पाकिस्तान से राजस्थान तक सुरों का सफर! अलगोजा की धुनों ने उदयपुर में रचा लोक संगीत का जादू

Last Updated:December 31, 2025, 18:50 IST
Udaipur Gram Utsav : राजस्थान की लोक संस्कृति में अलगोजा वाद्य यंत्र की अनोखी पहचान है. पाकिस्तान से राजस्थान पहुंचे इस पारंपरिक वाद्य यंत्र की मधुर धुनें आज भी श्रोताओं को मंत्रमुग्ध कर देती हैं. उदयपुर के ग्राम उत्सव में जैसलमेर से आए कलाकार राणाराम और उनके परिवार ने अलगोजा के सुरों से लोक परंपरा, साधना और विरासत का जीवंत प्रदर्शन किया.
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उदयपुर : राजस्थान की लोक परंपराओं और संगीत में विभिन्न वाद्य यंत्रों की भूमिका हमेशा से ही महत्वपूर्ण रही है. इनके माध्यम से राज्य की संस्कृति और लोककला की गहराई को महसूस किया जा सकता है. ऐसे ही एक खास वाद्य यंत्र है ‘अलगोजा’, जो अपनी अनोखी धुन और मनमोहक संगीत के कारण राजस्थान में विशेष स्थान रखता है. यह वाद्य यंत्र मूलतः पाकिस्तान से राजस्थान आया था और आज राजस्थान की लोक संस्कृति का अभिन्न हिस्सा बन चुका है.
अलगोजा वाद्य यंत्र मुख्यतः दो बांसुरियों से मिलकर बनता है. इसे बजाना कोई आसान काम नहीं है, क्योंकि इसमें सांस और ताल दोनों का अद्भुत समन्वय चाहिए. कलाकार सास के माध्यम से हर धुन को बड़े ही संयम और तालमेल के साथ बजाते हैं. राजस्थान में यह वाद्य यंत्र जैसलमेर के कुछ कलाकारों द्वारा पाकिस्तान से सीखा गया और फिर पीढ़ियों से पारंपरिक तौर पर बजाया जाता रहा.
ग्राम उत्सव में अलगोजा की मधुर धुनेंउदयपुर शहर में ग्राम उत्सव के दौरान इस वाद्य यंत्र की मधुर धुनें श्रोताओं को मंत्रमुग्ध कर देती है. जैसलमेर से आए राणाराम संगीतकार ने बताया कि अलगोजा उनके परिवार का खास हिस्सा रहा है. उनके पिता और काका भी इस वाद्य यंत्र के धुनों को वर्षों तक जीवित रखते आए. राणाराम ने कहा कि अब वह खुद इस वाद्य यंत्र को बजाते हैं और उनके बच्चे भी इसे सीखकर पारंपरिक धुनों को आगे बढ़ा रहे हैं.
राणाराम के सुरों में बसी लोक परंपराखास बात यह है कि राणाराम के काका काना राम ने अद्वितीय कौशल के दम पर गिनीज बुक ऑफ वर्ल्ड रिकॉर्ड में भी अपना नाम दर्ज करवाया है. वहीं अब उनके प्रदर्शन ने देश-विदेश में राजस्थान की सांस्कृतिक धरोहर का नाम रोशन किया है. अलगोजा की धुनों में जो मिठास और संगीत की गहराई है, वह दर्शकों को एक अलग ही अनुभव प्रदान करती है.
अलगोजा से विश्व मंच पर राजस्थानइस वाद्य यंत्र की पहचान इसकी मधुर और तालबद्ध धुनों से होती है. यह न केवल राजस्थान के ग्रामीण उत्सवों में गूंजता है, बल्कि बड़े सांस्कृतिक कार्यक्रमों और संगीत समारोहों में भी अपनी छाप छोड़ता है.राणाराम के परिवार की मेहनत और लगन से यह पारंपरिक संगीत आज भी जीवित है और आने वाली पीढ़ियों तक इसे पहुंचाने का कार्य जारी है.
पीढ़ियों से जीवित है अलगोजा की विरासतराजस्थान की लोक संस्कृति में अलगोजा का यह सफर इस बात का प्रमाण है कि पारंपरिक कला और संगीत, चाहे किसी भी सीमा से आए हों, यदि स्नेह और अनुशासन के साथ निभाए जाएं तो वह शाश्वत बन जाते हैं. राणाराम और उनके परिवार ने इसे पूरी तरह से अपने जीवन का हिस्सा बना लिया है, और यही वजह है कि उनकी धुनें सुनने वाले हर श्रोता पर लंबे समय तक असर छोड़ती हैं.
About the AuthorRupesh Kumar Jaiswal
A Delhi University graduate with a postgraduate Diploma in Journalism and Mass Communication, I work as a Content Editor with the Rajasthan team at India Digital. I’m driven by the idea of turning raw in…और पढ़ें
Location :
Udaipur,Rajasthan
First Published :
December 31, 2025, 18:50 IST
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राजस्थान की लोक संस्कृति में राणाराम परिवार की अलगोजा विरासत



