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Last Updated:December 18, 2025, 06:27 IST

Bhilwara Gauri Family: अजमेर दरगाह शरीफ के उर्स में भीलवाड़ा के गौरी परिवार का एक विशेष और ऐतिहासिक नाता जुड़ा हुआ है. यह परिवार पीढ़ी दर पीढ़ी एक खास रस्म निभाता आ रहा है, जो उर्स की परंपराओं का अहम हिस्सा मानी जाती है. वर्षों से चली आ रही इस परंपरा के कारण गौरी परिवार की पहचान अजमेर उर्स से जुड़ गई है.

भीलवाड़ा – देश और दुनिया भर में मशहूर अजमेर दरगाह के सूफी संत हजरत ख्वाजा मोइनुद्दीन हसन चिश्ती के 814वें उर्स का आयोजन किया जाना हैं.  इसके लिए सबसे पहले सबसे उंचे बुलंद दरवाजे पर झंडा चढ़ाया जाता हैं जिसके साथ ही उर्स के औपचारिक रूप से शुरूआत हो जाती हैं. इसकी सबसे बड़ी खास बात यह हैं कि भीलवाड़ा का गौरी परिवार के बीते कई सालों से पीढ़ी दर पीढ़ी यह रस्म निभा रहा हैं. रजब का चांद दिखाई देने पर 21 दिसंबर की रात से उर्स की विधिवत शुरुआत हो जाएगी. झंडा चढ़ाने की परंपरा 1928 में पेशावर के पीर ओ मुर्शिद हजरत सैयद अब्दुल सत्तार बादशाह जान ने शुरू की थी.

इसके बाद 1944 से भीलवाड़ा के लाल मोहम्मद गौरी का परिवार इस परम्परा को निभा रहा है. गौरी परिवार के लाल मोहम्मद ने 1944 से 1991 तक उर्स का झंडा चढाया. फिर मोईनुद्दीन गौरी ने 2006 तक रस्म निभाई. इसके बाद से फखरूद्दीन गौरी रस्म निभा रहे हैं भीलवाड़ा का गौरी परिवार 82 वर्षों से यह रस्म निभा रहा है.

फखरूद्दीन गौरी ने बताया कि  झंडा चढ़ाने की रस्म गौरी परिवार द्वारा अदा की गई. इस दौरान हमनें यही दुआ की हैं कि भारत देश में सभी हिन्दू मुस्लिम भाईचारे और एकता के साथ सद्भावना से रहें. असर की नमाज अदा होने के बाद गरीब नवाज गेस्ट हाउस से झंडे का जुलूस निकाला गया. ढोल-नगाड़ों और सूफियाना कलाम की गूंज के बीच जुलूस लंगरखाना गली, निजाम गेट और शाहजहानी गेट होते हुए बुलंद दरवाजे तक पहुंचा. अकीदतमंदों ने फातिहा पढ़ी और ख्वाजा साहब से अपनी मुरादें मांगीं. झंडा रस्म में जायरीनों की भारी भीड़ उमड़ी. आयोजन में हर तरफ ‘या गरीब नवाज’ और ‘ख्वाजा के दर पर’ जैसे नारे गूंजते रहे.

भीलवाड़ा का गौरी परिवार अदा करता हैं  झंडा चढ़ाने की रस्मफखरूद्दीन गौरी ने बताया कि गौरी परिवार 82 वर्षों से यह रस्म निभा रहा है. झंडा चढ़ाने की परंपरा वर्ष 1928 में पेशावर के हजरत सैयद अब्दुल सत्तार बादशाह जान रहमतुल्लाह अलैह ने शुरू की थी. इसके बाद 1944 से भीलवाड़ा के लाल मोहम्मद गौरी का परिवार यह रस्म अदा कर रहा है. गौरी परिवार के लाल मोहम्मद गौरी ने वर्ष 1944 से 1991 तक और उनके बाद मेरे वालिद साहिब मोइनुद्दीन गौरी ने वर्ष 2006 तक यह रस्म निभाई. इसके बाद में ख़ुद यह रस्म अदा कर रहा हूं .

साल भर बांधते हैं मन्नत का धागाजन्नती दरवाजे पर सालभर जायरीन मन्नत का धागा बांधते हैं. जन्नती दरवाजा खुलने के बाद से ही जायरीन की आवक बढ़ जाती है. दरगाह जियारत को आने वाले जायरीन जन्नती दरवाजा से जियारत करने के लिए बेकरार नजर आते हैं. जायरीन सिर पर मखमल की चादर और फूलों की टोकरी लिए अपनी बारी का इंतजार करते हैं.

About the AuthorJagriti Dubey

With more than 6 years above of experience in Digital Media Journalism. Currently I am working as a Content Editor at News 18 in Rajasthan Team. Here, I am covering lifestyle, health, beauty, fashion, religion…और पढ़ें

Location :

Bhilwara,Rajasthan

First Published :

December 18, 2025, 06:27 IST

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कई पीढ़ियों से निभाई जा रही खास रस्म,अजमेर दरगाह उर्स में गौरी परिवार की पहचान

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