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प्रेम की आखिरी निशानी बना कटा शीश, युद्ध में बदला प्यार – हाड़ी रानी की अनोखी प्रेमगाथा

Last Updated:December 22, 2025, 16:24 IST

Love Story : राजस्थान की धरती पर जन्मी हाड़ी रानी की गाथा प्रेम, त्याग और राष्ट्रधर्म की ऐसी मिसाल है, जिसने इतिहास को झकझोर दिया. नवविवाहिता होकर भी उन्होंने पति के कर्तव्य को सर्वोपरि रखा और अपने अद्वितीय बलिदान से भारतीय नारी शक्ति को अमर बना दिया. यह कहानी आज भी रोंगटे खड़े कर देती है.

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कोटा : भारतीय इतिहास वीरता, त्याग और बलिदान की असंख्य गाथाओं से भरा पड़ा है, लेकिन जब बात हाड़ी रानी की आती है, तो शब्द भी छोटे पड़ जाते हैं. राजस्थान की इस अद्भुत वीरांगना ने ऐसा बलिदान दिया, जिसकी तुलना न केवल भारत में, बल्कि पूरे विश्व में दुर्लभ है. हाड़ी रानी का नाम आज भी इतिहास में स्वर्ण अक्षरों में अंकित है और आने वाली पीढ़ियों को साहस, प्रेम और राष्ट्रधर्म का पाठ पढ़ाता रहेगा. प्रसिद्ध इतिहासकार दुर्गा प्रसाद माथुर के अनुसार, हाड़ी रानी का वास्तविक नाम सलेह कंवर था. उनका जन्म बूंदी के राजवंश में हुआ था. वे बूंदी नरेश भावसिंह के वंशज भूपति सिंह के पुत्र संग्राम सिंह हाड़ा की पुत्री थीं.

बसंत पंचमी के शुभ दिन जन्मी सलेह कंवर का विवाह उदयपुर के सलूम्बर जागीरदार और मेवाड़ के प्रमुख सेनापति राव रतनसिंह चूंडावत से हुआ. उसी समय मुगल बादशाह औरंगजेब की कुदृष्टि रूपनगर नरेश विक्रम सिंह की पुत्री चंचल कुमारी पर पड़ी. विवाह के शाही फरमान को चंचल कुमारी ने अस्वीकार कर दिया. इससे क्रोधित होकर औरंगजेब ने रूपनगर पर आक्रमण कर दिया. संकट की इस घड़ी में चंचल कुमारी ने राणा राजसिंह को अपना पति मानते हुए सहायता के लिए पत्र लिखा. पत्र पढ़ते ही राणा राजसिंह का क्षत्रिय रक्त उबल पड़ा और उन्होंने तुरंत सलूम्बर के जागीरदार राव रतनसिंह चूंडावत को युद्ध के लिए बुलावा भेजा.

प्रेम से कर्तव्य तक: हाड़ी रानी का अमर क्षणजब यह आदेश सलूम्बर पहुंचा, उसी समय नवविवाहित दंपत्ति का गृह प्रवेश हो रहा था. युद्ध का संदेश पाकर चूंडावत विचलित हो उठे. वे विदा लेने महल पहुंचे, लेकिन पत्नी के प्रेम में उनके कदम डगमगाने लगे. यह देख सलेह कंवर ने द्वार पर आकर स्वयं तिलक कर उन्हें युद्ध के लिए विदा किया. जाते समय चूंडावत ने स्मृति-चिह्न मांगा. यहीं इतिहास का वह क्षण आया, जिसने हाड़ी रानी को अमर बना दिया. रानी नहीं चाहती थीं कि उनकी याद पति के कर्तव्य में बाधा बने. उन्होंने दासी से कहा – “मैं अपना शीश काटकर निशानी में दे रही हूं.” पल भर में उनका शीश काट लिया गया और युद्धभूमि की ओर भेज दिया गया.

रक्त से तिलक, रण में विजय: हाड़ी रानी की गाथाकटा हुआ शीश देखकर चूंडावत का कलेजा कांप उठा. उन्होंने उसी रक्त से तिलक कर प्रतिज्ञा ली कि रानी के रक्त की एक-एक बूंद का बदला लेकर ही दम लेंगे. युद्ध में उन्होंने मुगल सेना को परास्त किया और अद्वितीय वीरता का परिचय दिया. हाड़ी रानी का यह बलिदान केवल प्रेम की नहीं, बल्कि कर्तव्य, स्वाभिमान और राष्ट्रधर्म की पराकाष्ठा है. इतिहासकारों और ग्रंथों में उनके नाम और विवरणों में भिन्नता मिलती है, लेकिन उनका बलिदान निर्विवाद और अमर है. हाड़ी रानी केवल एक रानी नहीं थीं, वे भारतीय नारी शक्ति, त्याग और वीरता की अद्वितीय प्रतीक थीं.

About the AuthorRupesh Kumar Jaiswal

A Delhi University graduate with a postgraduate Diploma in Journalism and Mass Communication, I work as a Content Editor with the Rajasthan team at India Digital. I’m driven by the idea of turning raw in…और पढ़ें

First Published :

December 22, 2025, 16:24 IST

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“हाड़ी रानी” : सिर काट कर दी निशानी, इतिहास का सबसे महान बलिदान

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