्शाते हैं.

हिंदू पुजारी की परंपरा और अनूठी मान्यताइस गुरुद्वारे की एक विशेष बात यह भी रही है कि रियासत काल से ही यहां हिंदू पुजारी की नियुक्ति की जाती रही है. गुरुद्वारे के रखरखाव और पूजा-अर्चना की जिम्मेदारी हिंदू पुजारी निभाते थे. उस समय महाराज द्वारा पुजारी को प्रतिवर्ष 300 रुपये की राशि दी जाती थी. यह परंपरा आपसी सद्भाव और धार्मिक सौहार्द की मिसाल मानी जाती है.

हर साल लगता है भव्य मेला
शेर शिकार गुरुद्वारे पर हर वर्ष 3, 4 और 5 मार्च को सिख समाज की ओर से भव्य मेले का आयोजन किया जाता है. इस मेले में राजस्थान, उत्तर प्रदेश, मध्य प्रदेश, पंजाब सहित देश के विभिन्न हिस्सों से सिख समाज के लोग इस पावन धरा पर पहुंचते हैं. मेले के दौरान गुरुद्वारे में विशेष धार्मिक कार्यक्रमों के साथ सेवा और लंगर का आयोजन भी किया जाता है. यह गुरुद्वारा आज भी धौलपुर की धार्मिक, ऐतिहासिक और सांस्कृतिक पहचान का महत्वपूर्ण हिस्सा बना हुआ है.About the AuthorAnand Pandey

नाम है आनंद पाण्डेय. सिद्धार्थनगर की मिट्टी में पले-बढ़े. पढ़ाई-लिखाई की नींव जवाहर नवोदय विद्यालय में रखी, फिर लखनऊ में आकर हिंदी और पॉलीटिकल साइंस में ग्रेजुएशन किया. लेकिन ज्ञान की भूख यहीं शांत नहीं हुई. कल…और पढ़ें

Location :

Dhaulpur,Rajasthan

First Published :

January 01, 2026, 16:35 IST

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लाल पत्थर और गुरु की कथा! धौलपुर का शेर शिकार गुरुद्वारा क्यों है इतना खास?

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