Ground Report: ब्लास्टिंग से घरों में पड़ रहीं दरारें, दहशत से कर रहे पलायन; अरावली संकट पर गांववालों का दर्द सुनिए!

अलवर. राजस्थान की अरावली पर्वतमाला में सरकार की ओर से वैध रूप से आवंटित खदानें अब पर्यावरण के साथ-साथ ग्रामीणों के जीवन पर भी भारी पड़ने लगी है. अलवर जिले के रामगढ़ कस्बे के पास स्थित ललावंडी गांव इसकी सबसे बड़ी मिसाल बनकर सामने आया है. यहां अरावली की तलहटी में बसे ग्रामीण लगातार दहशत के साए में जी रहे हैं. खदानों में हो रही भारी ब्लास्टिंग से गांव के मकानों में दरारें पड़ रही हैं, भूजल स्तर गिर रहा है और हालात इतने गंभीर हो चुके हैं कि कई परिवार गांव छोड़कर पलायन करने को मजबूर हो गए हैं.
ललावंडी गांव के पश्चिम की ओर अरावली की पहाड़ियों में करीब 12 खदानें और दो एसटीपी प्लांट संचालित हैं. वर्ष 2009 में इन खदानों का आवंटन किया गया था. उस समय गांव और पहाड़ियों के बीच पर्याप्त दूरी थी, लेकिन लगातार और गहराई तक हो रही खुदाई ने पहाड़ों को लगभग खत्म कर दिया है. अब हालात यह हैं कि गांव और खदानों के बीच महज 60 मीटर का फासला रह गया है. पहाड़ी की चौड़ाई घटकर एक पतली दीवार जैसी दिखाई देती है, जिससे ब्लास्टिंग का सीधा असर गांव पर पड़ रहा है.
लगातार ब्लास्टिंग से घर की दीवारों में आ गई है दरारें
गांव की रहने वाली सुनीता के घर की दीवारें इस संकट की गवाही देती है. घर के बाहर और अंदर जगह-जगह गहरी दरारें साफ नजर आती है. सुनीता बताती हैं कि खदानों में पत्थर तोड़ने के लिए जब तेज ब्लास्टिंग होती है तो पूरा घर हिलने लगता है. कई बार इतना जोरदार कंपन होता है कि परिवार को डर के मारे घर छोड़कर बाहर निकलना पड़ता है. उन्होंने दरारों पर प्लास्टर और रंग-रोगन कर ठीक करने की कोशिश की, लेकिन हर नई ब्लास्टिंग के साथ दरारें और बढ़ जाती है. यह कहानी सिर्फ एक घर की नहीं है. पहाड़ी के पास बसे ललावंडी गांव के लगभग हर घर में दरारें पड़ चुकी हैं. कई मकान कंपन से इतने जर्जर हो चुके हैं कि ग्रामीणों को उन्हें तोड़कर नए घर बनाने पड़े. वहीं, कुछ परिवार हालात से तंग आकर गांव छोड़ चुके हैं. उनके मकानों पर ताले लटके हुए हैं, जो पलायन की भयावह तस्वीर पेश करते हैं.
अरावली पर्वतमाला में चल रही खदानें ग्रामीणों के लिए गंभीर संकट बन गई है.
तेजी से गिर रहा ह भूजल स्तर
ग्रामीणों का आरोप है कि खदानों की वजह से भूजल स्तर तेजी से गिरा है. पहले जहां कुओं और हैंडपंपों में सालभर पानी रहता था, अब वे सूखते जा रहे हैं. इसके साथ ही खदानों से उड़ने वाली धूल से प्रदूषण बढ़ रहा है, जिससे सांस संबंधी बीमारियों का खतरा भी बढ़ गया है. ग्रामीणों का कहना है कि अगर यही हाल रहा तो आने वाले समय में पूरा गांव खाली हो सकता है.
तहसीलदार ने तैयार की है निष्पक्ष रिपोर्ट
मामले की गंभीरता को देखते हुए रामगढ़ के तहसीलदार अंकित गुप्ता ने गांव का सर्वे कर एक विस्तृत रिपोर्ट तैयार की है. रिपोर्ट में यह सामने आया है कि भले ही सभी खनन लीज नियमानुसार आवंटित हैं, लेकिन लगातार खनन से पहाड़ की चौड़ाई कम हो गई है. इसके कारण ब्लास्टिंग के दौरान कंपन सीधे गांव तक पहुंच रहा है, जिससे घरों और सरकारी ढांचों में दरारें आ रही है. रिपोर्ट में यह भी उल्लेख है कि गांव की पानी की टंकी में ब्लास्टिंग से दरारें पड़ी हैं और खनन गतिविधियों के कारण भूजल स्तर लगातार गिर रहा है. सबसे अहम बात यह है कि रिपोर्ट में गांव से हो रहे पलायन को भी स्वीकार किया गया है.
गांव पर मंडराने लगा है पर्यावरण का खतरा
तहसीलदार अंकित गुप्ता का कहना है कि उन्होंने दोनों पक्षों को सुनकर निष्पक्ष रिपोर्ट तैयार की है और इसे उच्च स्तर पर भेज दिया गया है. उन्होंने माना कि गांव के लोग गंभीर रूप से परेशान हैं और इस समस्या का समाधान जरूरी है. पहाड़ी से ऊपर जाकर देखा जाए तो साफ नजर आता है कि किस तरह खदानों ने अरावली के एक पूरे पहाड़ को लगभग खत्म कर दिया है. खदानें लगातार गांव की ओर बढ़ रही हैं, जिससे खतरा और बढ़ता जा रहा है. स्थानीय लाेगों का मानना है कि अरावली की ऊंचाई और चौड़ाई कम होने से न सिर्फ गांवों बल्कि पूरे पर्यावरण पर खतरा मंडरा रहा है.
अलवर से लेकर हरियाणा तक संकट
यह हालात सिर्फ ललावंडी गांव तक सीमित नहीं हैं. अलवर से लेकर हरियाणा सीमा तक अरावली क्षेत्र में कमोबेश यही स्थिति देखने को मिल रही है. वैध खनन के नाम पर हो रही अंधाधुंध खुदाई अब अरावली की रीढ़ तोड़ने के साथ-साथ ग्रामीणों को अपने ही घरों से बेघर करने का कारण बनती जा रही है. अब सवाल यह है कि क्या समय रहते सरकार और प्रशासन इस संकट को रोक पाएंगे या अरावली के साथ-साथ इसके आंचल में बसे गांव भी इतिहास बन जाएंगे.



