EVM Candidate Listing: ईवीएम में आपका उम्मीदवार पहले या बाद में, क्या है चुनाव आयोग का क्रम निर्धारित करने का नियम?

How EVM Works and Candidate Listing: बिहार में अगले विधानसभा चुनाव की सुगबुगाहट है. जब भी मतदान होता है तो इलेक्ट्रॉनिक वोटिंग मशीन (EVM) का इस्तेमाल होता है. वोट डालने और वोटों की गिनती को आसान बनाने वाली EVM में उम्मीदवारों के नाम किस क्रम में होंगे, यह जानना मतदाताओं के लिए बेहद जरूरी है. चुनाव आयोग (Election Commission) ने इसके लिए स्पष्ट नियम और मानक तय किए हैं, ताकि किसी भी तरह का कोई असमंजस न रहे.
ईवीएम में उम्मीदवारों के नाम का क्रम राज्य की राजकीय भाषा के आधार पर तय होता है. बिहार की आधिकारिक भाषा हिंदी है, इसलिए यहां उम्मीदवारों के नाम हिंदी वर्णमाला के क्रमानुसार (अ, आ, इ, ई… क, ख, ग…) ईवीएम में सेट किए जाते हैं. चूंकि बिहार में सरकारी कामकाज देवनागरी लिपि में होता है, इसलिए ईवीएम में नाम इसी लिपि के क्रम के अनुसार व्यवस्थित होंगे. भले ही क्रम हिंदी से तय हो, वोटरों की सुविधा के लिए अक्सर हिंदी के साथ-साथ उम्मीदवार का नाम अंग्रेजी में भी लिखा जाता है. इससे राज्य में रहने वाले गैर-हिंदी भाषी या अन्य राज्यों के वोटर भी नाम आसानी से पढ़ पाते हैं.
राष्ट्रीय पार्टियों के उम्मीदवार पहलेईवीएम में उम्मीदवारों के नाम एक तय व्यवस्था और वरीयता क्रम के अनुसार लगाए जाते हैं. यह सुनिश्चित करने के लिए कि कोई भ्रम न हो, चुनाव आयोग ने एक स्पष्ट पदानुक्रम (Hierarchy) निर्धारित किया है. ईवीएम में सबसे पहले राष्ट्रीय पार्टियों के उम्मीदवारों के नामों को स्थान दिया जाता है. राष्ट्रीय दलों के बाद पंजीकृत मान्यता प्राप्त क्षेत्रीय पार्टियों के उम्मीदवारों के नाम प्रदर्शित होते हैं. तीसरे क्रम पर वे दल आते हैं जो चुनाव आयोग में पंजीकृत तो हैं, लेकिन जिन्हें कोई मान्यता प्राप्त नहीं है. अंत में निर्दलीय उम्मीदवारों के नामों को रखा जाता है. इन सभी श्रेणियों के उम्मीदवारों के नामों को प्रदर्शित करने के बाद सबसे आखिरी में मतदाताओं के लिए NOTA (नोटा – इनमें से कोई नहीं) का विकल्प दिया जाता है.
एक ईवीएम में अधिकतम कितने उम्मीदवार?ईवीएम की क्षमता को लेकर अक्सर यह सवाल पूछा जाता है कि एक मशीन में अधिकतम कितने उम्मीदवारों के लिए वोट डाला जा सकता है. एक ईवीएम की बैलेट यूनिट में अधिकतम 16 उम्मीदवारों के नाम समाहित किए जा सकते हैं. चुनाव आयोग के नियमों के अनुसार एक कंट्रोल यूनिट के साथ अधिकतम चार बैलेट यूनिट को जोड़ा जा सकता है. इसका मतलब है कि एक पूरी ईवीएम सेट-अप (1 कंट्रोल यूनिट + 4 बैलेट यूनिट) में अधिकतम 64 उम्मीदवारों के लिए वोटिंग की जा सकती है. यदि किसी निर्वाचन क्षेत्र में उम्मीदवारों की संख्या 64 से अधिक हो जाती है, तो चुनाव आयोग के पास ईवीएम के बजाय पारंपरिक मतपत्र (Ballot Paper) का उपयोग करके मतदान कराने का निर्णय लेने का विकल्प होता है.
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ईवीएम में वोटों की अधिकतम संख्याईवीएम की तकनीकी क्षमता और मतदान केंद्र (Polling Booth) पर वोटरों की संख्या के बीच एक स्पष्ट संबंध है, जिसके नियम चुनाव आयोग द्वारा निर्धारित हैं. एक ईवीएम की कंट्रोल यूनिट में अधिकतम 3,840 वोट दर्ज करने की क्षमता होती है. भारत में प्रत्येक मतदान केंद्र या बूथ पर अधिकतम 1,500 मतदाता ही वोट डाल सकते हैं. यदि किसी क्षेत्र में मतदाताओं की संख्या इससे अधिक होती है तो दूसरा बूथ बनाया जाता है. चूंकि ईवीएम की क्षमता (3,840 वोट) मतदान केंद्र के मानक (1,500 वोटर) से काफी अधिक है, इसलिए एक मतदान केंद्र पर एक ईवीएम सेट-अप आमतौर पर पर्याप्त होता है.
कब हुआ था पहली बार ईवीएम का प्रयोगभारत में ईवीएम के प्रयोग की शुरुआत आजादी के बाद से चली आ रही मतपत्र व्यवस्था में एक महत्वपूर्ण बदलाव था. ईवीएम का प्रयोग पहली बार 1982 में किया गया था. यह ऐतिहासिक प्रयोग केरल राज्य के परावुर विधानसभा क्षेत्र के 50 मतदान केंद्रों पर किया गया था. हालांकि, इस प्रयोग को तुरंत कानूनी चुनौती मिली. चुनाव में हारने वाले उम्मीदवार ई. सी. जोस ने ईवीएम के माध्यम से हुए मतदान और परिणाम को अदालत में चुनौती दी थी. कोर्ट ने जोस की याचिका को स्वीकार कर लिया, जिसके परिणामस्वरूप उन बूथों पर ईवीएम से हुए मतदान को अमान्य घोषित किया गया और पुनः मतदान कराने का आदेश दिया गया था. इस घटना के बाद ईवीएम के व्यापक उपयोग के लिए कानूनी ढांचा तैयार करने में कुछ समय लगा, लेकिन यह भारतीय चुनाव प्रणाली के आधुनिकीकरण की दिशा में पहला कदम था.
ईवीएम को कब मिली कानूनी मान्यताईवीएम को पूरे देश में चुनावों के लिए इस्तेमाल करने की अनुमति तब मिली जब भारत की संसद ने इसके संबंध में कानून में संशोधन किया. दिसंबर 1988 में संसद ने लोक प्रतिनिधित्व अधिनियम, 1951 में संशोधन किया. इस संशोधन के तहत अधिनियम में एक नई धारा 61(क) जोड़ी गई. इस धारा ने भारत निर्वाचन आयोग को चुनावों में इलेक्ट्रॉनिक वोटिंग मशीनों का उपयोग करने के लिए आधिकारिक रूप से अधिकार प्रदान किया. यह कानूनी संशोधन 15 मार्च, 1989 से प्रभावी हुआ. इस कानूनी आधार के बाद ईवीएम के उपयोग को लेकर आगे की राह साफ हो गई. वर्ष 2004 के आम चुनावों में देश के सभी 543 संसदीय निर्वाचन क्षेत्रों में पहली बार ईवीएम का इस्तेमाल किया गया, जिसने भारत को पूरी तरह से ई-लोकतंत्र की ओर बढ़ा दिया.


