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Last Updated:December 27, 2025, 15:55 IST
Sikar Teacher Village: टीचर विलेज भारत का एक अनोखा गांव है, जहां शिक्षा केवल पेशा नहीं बल्कि परंपरा बन चुकी है. यहां लगभग हर परिवार से शिक्षक निकलते हैं, जिन्होंने देशभर में शिक्षा का दीप जलाया है. इस गांव की मिट्टी में मेहनत, संस्कार और ज्ञान की खुशबू बसती है. सामूहिक सोच, अनुशासन और शिक्षा के प्रति समर्पण ने इसे ‘शिक्षकों वाला गांव’ की पहचान दिलाई है.
Teacher’s Village: राजस्थान के सीकर जिले का दूधवालों का बास गांव पूरे प्रदेश में टीचर्स विलेज के नाम से प्रसिद्ध है. लगभग 5885 की आबादी वाले इस गांव ने शिक्षा के क्षेत्र में एक अलग पहचान बनाई है. यहां से सैकड़ों शिक्षक निकलकर राजस्थान के कोने-कोने में अपनी सेवाएं दे रहे हैं. थर्ड ग्रेड शिक्षक से लेकर लेक्चरर स्तर तक के अभ्यर्थी इस गांव से चयनित हुए हैं. दूधवालों का बास गांव की पहचान केवल शिक्षकों तक सीमित नहीं है, बल्कि यहां के लोग शिक्षा को अपने जीवन का जरूरी हिस्सा मानते हैं.

इस गांव की साक्षरता दर 90 प्रतिशत से भी अधिक है. गांव के बुजुर्गों से लेकर युवाओं तक शिक्षा के प्रति सकारात्मक सोच देखने को मिलती है. यही कारण है कि पीढ़ी दर पीढ़ी यहां से शिक्षित युवा निकलकर समाज और प्रशासन में अपनी भूमिका निभा रहे हैं. ग्राम पंचायत दूधवालों का बास का गठन वर्ष 1961 में हुआ था. ग्राम पंचायत प्रशासक संतोष दायमा के अनुसार, करीब 400 वर्ष पहले हरियाणा से इंदौरिया गोत्र के 18 परिवार और दूधवाल गोत्र के 2 परिवार आकर यहां बसे थे.

उन्होंने बताया कि उस समय इस गांव का नाम झामास था. बाद में दूधवाल परिवार के लोग गांव से लगभग तीन किलोमीटर दूर जाकर बस गए, जिसके बाद इस क्षेत्र का नाम दूधवालों का बास पड़ा. पूरी पंचायत को आज शिक्षकों की पंचायत के रूप में जाना जाता है. वर्तमान में गांव से जुड़े करीब 181 शिक्षक विभिन्न सरकारी सेवाओं में कार्यरत बताए जाते हैं, जबकि कई शिक्षक सेवानिवृत्त भी हो चुके हैं. शिक्षा के क्षेत्र में मिली इस सफलता ने गांव को सामाजिक और आर्थिक रूप से भी मजबूत किया है.
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दूधवालों का बास गांव से शिक्षा के साथ-साथ व्यापार और उद्योग के क्षेत्र में भी कई प्रतिभाएं निकली हैं. यहां से 30 से अधिक उद्योगपतियो ने देश के अलग अलग बड़े शहरों में जाकर अपना व्यापार फैलाया है. इससे गांव की आर्थिक स्थिति मजबूत हुई है और रोजगार के नए अवसर भी बढ़े. यहां से निकले उद्योगपति हमेशा गांव के अभ्यर्थियों को मदद करते हैं. कुछ अभ्यर्थियों का पूरा खर्चा ये उठा रहे हैं

इस गांव में स्थित प्रसिद्ध प्रेम मंदिर आसपास के क्षेत्र में आस्था का प्रमुख केंद्र है. इस मंदिर का शिक्षकों और भामाशाहों ने मिलकर करीब 1.51 करोड़ रुपये की लागत से जीर्णोद्धार करवाया है. मंदिर की विशेषता यह है कि यहां 31 देवी-देवताओं की मूर्तियां स्थापित हैं. ग्रामीणों का मानना है कि इन देवी-देवताओं की कृपा से गांव के युवाओं को शिक्षा और नौकरी में सफलता मिलती है.

दूधवालों का बास गांव सीकर जिला मुख्यालय से लगभग 35 किलोमीटर की दूरी पर स्थित है. शिक्षा के अलावा यह गांव कृषि और ईंट भट्टा उद्योग के लिए भी जाना जाता है. यहां के कई परिवार ईंट भट्टा उद्योग से जुड़े हुए हैं, जिससे उन्हें रोजगार मिलता है. शिक्षा, उद्योग और कृषि के संतुलित विकास के कारण दूधवालों का बास गांव आज एक आदर्श ग्रामीण मॉडल के रूप में पहचाना जाता है.
First Published :
December 27, 2025, 15:55 IST
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भारत का अनोखा टीचर्स विलेज: जानिए क्यों कहलाता है यह गांव शिक्षकों की फैक्ट्र



