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खारे पानी से भी मिलेगी अच्छी उपज, सूखाग्रस्त क्षेत्रों के लिए वरदान है अश्वगंधा, जानें खेती की पूरी तकनीक

Last Updated:January 06, 2026, 05:51 IST

Ashwagandha Cultivation Tips: राजस्थान में कम पानी और खारे पानी की समस्या से जूझ रहे किसानों के लिए अश्वगंधा की खेती एक लाभकारी विकल्प बनकर उभरी है. औषधीय गुणों से भरपूर यह फसल कम सिंचाई में तैयार हो जाती है और बाजार में इसकी हमेशा अच्छी मांग बनी रहती है. कृषि विशेषज्ञों के अनुसार, अश्वगंधा सूखे और अर्द्ध-शुष्क क्षेत्रों के लिए उपयुक्त नकदी फसल है, जिससे किसान कम लागत में अधिक मुनाफा कमा सकते हैं. राजस्थान की जलवायु इस फसल के लिए अनुकूल मानी जाती है.एग्रीकल्चर न्यूज़

परंपरागत फसलों फसलों के साथ किसान औषधीय खेती की ओर तेजी से रूख कर रहे हैं. राजस्थान में कई किसान औषधीय जड़ीबूटियों की खेती कर रहे हैं. लेकिन, राजस्थान में सबसे बड़ी समय कम पानी और खारे पानी की रहती है. ऐसे में अश्वगंधा की फसल किसानों के लिए किसी वरदान से कम नहीं है. अश्वगंधा के फल-जड़ें कई आयुर्वेदिक औषधियों में काम में ली जाती है. इसकी मार्केट में हमेशा दिमाग रहती है. कृषि विशेषज्ञों के अनुसार अश्वगंधा नकदी फसल है. औषधीय पौधा होने से अच्छे दाम अच्छे मिलते हैं. आज की एग्रीकल्चर स्पेशल खबर में हम आपको इसकी खेती को संपूर्ण जानकारी बताएंगे.

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एग्रीकल्चर एक्सपर्ट दिनेश जाखड़ ने बताया कि अश्वगंधा की फसल के लिए किसान को ट्रेक्टर से गहरी जुताई के बाद खाद डाल कर खेत को तैयार करना जरूरी होता है. इसके बाद बीजोपचार करके बुवाई कर सकते हैं. एक हेक्टेयर में अश्वगंधा के 7 से 8 किलों बीज काफी रहते हैं. इसमें किसान बुवाई के तुरंत बाद पहला पानी दे सकते हैं. इसके बाद दूसरा पानी 5-7 दिन में दे देना चाहिए. इसकी फसल में पहला खरपतवार प्रबंधन फसल की 20 से 22 दिन की अवस्था में और दूसरा 35 से 40 दिन की अवस्था में करना चाहिए.

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एग्रीकल्चर एक्सपर्ट के अनुसार इसकी खेती सूखे और अर्द्ध-शुष्क इलाकों में होती है. हल्की दोमट और रेतीली मिट्टी जिसमें पानी का जमाव न हो, इसके लिए उपयुक्त है. यह फसल 20 से 35 डिग्री सेल्सियस तापमान और कम वर्षा वाले क्षेत्रों में अच्छी तरह से उगाई जा सकती है. अश्वगंधा की खेती खारे पानी में भी की जा सकती है. जैविक खाद और वर्मी कंपोस्ट का उपयोग फसल की गुणवत्ता को बढ़ाता है. सूखे पत्ते और लाल-नारंगी फल फसल के पकने का संकेत देते हैं. अश्वगंधा की फसल बुवाई के 150 से 180 दिन बाद कटाई के लिए तैयार हो जाती है.जड़ें प्राप्त करने के लिए गुणवत्ता पूरे पौधे को उखाड़ लें.

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एग्रीकल्चर एक्सपर्ट दिनेश जाखड़ ने बताया कि अच्छी उपज लेने के लिए प्रति एकड 8 से 10 ट्रॉली गोबर खाद काम में लें. बुवाई केलगभग 40 दिन बाद जब फसल कमजोर दिखे, तब 10 किलो यूरिया प्रति एकड़ के हिसाब से सिंचाई के साथ दें. अश्वगंधा फसल में वैसे कीट और रोग प्रकोप कम होता है, लेकिन पत्ती धब्बा रोग हो तो डाइथेन एम-45 का छिड़काव 3 ग्राम प्रति लीटर पानी के घोल के रूप में करें. इसके अलावा जड़ सड़न के लिए बाविस्टिन का 3 ग्राम प्रति लीटर में घौल करके छिड़काव करें.

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एग्रीकल्चर एक्सपर्ट दिनेश जाखड़ ने बताया अश्वगंधा की खेती कम पानी वाले क्षेत्रों व खारे पानी में भी आसानी से हो सकती है. यह कम लागत में अधिक मुनाफा देने वाली फसल है. इस फसल के लिए क्षेत्र की में मिट्टी उपयुक्त है. राजस्थान की जलवायु इस औषधीय फसल के लिए सही रहती है. किसान कम मेहनत में इस फसल को उगाकर कम समय में लाखों रुपए का मुनाफा प्राप्त कर सकते हैं.

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आयुर्वेदिक डॉक्टर नरेंद्र कुमार के अनुसार अश्वगंधा एक बहुपयोगी औषधि है. इसका उपयोग आयुर्वेद में बलवर्धक, स्मरणशक्ति बढ़ाने वाला, तनावनाशक और कसररोधी दवा बनाने में काम में लिया जाता है. इसके अलावा यह शरीर की रोग प्रतिरोधक क्षमता मजबूत करती है और मानसिक थकान, चिंता व अनिद्रा में आराम देती है. अश्वगंधा की जड़, पत्ती, फल और बीज औषधीय गुणों से भरपूर होते हैं. इसके नियमित सेवन से कमजोरी दूर होती है, ऊर्जा बढ़ती है.

First Published :

January 06, 2026, 05:51 IST

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