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Last Updated:December 07, 2025, 22:29 IST
Hansli Jewellery Rajasthan: हंसली राजस्थान की पारंपरिक आभूषण कला का एक महत्वपूर्ण हिस्सा है. चांदी से बनी यह कठोर गले की माला महिलाओं की मर्यादा, संस्कृति और शौर्य का प्रतीक रही है. राजपूत और ग्रामीण समाज में हंसली को सम्मान और गौरव से जोड़ा जाता है. यह आज भी आधुनिक फैशन के साथ पारंपरिक लुक को अनोखी पहचान देती है.
राजस्थान की पारंपरिक आभूषण परंपरा जितनी विविध है, उतनी ही गहरी और सुंदरता से भरी हूई भी है. इन्हीं परंपरागत गहनों में हंसली एक ऐसा आभूषण है, जो केवल सौंदर्य का साधन नहीं बल्कि इतिहास, संस्कृति, आत्मसम्मान और सुरक्षा का प्रतीक माना जाता है. हंसली को देखकर ही ग्रामीण, आदिवासी और लोक-संस्कृति की झलक साफ दिखाई देती है.

हंसली एक मोटी, ठोस और गोल आकार की धातु से बनी हार होती है, जिसे गर्दन के बिल्कुल पास पहना जाता है. यह सामान्य हार की तरह लचीली नहीं होती, बल्कि कठोर होती है. इसका आकार हंस की गर्दन से मिलता-जुलता माना गया है, इसी कारण इसका नाम हंसली पड़ा. यह पहनने वाले की शान और पहचान को दर्शाती है.

ऐसा माना जाता है कि राजस्थान में हंसली का सबसे पहले उपयोग बंजारा समुदाय की महिलाओं द्वारा किया गया. समय के साथ, 14वीं शताब्दी के आसपास, यह आभूषण कई हिस्सों में लोकप्रिय हो गया. प्राचीन काल में हंसली केवल गहना नहीं थी, बल्कि स्त्री की आर्थिक सुरक्षा का माध्यम भी मानी जाती थी, क्योंकि संकट के समय इसे बेचा जा सकता था. इसे कहा जाता है कि चांदी की हंसली सबसे अधिक प्रचलित, खासकर ग्रामीण और आदिवासी क्षेत्रों में थी. और सोने की हंसली राजघरानों और संपन्न परिवारों में पहनी जाती थी. कभी-कभी पीतल या मिश्रित धातुओं की हंसली भी देखने को मिलती है. इन पर अक्सर हाथ से की गई नक्काशी, फूल-पत्तियों के डिजाइन, ज्यामितीय आकृतियाँ और लोक-चिन्ह उकेरे जाते हैं.
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हंसली का स्थान राजस्थान समाज में अत्यंत सम्मानजनक रहा है.विवाह, तीज-त्योहार, लोकनृत्य और पारंपरिक आयोजनों में इसे पहनना शुभ माना जाता है. हसॅंली को लेकर यह परंपरा रही है कि बेटी को विवाह के समय हंसली देना मातृत्व का आशीर्वाद और सुरक्षा का प्रतीक होता है.लोक मान्यताओं के अनुसार, हंसली बुरी नजर और नकारात्मक ऊर्जा से रक्षा करती है. गाँवो में इसे दादी- नानी द्वारा आज भी पहना जाता है. आदिवासी समाज में हंसली केवल आभूषण नहीं, बल्कि पहचान और सामाजिक दर्जा दर्शाती है. महिला जितनी भारी और सुंदर हंसली पहनती है, उतनी ही समृद्ध और सम्मानित मानी जाती है. यह उनकी संस्कृति, आत्मनिर्भरता और स्वाभिमान को दर्शाती है.

आज हंसली पारंपरिक सीमाओं से निकलकर आधुनिक फैशन स्टेटमेंट बन चुकी है. इसे अब महिलाएं साड़ी, लहंगा, कुर्ता, इंडो-वेस्टर्न और फ्यूज़न पहनावे के साथ पहन कर अपने आप को यूनिक और फैशनेबल बनाती है. इसे फोटोशूट और फैशन शो में बड़े चाव से पहना जाने लगा है. यह टीवी सीरियल जैसे बालिका वधु में पहना गया है. अब यह गहना सिर्फ समाज तक सीमित नहीं है, बल्कि माॅडल, अभिनेत्रियों के द्वारा पहना जाने लगा है यह अब नई युवा पीढ़ी के द्वारा इसे फैशन के साथ पहनकर एक अलग पहचान दी जा रही है.

डिज़ाइनर अब हल्की, मिनिमल और ट्रेंडी हंसली बना रहे हैं, जो युवा पीढ़ी को भी आकर्षित कर रही है. हंसली नारी की मजबूती, सहनशीलता और गौरव का प्रतीक है. यह दिखाती है कि स्त्री केवल श्रृंगार तक सीमित नहीं, बल्कि संस्कृति की वाहक और समाज की रीढ़ है. हंसली आभूषण राजस्थानी लोक-संस्कृति की एक अमूल्य धरोहर है. यह अतीत, वर्तमान और भविष्य को जोड़ने वाला सेतु है. बदलते समय के साथ भले ही इसके रूप में बदलाव आया हो, लेकिन इसका सांस्कृतिक और भावनात्मक महत्व आज भी उतना ही गहरा है. हंसली पहनना केवल सजना नहीं, बल्कि अपनी जड़ों से जुड़ना है.
First Published :
December 07, 2025, 22:29 IST
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सदियों पुराना राज! हंसली आभूषण कैसे बना राजस्थान संस्कृति की पहचान



