कमाल है यह मशीन! खोल रहे रोजगार के रास्ते, मिनटों में तैयार कर देती है हर प्रकार के बेहतरीन मिट्टी के बर्तन

जयपुर. राजधानी जयपुर ऐतिहासिक परम्पराओं और कला संस्कृति से जुड़ा शहर है, जहां लोग पीढ़ी दर पीढ़ी शिल्पकला, मूर्तिकला, हस्तकला जैसी कलाओं को आज भी आगे बढ़ा रहें हैं. लेकिन बदलते समय और तकनीकी के साथ हाथ के हुनरमंद लोगों के जीवन पर मशीनों के प्रभाव से रोजगार पर भी असर पड़ता दिखाई पड़ता है. ऐसे ही लोकल 18 ने जयपुर के रहने वाले श्याम कुमार जो वर्षों से मिट्टी बर्तन बनाने का काम करते आ रहे हैं उनसे बात की. वे बताते हैं कि हजारों वर्षों से मिट्टी के बर्तनों का इतिहास हमारे जीवन से जुड़ा है, लेकिन आज के समय मिट्टी के बर्तन तैयार करने के लिए बाजारों में बेहतरीन चाक वाली मशीने हैं, जो लोगों के लिए रोजगार के रास्ते खोलती है. श्याम कुमार बताते हैं कि उनकी उम्र 60 साल की है और वह 40 सालों से मिट्टी के बर्तन बनाते आ रहे हैं.
वर्षों पहले बाजारों में ऐसे कोई मशीने नहीं थी सिर्फ मिट्टी के बने चाक को दिनभर हाथों और पैरों से चलाते हुए बर्तन तैयार होते थे. लेकिन अब बाजार में लौहे और लकड़ी चाक हैं, जो मोटरों की सहायता से झटपट बर्तन तैयार कर देते हैं. सिर्फ बर्तनों की फिनिशिंग और रंगाई का काम आज भी कुम्हार हाथों से ही करते हैं. श्याम कुमार बताते हैं कि बढ़ती टेक्नोलॉजी के साथ मिट्टी के बर्तन बनाने में सफलता भी आई है और इसके नुकसान भी है, क्योंकि मशीनों और एल्युमीनियम, प्लास्टिक, स्टील के बर्तनों के अधिक चलन के चलते कुम्हारों के रोजगार पर भी असर दिखाई पड़ता है.
मिनटों में बर्तन तैयार कर देती है चकले वाली मशीन
श्याम कुमार बताते हैं पुराने समय में कुम्हार जाति के लोग ज्यादातर अपने घरों में परिवार के साथ मिलकर बर्तन तैयार करते थे, क्योंकि मिट्टी के चाक को चलाने के लिए अन्य व्यक्ति की सहायता लगती थी. लेकिन अब बाजार में चाक की ऐसी मशीनें हैं, जो देवी-देवताओं की मूर्तियां, दीया, बोरा, बैल, करसा, क्लास, मर्की, चूल्हा व बच्चों के खिलौने जैसे सभी मिट्टी के उपयोग की चीजें बेहद आसानी से तैयार कर देती हैं. इसलिए अब लोग मिट्टी के बर्तन तैयार करने के लिए इनका ही उपयोग करते हैं, लेकिन मिट्टी का यह मशीनों से जुड़ा चाक बिजली और बैटरी पर निर्भर रहता है. अगर बिजली न हो तो यह चाक बर्तन नहीं तैयार कर सकते. लेकिन पुराने समय में लोग बिजली पर आश्रित नहीं रहते थे. इसलिए यह मशीनों के चाक कई मायनों में फायदेमंद भी है और नुकसान दायक भी है. मिट्टी के बर्तन तैयार करने के लिए मशीनों से तैयार चकले नई पीढ़ी के लिए रोजगार के रास्ते भी खोलते हैं और पुराने लोगों के रोजगार को छिनने का काम भी कर रहे हैं.
फिर से मिट्टी के बर्तनों के पीछे भाग रहे हैं लोग
श्याम कुमार बताते हैं की पुराने समय में लोग सबसे ज्यादा मिट्टी के बर्तनों का उपयोग करते थे, लेकिन समय के साथ बाजारों में अन्य बर्तनों की डिमांड बढ़ने लगी, जिससे मिट्टी के बर्तनों बनाने वालों की संख्या में कमी आई. लेकिन हाल के कुछ वर्षों से मिट्टी के बर्तनों की खूब डिमांड बढ़ी है, क्योंकि हमारे पूर्वज अपने समय में मिट्टी, लोहे व कांसे के बने बर्तनों का उपयोग करते थे. जिससे उनके खान-पान और स्वास्थ्य पर दिखाई देता था. इसी के चलते अब बढ़ती स्वास्थ्य समस्याओं के चलते लोगों का रूझान मिट्टी के बर्तनों की ओर तेजी से बढ़ा है, जो आज भी ग्रामीण इलाकों में कुम्हार जाति के लोगों के लिए मिट्टी के बर्तन बनाने का काम रोजी-रोटी और जीवन-यापन के साथ जुड़ा है. आपको बता दें कि कुम्हार शब्द, कुम्भकार से निकला हुआ प्रतीत होता है, जिसका अर्थ कुम्भ, यानि घड़ा बनाने वाला होता हैं. इन्हें कुम्भार, प्रजापति, प्रजापत, घूमियार, घूमर, कुमावत, भांडे, कुलाल या कलाल आदि नामों से भारत के अलग-अलग प्रदेशों में जाना जाता है.



