गोवा क्लब में आग के लिए कौन जिम्मेदार? पुलिस-प्रशासन नहीं, इनसे हुई सबसे बड़ी लापरवाही, जांच रिपोर्ट में खुलासा

उत्तरी गोवा के अर्पोरा इलाके में स्थित बर्च बाय रोमियो लेन क्लब में 6 दिसंबर को हुई भीषण आग्निकांड की जांच में चौंकाने वाले खुलासे हुए हैं. इस हादसे में 25 लोगों की मौत हो गई थी. इस घटना की जांच के लिए गठित मजिस्ट्रियल समिति की रिपोर्ट में स्थानीय पंचायत को इस हादसे के लिए सबसे बड़ा जिम्मेदार बताया गया है. मजिस्ट्रियल समिति की रिपोर्ट में कहा गया कि पंचायत ने अपने कर्तव्यों का पालन नहीं किया, जबकि कई सरकारी विभागों ने नियमों के उल्लंघन पर आंखें मूंदे रखीं.
इंडियन एक्सप्रेस की रिपोर्ट में जांच समिति से जुड़े एक वरिष्ठ अधिकारी के हवाले से बताया गया कि क्लब को संचालित करने की ‘प्राथमिक जिम्मेदारी’ स्थानीय पंचायत पर तय की गई है. रिपोर्ट में कहा गया है कि क्लब का ट्रेड लाइसेंस मार्च 2024 में समाप्त हो चुका था, लेकिन इसके बावजूद पंचायत ने न तो परिसर को सील किया और न ही क्लब की गतिविधियां बंद कराईं. पंचायत ने भले ही ढांचे को गिराने का आदेश जारी किया था, लेकिन आदेश पर रोक लगने से पहले उसे तोड़ने का अवसर होने के बावजूद कोई कार्रवाई नहीं की गई.
जांच रिपोर्ट में सामने आई क्या-क्या धांधली?
रिपोर्ट में यह भी सामने आया है कि यह संपत्ति वर्ष 1996 से अस्तित्व में है और पहले यहां दो रेस्टोरेंट भी चल चुके थे. इसके बावजूद वर्षों तक पंचायत की ओर से किसी तरह की सख्त निगरानी नहीं की गई. जांच समिति ने सवाल उठाया है कि पर्यावरण संवेदनशील क्षेत्र में बिना ऑक्यूपेंसी सर्टिफिकेट के निर्माण होने और शिकायतें मिलने के बावजूद पंचायत ने बार-बार नो-ऑब्जेक्शन सर्टिफिकेट (एनओसी) कैसे जारी किए.
इससे पहले द इंडियन एक्सप्रेस की रिपोर्ट में खुलासा हुआ था कि क्लब के संचालन के लिए स्थानीय पंचायत और विभिन्न सरकारी विभागों की ओर से कम से कम सात मंजूरियां दी गई थीं. इनमें ट्रेड लाइसेंस, आबकारी और खाद्य सुरक्षा लाइसेंस, प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड की अनुमति और तीन अलग-अलग एनओसी शामिल थीं. अब ये सभी मंजूरियां जांच के दायरे में हैं.
सरकारी बाबुओं को लेकर कैसे सवाल?
हालांकि रिपोर्ट में मुख्य दोष पंचायत पर डाला गया है, लेकिन अन्य सरकारी विभागों की भूमिका पर भी गंभीर सवाल उठाए गए हैं. जांच में पाया गया कि गोवा कोस्टल ज़ोन मैनेजमेंट अथॉरिटी (GCZMA) को इको-सेंसिटिव ज़ोन यानी नमक के पैन (साल्ट पैन) क्षेत्र में अवैध निर्माण और कोस्टल रेगुलेशन ज़ोन (CRZ) नियमों के उल्लंघन को लेकर दो शिकायतें मिली थीं, लेकिन उसने यह कहकर कार्रवाई नहीं की कि मामला उसके अधिकार क्षेत्र से बाहर है.
सूत्रों के अनुसार, जांच समिति ने यह भी सिफारिश की है कि इस बात की जांच होनी चाहिए कि जल संसाधन विभाग के नक्शों में दर्ज नमक के पैन को कोस्टल ज़ोन मैनेजमेंट प्लान (CZMP) 2011 में कैसे शामिल नहीं किया गया, जिसे 2022 में अधिसूचित किया गया था. इसके अलावा, रिपोर्ट में यह भी उल्लेख है कि गोवा राज्य प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड ने 22 अप्रैल 2024 को क्लब को संचालन की अनुमति दी थी और यह दावा किया था कि क्लब सीआरजेड नियमों का उल्लंघन नहीं कर रहा है.
पुलिस को लेकर क्या कहा गया?
जांच में पुलिस की भूमिका भी सवालों के घेरे में आई है. रिपोर्ट के मुताबिक, क्लब के खिलाफ शोर-शराबे को लेकर अंजुना थाने में कई शिकायतें दर्ज कराई गई थीं, लेकिन उन पर कोई ठोस कार्रवाई नहीं हुई. जबकि हाईकोर्ट के कई आदेश ऐसे मामलों में त्वरित कार्रवाई के निर्देश देते हैं. इसके अलावा रिकॉर्ड के अनुसार, क्लब के पास अग्निशमन विभाग से वैध एनओसी भी नहीं थी. अग्निशमन विभाग का कहना है कि उन्हें क्लब की ओर से कोई आवेदन नहीं मिला था, हालांकि पास के एक रिसॉर्ट के लिए आवेदन मिलने के बाद विभाग को क्लब की अनुपालन स्थिति की भी जांच करनी चाहिए थी.
रिपोर्ट में यह भी कहा गया है कि क्लब के मालिक सौरभ और गौरव लूथरा पर कुछ दस्तावेजों की कथित जालसाजी के आरोप हैं. इनमें स्वच्छता से जुड़ा एनओसी और पुलिस वेरिफिकेशन से संबंधित दस्तावेज शामिल बताए जा रहे हैं.
आग लगने का क्या था असल कारण?
आग लगने के कारणों को लेकर जांच समिति की टिप्पणियां फिलहाल ‘अनिर्णायक’ बताई गई हैं. रिपोर्ट में कहा गया है कि आग कैसे लगी, इसका स्पष्ट पता फॉरेंसिक जांच रिपोर्ट आने के बाद ही चल सकेगा. हालांकि मंच के पास डेक एरिया में लगे स्पार्कलर मशीनों से हुई आतिशबाजी को आग का सबसे संभावित कारण माना जा रहा है, लेकिन जांच के दौरान अलग-अलग राय सामने आईं. इनमें मुख्य मंच के ऊपर मौजूद इलेक्ट्रिकल सिस्टम में शॉर्ट सर्किट की संभावना भी शामिल है.
गौरतलब है कि गोवा सरकार ने इस हादसे के दो दिन बाद, 8 दिसंबर को चार सदस्यीय मजिस्ट्रियल जांच समिति का गठन किया था, ताकि आग की घटना के कारणों का पता लगाया जा सके और जिम्मेदारों की जवाबदेही तय की जा सके. जांच रिपोर्ट ने एक बार फिर यह सवाल खड़ा कर दिया है कि नियमों की अनदेखी और प्रशासनिक लापरवाही किस तरह बड़े हादसों की वजह बनती है.


