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Love Story: हैदराबाद के निजाम जब लखनऊ की तवायफ मुमताज पर मिर मिटे, क्या हुआ इस इश्क का अंजाम

हैदराबाद के सातवें निजाम मीर उस्मान अली खान दुनिया के सबसे दौलतमंद शख्सियत थे. उनकी फोटो अमेरिका की टाइम मैगजीन ने कवर पर छापी थी. निजाम का दिल अक्सर महिलाओं में आ जाता था. उनके कई इश्क के किस्से अब भी चटखारे लेकर कहे जाते हैं. निजाम को एक समय लखनऊ की एक तवायफ से जबरदस्त प्यार हो गया था. वो बुरी तरह उसके दीवाने थे. फिर इस इश्क का हुआ क्या. आपको ये भी बता देते हैं कि लखनऊ की इस तवायफ का नाम मुमताज था.

हैदराबाद के सातवें निज़ाम को जब लखनऊ की तवायफ मुमताज से प्यार हुआ तो उसके प्यार में बिल्कुल दीवाने ही हो गए. उनके इस प्रेम के चर्चे हैदराबाद के दरबार से लेकर बाहर तक फैल गए. उस दौर के ब्रिटिश अधिकारियों तक की रिपोर्टों में उनका ये इश्क किस्सा दर्ज है. निजाम की दो शादियां हुईं. लेकिन दोनों ही शादियां समय के साथ उदासीनता में बदल गईं. ऐसे में उनका झुकाव धीरे-धीरे दरबारी कलाओं, ख़ासकर संगीत और नृत्य करने वाली महिलाओं की ओर हुआ.

कैसे निजाम के जीवन में आई तवायफ मुमताज

फिर उनके जीवन में आईं मुमताज़ बेगम. लखनऊ की वो तवायफ़ जिसने निज़ाम का दिल जीत लिया. मुमताज़ बेगम लखनऊ की प्रसिद्ध तवायफ़ थीं, जो सूफ़ियाना संगीत और ठुमरी में निपुण थीं. कहा जाता है कि 1910 के दशक में निज़ाम ने लखनऊ में एक दरबारी महफ़िल में उनकी गायकी सुनी. वो आवाज़ इतनी गूंजदार और दर्दभरी थी कि निज़ाम ने तुरंत कह दिया, “यह आवाज़ हैदराबाद की रातों में गूंजनी चाहिए.”

किताबों के अनुसार निजाम की पहली मुलाकात मुमताज बेगम से सन् 1912 में लखनऊ में हुई. उस समय निजाम लगभग 26 वर्ष के थे. मुमताज बेगम की उम्र लगभग 16-17 वर्ष थी. कहा जाता है कि वह उनकी सुंदरता, तहज़ीब और गायन-नृत्य कला पर इतने मुग्ध हुए कि उनसे प्यार करने लगे.

फिर मुमताज बेगम को हैदराबाद बुलाया गया

कुछ महीनों बाद निजाम ने मुमताज़ बेगम को गुप्त रूप से हैदराबाद बुलवाया. उसके लिए खास महलनुमा निवास बनाया गया, इसे आज भी मुमताज मंजिल के नाम से जाना जाता है और ये हैदराबाद के अफ़ज़लगंज क्षेत्र में वक़्फ़ संपत्ति के रूप में दर्ज है. हालांकि अब ये जीर्ण-शीर्ण स्थिति में आ चुका है.

फिर क्या था. मुमताज बेगम हैदराबाद पहुंचीं और हर शाम उनके साथ निज़ाम की निजी महफिलें सजने लगीं. इसमें कव्वाली, ठुमरी, सूफ़ी शेरो-शायरी के दौर चलते थे. निजाम बेगम के प्यार में और दीवाने होते चले गए. उन्होंने मुमताज बेगम के लिए सोने-चांदी से जड़ा हार. कोहिनूर के नक़ली प्रतिरूप वाला गहना बनवाया.

कहा जाता है कि बेशक वो लखनऊ की प्रसिद्ध तवायफ बन चुकी थीं. तब उनके मेहमान अक्सर रईस जमींदार, अमीर व्यापारी और उच्च पदस्थ ब्रिटिश अधिकारी होते थे लेकिन निजाम से पहले उनका किसी और के साथ विशेष संबंध का ऐतिहासिक रिकॉर्ड नहीं मिलता. ये माना जा सकता है कि उनकी प्रसिद्धि और कला के चलते कई रईस उनके दीवाने रहे होंगे.

ब्रिटिश अफसरों को इस इश्क पर था एतराज

ब्रिटिश रेज़िडेंट की एक रिपोर्ट (1933, India Office Records, London) में लिखा, निजाम एक वेश्या पर अनुचित ध्यान दे रहे हैं जो उनके निजी कक्ष में सूफी गजलें गाती है.” ये प्रेम दरबार और अंग्रेज़ अफ़सरों दोनों के लिए असहज था, क्योंकि एक “राज्य प्रमुख” का “कनीज़” (तवायफ़) से प्रेम “राजकीय मर्यादा” के ख़िलाफ़ माना गया. ब्रिटिश अफसर तो इसे राजगद्दी का अपमान मानते थे.

हैदराबाद के सातवें निजाम मीर उस्मान अली खान, जिनके कई इश्कों के कई चर्चे फैलते रहे. लेकिन सबसे फेमस किस्सा तवायफ मुमताज बेगम के साथ था. (विकी कामंस)

मुमताज़ बेगम धीरे-धीरे निज़ाम की ज़िंदगी का अहम हिस्सा बन गईं. कहा जाता है कि निज़ाम जब किसी राजनीतिक संकट से परेशान होते, तो सीधे मुमताज के पास भागते. वह उन्हें सूफ़ी शेर सुनाती थी, “मोहब्बत भी इबादत है, अगर नीयत पाक हो.” प्यार में पागल निज़ाम ने उसके नाम पर एक वक़्फ़ ट्रस्ट बनाया – मुमताज वक्फ एस्टेट, जिसमें उस इलाक़े की ज़मीनें और महल दर्ज कर दिए गए.

रोज जमती थीं महफिलें 

हालांकि निज़ाम ने कभी औपचारिक रूप से उसे “बेगम” का दर्जा नहीं दिया – वो ऐसा करना जरूर चाहते थे लेकिन इससे दरबार और ब्रिटिश सरकार को कड़ी आपत्ति थी. वो ये भी मानते थे कि अगर उन्होंने तवायफ मुमताज को बेगम बना दिया तो सिर पर रखे ताज की बदनामी होगी.

मुमताज एक तरह से हैदराबाद में ही बस गईं. निजाम के साथ रोज उनकी महफिलें देर रात तक जमतीं, इसे लेकर तमाम बातें और कानाफूसियां होतीं. फिर एक दिन ऐसा आया जबकि 1940 में मुमताज़ बेगम को हैदराबाद छोड़ने का आदेश दे दिया गया. क्योंकि निज़ाम पर “राजनीतिक एकाग्रता” न होने के आरोप लगने लगे. ये कहा जाने लगा था कि निजाम इस कदर मुमताज के इश्क में कैद हो चुके हैं कि उनका मन राजकाज में लगता ही नहीं है.

खैर बुझे मन से निजाम ने मुमताज को विदा किया. उदास मुमताज ने हैदराबाद छोड़ा. कहा जाता है कि जब वह रवाना हुईं, निज़ाम ने उसे विदा करते हुए केवल एक वाक्य कहा, “मेरे दिल की सरकार, तुम रही तो इश्क़ ज़िंदा रहेगा.”

निज़ाम उस्मान अली ख़ान ने जीवन के अंतिम वर्षों में किसी और महिला को अपने महल में जगह नहीं दी. उनके निजी सचिव सैयद अहमद के अनुसार, “निज़ाम रातों में मुमताज़ की पुरानी ठुमरी की रिकॉर्डिंग सुनते हुए नींद में खो जाते थे.” ये सच है निज़ाम मुमताज़ बेगम नामक तवायफ़ से दिलोजान से मोहब्बत करते थे.

वैसे हैदराबाद के निज़ामों की प्रेमिकाएं अक्सर कवि, संगीतज्ञ या विदेशी मूल की महिलाएं होती थीं. वे निज़ाम के व्यक्तित्व से मोहित होती थीं और निज़ाम उनके माध्यम से दुनिया से दूर भावनात्मक सुकून ढूंढते थे.

सालार जंग म्यूज़ियम के रिकॉर्ड्स में भी केवल इतना उल्लेख है कि निज़ाम ने एक संगीतकार महिला के नाम पर वक़्फ़ संपत्ति दी, जिसके साथ उनका रिश्ता प्लेटोनिक यानि आध्यात्मिक बताया गया.

सातवें निज़ाम उस्मान अली ख़ान ने अपने अंतिम दिनों में लिखा, “मेरे पास सब कुछ है – सोना, चांदी, ताज, लेकिन वो नहीं जो दिल चाहता है.” उनके बेटे मीर बरकत अली, जो फिर मुकर्रम जाह के नाम उनके वारिस बने. उन्होंने बाद में कहा कि “मेरे पिता अपने किसी भी प्रेम को अंत तक निभा नहीं पाए, क्योंकि राजनीति हर बार बीच में आ जाती थी.”

मुमताज की दो बेटियां 

कुछ किताबें ये भी कहती हैं कि निजाम ने मुमताज बेगम को अपने हरम में शामिल कर लिया. हालांकि उन्हें कभी बेगम नहीं बनाया. इस रिश्ते से उन्हें दो बेटियां हुईं – बड़ी बेटी का नाम बच्ची बेगम और असली नाम आलिया उन्निसा बेगम था. छोटी बेटी का नाम सुल्ताना बेगम था.

उनकी बेटी, बच्ची बेगम बाद में एक प्रसिद्ध अभिनेत्री बनीं. उन्होंने अपनी मां के जीवन पर एक किताब “मुमताज बेगम ऑफ हैदराबाद” भी लिखी, जिससे इस इतिहास के कई पन्ने सामने आए.

कुछ किताबें ये भी कहती हैं कि हैदराबाद से अलग होने के बाद, मुमताज बेगम ने एक और महत्वपूर्ण रिश्ता बनाया. उन्होंने भोपाल में नवाब सिद्दीकी हसन नामक एक जमींदार से शादी कर ली. यह रिश्ता उनके जीवन के आखिरी दिनों तक रहा. इस शादी के बाद उन्होंने एक सामान्य और निजी जीवन जीने की कोशिश की.

निजाम के साथ रहते हुए उन्हें ऐश्वर्य और धन की कोई कमी नहीं थी. लेकिन बाद में निजाम ने उन्हें पर्याप्त आर्थिक सहायता नहीं दी. उन्हें आर्थिक तंगी का सामना करना पड़ा.

मुमताज बेगम के अंतिम दिन गुमनामी और गरीबी में बीते. 25 दिसंबर, 1935 को भोपाल में ही उनकी मृत्यु हो गई. उन्हें एक साधारण कब्र में दफनाया गया. उनकी कब्र लंबे समय तक अज्ञात रही, हालांकि बाद में इतिहासकारों ने इसका पता लगाया.

सोर्स

1. निजाम के दरबार के रिकॉर्ड, खर्चों के ब्यौरे और पत्र-व्यवहार, जो सालारजंग म्यूजियम में सुरक्षित है2. A Biography of the Legendary Courtesan3. किताब “द कोर्टेसन ऑफ इंडिया” – लेखिका लिली पास्कल4.”हैदराबाद: ए बायोग्राफी” (लेखक: लिली पास्कल कीद्वई)5. अकादमिक जर्नल: भारतीय इतिहास, सामाजिक अध्ययन और महिला अध्ययन से जुड़ी अकादमिक पत्रिकाओं में “तवायफों की संस्कृति” और “रजवाड़ों का निजी जीवन” जैसे विषयों पर शोध पत्र प्रकाशित हुए हैं, जिनमें मुमताज बेगम के केस स्टडी के तौर पर उल्लेख मिलता है.

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