पनामा नहर पर कब्जे की वो खूनी जंग: 1962 के दंगों से लेकर 2026 में अमेरिका vs चीन तक, इनसाइड स्टोरी | Panama Canal History From 1962 Riots To China vs America Rivalry

Last Updated:January 10, 2026, 04:38 IST
Panama Canal History: पनामा नहर की कहानी 1962 के खूनी दंगों से शुरू हुई थी. उस वक्त पनामा के लोगों ने अमेरिकी कब्जे के खिलाफ विद्रोह किया था. 1999 में पनामा को पूरा कंट्रोल मिला लेकिन संघर्ष थमा नहीं. 2026 में यह नहर चीन और अमेरिका के बीच प्रतिस्पर्धा का बड़ा अड्डा बन गई है. साथ ही जलवायु परिवर्तन और पानी की कमी ने इसकी सुरक्षा को वैश्विक चिंता बना दिया है. पनामा नहर आज भी वर्ल्ड पॉलिटिक्स का केंद्र है. (File Photos : Reuters)
पनामा नहर अपने निर्माण से ही दुनिया में पावर का सबसे बड़ा प्रतीक रही है. 10 जनवरी 1962 का दिन इतिहास में दर्ज है. उस दिन पनामा सिटी की सड़कों पर भारी खून बहा था. पनामा के लोग अपनी जमीन पर हक चाहते थे. अमेरिका उस वक्त इस नहर पर पूरा कंट्रोल रखता था. पनामा के युवाओं का गुस्सा सातवें आसमान पर था. यह दंगे सिर्फ लड़ाई नहीं बल्कि एक क्रांति थे. इसी विद्रोह ने अमेरिका को अपनी नीति बदलने पर मजबूर किया. आज 2026 में भी यह नहर चर्चा में बनी हुई है. अब इस पर हक की लड़ाई नए रूप में दिख रही है. पनामा नहर की संप्रभुता का संघर्ष अभी खत्म नहीं हुआ है. इसमें इतिहास का दर्द और भविष्य की चुनौतियां दोनों छिपी हैं.

पनामा में 1960 के दशक में राष्ट्रवादी आंदोलन शुरू हुए. अमेरिका इस नहर को अपनी जागीर समझता था. शीत युद्ध के दौरान यह नहर बहुत जरूरी थी. यह अमेरिकी नौसेना और ट्रेड के लिए लाइफलाइन थी. पनामा के लोग इसे गुलामी का प्रतीक मानते थे. 1962 के दंगों ने अमेरिका के प्रभुत्व को हिला दिया.

लोगों ने अपनी जमीन पर अपना झंडा फहराने की मांग की. इस जनआक्रोश ने अंतरराष्ट्रीय स्तर पर बड़ा मैसेज दिया. अमेरिका को समझ आ गया कि वह ज्यादा दिन कब्जा नहीं रख पाएगा. संप्रभुता की यह मांग पूरी दुनिया में फैल गई थी. इसी दबाव के कारण अमेरिका को संधि के लिए झुकना पड़ा.
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विवाद बढ़ने पर 1977 में एक ऐतिहासिक फैसला हुआ. अमेरिका और पनामा के बीच ‘टोरीहोस-कार्टर’ संधि हुई. इस संधि ने नहर के भविष्य की नई दिशा तय कर दी. इसमें तय हुआ कि नियंत्रण धीरे-धीरे पनामा को मिलेगा. यह एक लंबी और कठिन कूटनीतिक जीत थी. अमेरिका ने अपना प्रशासनिक कंट्रोल छोड़ने पर सहमति दी.

31 दिसंबर 1999 को पनामा ने पूरा कंट्रोल संभाल लिया. यह दिन पनामा के लिए असली आजादी जैसा था. अमेरिका के प्रत्यक्ष शासन का अंत हो चुका था. लेकिन पर्दे के पीछे अमेरिका का प्रभाव खत्म नहीं हुआ. वह आज भी वहां के फैसलों में दखल रखता है.

आज 2026 में हालात फिर से बदल चुके हैं. अब अमेरिका का प्रभाव पार्टनरशिप के रूप में दिखता है. वह ग्लोबल ट्रेड और सुरक्षा के नाम पर सक्रिय है. लेकिन अब चीन ने भी यहां अपनी पैठ बना ली है. पिछले कुछ सालों में चीन ने बड़े पोर्ट्स बनाए हैं. उसने पनामा के इंफ्रास्ट्रक्चर में भारी निवेश किया है. चीन अब मिडिल अमेरिका में अपनी धाक जमा रहा है. इससे पनामा नहर फिर से महाशक्तियों की लड़ाई का केंद्र बन गई है.

अमेरिका को डर है कि चीन उसके व्यापार को रोक सकता है. यह नहर अब ग्लोबल सप्लाई चेन की सबसे बड़ी कमजोरी है. पनामा एक बार फिर दो बड़े देशों के बीच फंस गया है.

पनामा नहर के सामने अब एक नया दुश्मन खड़ा है. जलवायु परिवर्तन ने नहर का पानी सुखा दिया है. पानी की कमी से जहाजों का निकलना मुश्किल हो रहा है. 2026 में परिचालन की चुनौतियां बहुत बढ़ गई हैं. इससे ग्लोबल सप्लाई चेन पर बुरा असर पड़ रहा है. दुनिया के बड़े देश अब इसकी सुरक्षा को लेकर चिंतित हैं.

पानी कम होने से नहर का स्ट्रैटेजिक महत्व और बढ़ गया है. अब लड़ाई सिर्फ कब्जे की नहीं बल्कि पानी की भी है. पनामा नहर आज भी ग्लोबल इकोनॉमी की धड़कन बनी हुई है. इसकी स्थिरता पूरी दुनिया की आर्थिक सुरक्षा से जुड़ी हुई है.
First Published :
January 10, 2026, 04:38 IST
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पनामा नहर पर कब्जे की वो कहानी जिसने अमेरिका को झुका दिया, अब चीन ने बढ़ाया कदम



