नागौर तिल्ली का तेल न्यूज़

Last Updated:December 30, 2025, 08:35 IST
नागौर के गांवों में पारंपरिक घानी से निकाला जाने वाला तिल्ली का तेल अपनी शुद्धता के लिए प्रसिद्ध है. सर्दी के मौसम में बाजरे की रोटी और खीचड़ी के साथ इसकी मांग बढ़ गई है. लोग ब्रांडेड तेल छोड़कर यहाँ का शुद्ध तेल खरीदने दूर-दूर से पहुँच रहे हैं.
सर्दी का असर बढ़ते ही राजस्थान के गांव-ढाणियों में तिल्ली के तेल की मांग तेजी से बढ़ गई है. हल्दी की सब्जी, गाजर का हलवा और अन्य देसी व्यंजनों के साथ अब तिल्ली का तेल शीतकालीन खान-पान का एक अनिवार्य हिस्सा बन चुका है. खासकर ग्रामीण अंचल में बाजरे की रोटी और खीचड़ी के साथ तिल्ली का तेल बड़े चाव से खाया जाता है. नागौर जिले का कुरड़ायां गांव इस मामले में विशेष पहचान रखता है, जहाँ आसपास के इलाकों से बड़ी संख्या में लोग शुद्ध तेल निकलवाने पहुँचते हैं. इस गांव की पारम्परिक घाणियों से निकलने वाला तिल्ली का तेल अपने शुद्ध स्वाद और गुणवत्ता के कारण अब अपने आप में एक ब्रांड बन चुका है.

कुरड़ायां गांव में इस समय तिल्ली का तेल निकालने की चार घाणियां दिन-रात लगातार चल रही हैं. घाणी संचालकों के अनुसार, सर्दी के सीजन में एक घाणी से लगभग 90-100 क्विंटल तक तेल निकाला जाता है. यहाँ की शुद्धता का ही असर है कि दूर-दूर से लोग इस तेल को खरीदने पहुँचते हैं. स्थानीय लोगों का कहना है कि इस तेल में किसी भी तरह की मिलावट नहीं होती और इसे आज भी पूरी तरह पारंपरिक तकनीक से निकाला जाता है, जो इसकी गुणवत्ता को बनाए रखता है.

दुकानदार सदीक मोहम्मद और घनी मोहम्मद बताते हैं कि औद्योगिकीकरण के इस दौर में कुटीर उद्योगों को भारी चुनौतियों का सामना करना पड़ा है. पहले बैल द्वारा संचालित लकड़ी के ढांचे वाली पारंपरिक घाणी से तेल निकाला जाता था, जिसमें शुद्धता के साथ-साथ स्वाद भी लाजवाब होता था. हालांकि, सरकारी प्रोत्साहन की कमी और समय के साथ आए बदलावों के कारण अब इन लकड़ी के उपकरणों की जगह बिजली की मोटरों और लोहे के खोखों ने ले ली है.
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कुरड़ायां गांव में परंपरागत दृश्य भले ही कम हो गए हों, लेकिन देसी घाणी के तेल का स्वाद और विश्वास आज भी जस का तस बना हुआ है. इस गांव में आज भी शुद्धता का पूरा ध्यान रखते हुए पारंपरिक विधि से ही तेल निकाला जाता है. यहाँ का तिल्ली का तेल इतना स्वादिष्ट होता है कि बड़े आयोजनों और सर्दियों में बनने वाले देसी लड्डुओं में विशेष रूप से इसी का उपयोग किया जाता है.

कुरड़ायां गांव में चारों घाणियों से सीजन के दौरान करीब 650 क्विंटल तिल्ली का तेल तैयार हो रहा है. सर्दियों में तेल की मांग अत्यधिक बढ़ने के कारण संचालकों को अतिरिक्त मजदूरों की मदद भी लेनी पड़ती है. तेल के अलावा, तिल्ली से निकलने वाली खल (अस्पष्ट) पशुओं के लिए बहुत फायदेमंद होती है, जिसे खरीदने के लिए दूर-दूर से पशुपालक यहाँ पहुँचते हैं.

डॉ. राजेन्द्र सिंह राठौड़ के अनुसार, आयुर्वेद में तिल को श्रेष्ठ औषधीय गुणों वाला माना गया है. तिल सफेद, लाल और काले तीन प्रकार के होते हैं, जिनमें कैल्शियम, मैग्नीशियम, फॉस्फोरस, ओमेगा-3, विटामिन C, E, B-6, तांबा, आयरन और जिंक जैसे पोषक तत्व प्रचुर मात्रा में पाए जाते हैं. तिल का तेल हड्डियों को मजबूत बनाने और शरीर को ऊर्जा देने के साथ-साथ सर्दियों में गर्माहट प्रदान करता है. इसके नियमित सेवन से दिमाग और मांसपेशियां भी एक्टिव रहती हैं.
First Published :
December 30, 2025, 08:33 IST
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