संसद का हंगामा तो ट्रेलर है, असली फिल्म तो विधानसभाओं में चली है, हीरो बनकर निकला राजस्थान-झारखंड

हाइलाइट्स
राजस्थान विधानसभा में हाल ही में खत्म हुए सत्र में जमकर हंगामा हुआ.झारखंड विधानसभा में हंगामा के चलते 18 विधायकों को निलंबित किया गया था.
जयपुरः संसदीय राजनीति में विपक्ष द्वारा बवाल करना कोई नई बात नहीं है. सत्ता पक्ष के कामों में खोट तलाशना और उसके खिलाफ आवाज उठाना प्रतिपक्ष का धर्म भी है और कर्म भी. लेकिन विरोध विषयगत मुद्दों पर हो, तभी इसकी सार्थकता भी है. विपक्ष का विरोध अगर शक्ति प्रदर्शन का उपक्रम बन जाए तो इससे किसी के भले की उम्मीद करना बेईमानी है. विधानमंडलों और संसद में विरोध के बहाने हंगामा खड़ा करने की परिपाटी, जिस तरह बीते दो दशकों में विकसित हुई है, उससे अपने समर्थकों को राजनीतिक पार्टियां भले उत्साहित कर लें, लेकिन जनता का कुछ भला होना शायद ही संभव होगा.
राजस्थान विधानसभा में खूब मचा बवालराजस्थान विधानसभा में पिछले दो दिनों तक हंगामे की स्थिति बनी रही. सत्ता पक्ष और विपक्ष के सदस्य आपस में ऐसे उलझे, जैसे किसी जमीन के टुकड़े के लिए झगड़े होते हैं. मार्शल से धक्का-मुक्की और विपक्षी सदस्यों के सदन में धरने से माहौल तनावपूर्ण बना रहा. बार-बार सदन की कार्यवाही स्थगित करने की नौबत आई. यह स्थिति सिर्फ राजस्थान में ही नहीं, बल्कि इस बार बिहार और झारखंड विधानसभा में भी देखने को मिली है.
झारखंड में 18 विधायकों का निलंबनझारखंड में स्पीकर ने विपक्ष के 18 विधायकों को निलंबित किया. बिहार में यह नौबत तो नहीं आई, लेकिन हंगामे की स्थिति पूरे सत्र के दौरान बनी रही. राजस्थान में भी हंगामे के मद्देनजर स्पीकर ने विपक्ष के एक विधायक को निलंबित कर दिया. संसद में भी इस बार ऐसे ही हंगामे होते रहे हैं. विधायी सदनों में हंगामे पहले भी होते रहे हैं, पर इस बार इसकी गति तेज हुई है. जनता के मुद्दों पर चर्चा के बजाय विपक्षी सदस्य शक्ति प्रदर्शन में लगे हुए हैं.
बिहार विधानमंडल में विपक्ष का बेतुका हंगामाबिहार में हाल ही विधानमंडल का मानसून सत्र समाप्त हुआ है. अव्वल तो विधानसभा में नेता प्रतिपक्ष तेजस्वी यादव ने पूरे सत्र से दूरी बनाए रखी. वे सदन की बैठक की पूर्व सूचना के बावजूद विरोध की ऊर्जा अर्जित करने के लिए दूर देश में तफरीह फरमाते रहे. बेलगाम विपक्षी विधायकों ने विधानसभा में मोर्चा संभाला. उनके हंगामे का अंदाज ऐसा कि सदन में टेबल गिराए-पटके गए. हो-हल्ला होता रहा. विपक्ष ने विरोध के लिए पहले से ही दो मुद्दे चुन लिए थे.
इन दो मांगों को लेकर बिहार विधानसभा में हंगामाइनमें एक था बिहार को विशेष राज्य का दर्जा और दूसरा था आरक्षण कानून को नौवीं अनुसूची में शामिल कराने की मांग. केंद्र सरकार ने नीति आयोग के पैरामीटर का हवाला देकर बिहार को विशेष राज्य का दर्जा देने से इनकार कर दिया है. यह तकनीकी मामला है और इसके लिए केंद्र सरकार की जिम्मेवारी बनती है. पर, विपक्ष ने इस पर विधानसभा में हंगामा किया. यह जानते हुए भी कि राज्य सरकार की इसमें कोई भूमिका ही नहीं है.
आरक्षण को नौंवी अनुसूची में डालने का मुद्दाविपक्ष के हंगामे का दूसरा मुद्दा जाति सर्वेक्षण के बाद बढ़ाए गए आरक्षण को नौवीं अनुसूची में शामिल करने का था. विपक्ष में बैठे विधायकों को यह अच्छी तरह मालूम था कि हाईकोर्ट ने आरक्षण की सीमा बढ़ाए जाने पर रोक लगा दी है. राज्य सरकार ने हाईकोर्ट की रोक के खिलाफ सुप्रीम कोर्ट में अपील की है. ऐसे में नौवीं अनुसूची में शामिल करना संभव ही नहीं. इसके बावजूद सिर्फ शक्ति प्रदर्शन के लिए विपक्ष ने यह मुद्दा उठाया. हंगामा किया. टेबल पलटेय स्पीकर लाचार दिखे. उनकी चेतावनी का भी कोई असर नहीं हुआ. ऐसे में बार-बार सदन की कार्यवाही स्थगित होती रही. जनप्रतिनिधि जनता की समस्याओं पर विधानसभा या विधान परिषद में बात करते हैं. जनता की समस्याएं हंगामे की भेंट चढ़ गईं.
सस्पेंशन के बाद झारखंड असेंबली में शांति लौटीझारखंड विधानसभा में तो विपक्ष ने इससे अधिक बवाल काटा. जिन समस्याओं पर विपक्ष मुख्यमंत्री से जवाब चाहता था, सीएम उसके लिए तैयार भी थे. उन्होंने आश्वस्त भी किया कि विपक्ष के उठाए मुद्दे उन्होंने नोट कर लिए हैं. सबके जवाब वे समय पर देंगे. विपक्ष तुरंत जवाब पर अड़ा रहा. सदन में हंगामा होता रहा. हद तो तब हो गई, जब सरकार से तुरंत जवाब के लिए विपक्षी विधायक सदन में ही धरने पर बैठ गए. सदन की कार्यावधि समाप्त होने पर विपक्षी विधायकों ने बाहर निकलने से मना कर दिया. कार्यवाही समाप्त होने के बाद भी तकरीबन सात-आठ घंटे तक वे सदन के फर्श पर ही पसरे रहे. आखिरकार मार्शल की मदद से उन्हें बाहर निकाला गया.
तमिलनाडु और यूपी की घटनाओं की याद आईविधायी सदनों में इस तरह की बातें अब फैशन बनती जा रही हैं. वर्ष 2017 में तमिलनाडु विधानसभा में जो हंगामा हुआ, वह तो अविस्मरणीय घटना है. तब सदन में कुर्सियां एक दूसरे पर फेंकी गई थीं. विधायक तो आपस में उलझे ही, स्पीकर के साथ भी बदसलूकी हुई. उनकी शर्ट फाड़ दी गई थी. विधायक उनकी कुर्सी पर बैठ गए थे. 25 मार्च 1989 को भी तमिलनाडु विधानसभा में ऐसी ही घटना हुई थी. तब डीएके और एडीएमके के विधायक आपस में सदन के भीतर ही लड़ गए थे. जयललिता की साड़ी फाड़ने की कोशिश का आरोप भी एक सदस्य पर लगा था.
यूपी विधानसभा में ऐसा ही दृश्य 22 अक्टूबर 1997 को देखने को मिला था. विधानसभा में हिंसक झड़प हुई. कल्याण सिंह को विश्वासमत साबित करना था. सत्ता पक्ष और विपक्ष के बीच जम कर जूते-चप्पल चले. माइक एक दूसरे पर फेंके गए. इस झड़प में कई विधायक घायल हो गए थे.
बजट पर चर्चा के बजाय कास्ट सेंसस का मुद्दासंसद में भी इस बार हंगामा ही अधिक होता रहा है. चर्चा बजट पर होनी थी. विपक्ष जाति जनगणना का मुद्दा लेकर बैठ गया. इस चर्चा ने ऐसा विभत्स रूप अख्तियार किया कि बजट बनाने वाले अफसरों की जाति पर बात आ गई. नेता प्रतिपक्ष राहुल गांधी ने जाति पर चर्चा छेड़ी तो सत्ता पक्ष से अनुराग ठाकुर ने उनकी जाति ही पूछ डाली. बजट की चर्चा संसद में जाति चर्चा में बदल गई. सदन में सार्थक बहस बेतुकी बहस का रूप अख्तियार कर चुकी है. मूल मुद्दे की जगह जाति जनगणना, पेपर लीक जैसे मुद्दों पर विपक्ष सरकार को कठघरे में खड़ा करने की कोशिश करता रहा है.
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FIRST PUBLISHED : August 7, 2024, 07:57 IST