Nagaur News: गणपति बप्पा का अनोखा रूप, गोबर, गौमूत्र और मिट्टी से तैयार हुए इको फ्रेंडली प्रतिमाएं

Last Updated:September 05, 2026, 11:38 IST
नागौर के जयप्रकाश शर्मा पंचगव्य से इको-फ्रेंडली गणेश प्रतिमाएं तैयार कर रहे हैं. देसी गाय के गोबर, गौमूत्र, देसी घी, लाल मिट्टी और बिल्व पत्र के बीज जैसी प्राकृतिक सामग्री से बनी इन प्रतिमाओं में प्लास्टर ऑफ पेरिस और रासायनिक रंगों का इस्तेमाल नहीं किया जाता. खास बात यह है कि विसर्जन के बाद प्रतिमा मिट्टी में घुलकर खाद का रूप ले लेती है. नागौर से शुरू हुई यह पहल गुजरात के साथ यूके और लंदन तक पहुंच चुकी है और धार्मिक आस्था के साथ पर्यावरण एवं गाय संरक्षण का संदेश दे रही है.
गणेश चतुर्थी को लेकर इस बार भगवान गणेश की प्रतिमाओं में आस्था के साथ पर्यावरण संरक्षण का संदेश भी नजर आएगा. नागौर के शारदा पुरम कॉलोनी निवासी जयप्रकाश शर्मा पिछले करीब एक महीने से पंचगव्य से इको-फ्रेंडली गणेश प्रतिमाएं तैयार कर रहे हैं. खास बात यह है कि इन प्रतिमाओं में प्लास्टर ऑफ पेरिस और रासायनिक रंगों का इस्तेमाल नहीं किया जा रहा है. प्रतिमाएं प्राकृतिक सामग्री से तैयार होने के कारण पर्यावरण के लिए सुरक्षित है.
इन गणेश प्रतिमाओं को तैयार करने में देसी गाय का गोबर, गौमूत्र, देसी घी, लाल मिट्टी और बिल्व पत्र के बीज जैसी प्राकृतिक सामग्री का इस्तेमाल किया जा रहा है. जयप्रकाश ने बताया कि प्रतिमाओं को आकर्षक और सुंदर रूप देने के लिए भी किसी तरह के केमिकल रंगों का उपयोग नहीं किया जाता. जयप्रकाश का कहना है कि उनका उद्देश्य गणेश चतुर्थी जैसे धार्मिक पर्व के माध्यम से लोगों को पर्यावरण संरक्षण और गाय संरक्षण के प्रति जागरूक करना है.
जयप्रकाश शर्मा ने इस बार 4 इंच से लेकर 12 इंच तक की गणेश प्रतिमाएं तैयार की हैं. छोटी प्रतिमाओं को घरों में स्थापित करने के लिए खास तौर पर पसंद किया जा रहा है. इनकी मांग नागौर के अलावा राजस्थान के कई अन्य शहरों से भी सामने आ रही है. खास बात यह है कि पंचगव्य से बनी इन प्रतिमाओं की पहुंच अब प्रदेश और देश से बाहर तक हो गई है. गुजरात के साथ यूके और लंदन तक भी कुछ प्रतिमाएं भेजी जा चुकी हैं.
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इन प्रतिमाओं की सबसे बड़ी खासियत इनके विसर्जन का तरीका है. पारंपरिक प्रतिमाओं की तरह इन्हें नदी, तालाब या अन्य जलस्रोतों में विसर्जित करने की जरूरत नहीं पड़ती. श्रद्धालु घर पर ही गमले में इनका विसर्जन कर सकते हैं. प्रतिमा को गमले की मिट्टी में रखने के बाद पानी डालने पर यह धीरे-धीरे घुलने लगती है. कुछ समय बाद प्रतिमा मिट्टी में मिलकर खाद का रूप ले लेती है, जिससे पौधों की बढ़वार में भी मदद मिल सकती है.
जयप्रकाश बताते हैं कि प्रतिमा बनाने की प्रक्रिया भी पूरी तरह प्राकृतिक रखी गई है. सबसे पहले देसी गाय के गोबर को सुखाकर उसका पाउडर तैयार किया जाता है. इसके बाद इसमें लाल मिट्टी, गौमूत्र और देसी घी मिलाया जाता है. सभी सामग्री को अच्छी तरह मिलाकर एक ऐसा मिश्रण तैयार किया जाता है, जिससे प्रतिमा को मजबूत आकार दिया जा सके. इस पूरी प्रक्रिया में किसी कृत्रिम रसायन का इस्तेमाल नहीं किया जाता है.
उन्होंने बताया कि प्रतिमा को जोड़ने और मजबूती देने के लिए बिल्व पत्र के बीज का पाउडर तैयार किया जाता है. इसमें गंगाजल मिलाकर मिश्रण बनाया जाता है और फिर इसे गोबर, मिट्टी तथा अन्य प्राकृतिक सामग्री के साथ मिलाया जाता है. इसके बाद इसी मिश्रण से भगवान गणेश की प्रतिमा को आकार दिया जाता है. प्राकृतिक तरीके से तैयार होने के कारण प्रतिमा का निर्माण समय लेने वाला है, लेकिन जयप्रकाश इसे पर्यावरण संरक्षण की दिशा में एक जरूरी प्रयास मानते हैं.
पंचगव्य से तैयार ये गणेश प्रतिमाएं धार्मिक आस्था के साथ पर्यावरण संरक्षण का अनूठा संदेश दे रही हैं. एक ओर जहां प्रतिमा स्थापना से श्रद्धालुओं की आस्था जुड़ी है, वहीं दूसरी ओर विसर्जन के बाद इसके खाद में बदलने से प्रदूषण का खतरा कम किया जा सकता है. नागौर से शुरू हुआ यह प्रयोग गुजरात होते हुए यूके और लंदन तक पहुंच चुका है. ऐसे में यह पहल आने वाले समय में इको-फ्रेंडली गणेश उत्सव को बढ़ावा देने की मिसाल बन सकती है.
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September 05, 2026, 11:38 IST



