Court News | Madras High Court news- आजादी की निशानी क्यों न बने? हिन्दुओं के हक में फैसला देकर विपक्ष के निशाने पर आए जस्टिस स्वामिनाथन फिर चर्चा में क्यों?

Court News: मद्रास हाई कोर्ट के जस्टिस जी. आर. स्वामीनाथन एक बार फिर सुर्खियों में हैं. हाल के दिनों में मंदिर में दीप जलाने से जुड़े फैसले को लेकर वे विपक्षी दलों के निशाने पर आए थे. उनके खिलाफ महाभियोग चलाने की कवायद भी हुई. वहीं अब उन्होंने एक और ऐसा आदेश दिया है, जिसने सियासी बहस को फिर हवा दे दी है. 18वीं सदी में अंग्रेजों के खिलाफ लड़े गए नथम कनवाई युद्ध की याद में स्मारक स्तूप बनाने की अनुमति देते हुए जस्टिस स्वामीनाथन ने सवाल उठाया है कि अगर आजादी और प्रतिरोध की ऐसी लड़ाइयों की निशानी नहीं बनेगी, तो फिर क्या बनेगी?
इस फैसले के दौरान अदालत की टिप्पणी सिर्फ एक स्मारक तक सीमित नहीं रही, बल्कि उसने इतिहास, पहचान और आज की पीढ़ी की समझ पर भी तीखा सवाल खड़ा किया. “आजादी की निशानी क्यों न बने?” — इसी भाव के साथ जस्टिस स्वामीनाथन ने सरकार के सामने दोहरे मानदंडों का मुद्दा रखा और स्टैन स्वामी के मेमोरियल का जिक्र करते हुए यह समझाने की कोशिश की कि औपनिवेशिक दौर में भारतीयों के प्रतिरोध को याद करना किसी एक वर्ग का नहीं, बल्कि पूरे समाज का अधिकार है.
क्या है पूरा मामला?
यह मामला तमिलनाडु के नथम कनवाई इलाके से जुड़ा है, जहां वर्ष 1755 में ब्रिटिश सेना और स्थानीय मेलूर कल्लर समुदाय के बीच एक भीषण युद्ध हुआ था. इस युद्ध की स्मृति में एक स्तूप बनाने का प्रस्ताव रखा गया था, लेकिन नथम के तहसीलदार ने इसकी अनुमति देने से इनकार कर दिया. इसके बाद एक याचिकाकर्ता ने मद्रास हाई कोर्ट में रिट याचिका दायर की. इसी याचिका पर सुनवाई करते हुए जस्टिस जी. आर. स्वामीनाथन ने तहसीलदार के फैसले पर सवाल उठाए और स्मारक निर्माण का रास्ता साफ किया.
क्यों कोर्ट ने जताई नाराजगी?
सुनवाई के दौरान जस्टिस स्वामीनाथन ने गहरी चिंता जाहिर करते हुए कहा कि आज की पीढ़ी को भारत के औपनिवेशिक शासन के इतिहास की जानकारी नहीं है. उन्होंने यह भी कहा कि लोगों को यह नहीं पता कि गुलामी से मुक्ति के लिए किस तरह की लड़ाइयां लड़ी गई थीं. कोर्ट के मुताबिक ऐसे ऐतिहासिक संघर्षों की स्मृति को संरक्षित करना समाज के लिए जरूरी है, ताकि आने वाली पीढ़ियां अपने अतीत को समझ सकें.
स्टेन स्वामी के मेमोरियल का क्यों हुआ जिक्र?
जस्टिस स्वामीनाथन ने सुनवाई के दौरान कहा,
राज्य में अगर स्टेन स्वामी की याद में पत्थर का स्तंभ लगाया जा सकता है और उसके लिए किसी अनुमति की आवश्यकता नहीं पड़ी, तो निश्चित रूप से नथम कनवाई युद्ध की स्मृति में स्तूप स्थापित करने के लिए भी अनुमति की जरूरत नहीं होनी चाहिए.
स्टेन स्वामी एक जेसुइट पादरी और आदिवासी अधिकार कार्यकर्ता थे, जिनका नाम भीमा कोरेगांव हिंसा मामले से भी जोड़ा गया था. उनकी 2021 में मौत के बाद मद्रास हाई कोर्ट ने उनकी याद में स्मृति स्तंभ बनाने की अनुमति दी थी. इसी उदाहरण के जरिए कोर्ट ने सरकार के दोहरे मापदंडों पर सवाल खड़े किए.
क्या हुआ था नथम कनवाई युद्ध में?
याचिकाकर्ता की ओर से कोर्ट को बताया गया कि वर्ष 1755 में नथम कनवाई इलाके में मेलूर कल्लर समुदाय और ब्रिटिश सेना के बीच संघर्ष हुआ था. इस युद्ध में कल्लर समुदाय ने ब्रिटिश सेना को पराजित किया था. याचिका के मुताबिक यह संघर्ष कोइलकुड़ी के तिरुमोगुर मंदिर से जुड़ा था. ब्रिटिश सैनिकों ने कर्नल अलेक्जेंडर हेरॉन के नेतृत्व में मंदिर से पीतल की मूर्तियां और अन्य कीमती सामान लूट लिया था. इसके बाद कल्लर समुदाय ने संगठित होकर युद्ध किया और लूटी गई मूर्तियों को वापस हासिल किया.
फैसले का व्यापक संदेश
इस फैसले को सिर्फ एक स्मारक निर्माण की अनुमति के तौर पर नहीं देखा जा रहा है. कोर्ट ने इसके जरिए यह संदेश दिया है कि औपनिवेशिक दौर में हुए भारतीय प्रतिरोध को भुलाया नहीं जाना चाहिए. ऐसे संघर्षों की याद न सिर्फ इतिहास का हिस्सा हैं, बल्कि समाज को अपनी जड़ों से जोड़ने का काम भी करती हैं. जस्टिस स्वामीनाथन का यह फैसला यह भी दिखाता है कि कोर्टें सिर्फ कानून की व्याख्या नहीं करतीं, बल्कि सामाजिक और ऐतिहासिक चेतना को भी सामने लाने की भूमिका निभाती हैं.


