GROUND REPORT : मिट्टी के दीपक बनाने वाले कुम्हार परेशान, मेहनत भारी लेकिन मुनाफा जरा भी नहीं!

Last Updated:October 18, 2025, 14:27 IST
GROUND REPORT : पाली के कुम्हार इस दिवाली फिर मिट्टी के दीपकों से लोगों के घर रोशन कर रहे हैं, लेकिन उनके अपने घर अंधेरे में डूबे हैं. मेहनत और लागत के बावजूद मुनाफा नहीं, सरकार की दी मशीनें भी खराब. कारीगर कहते हैं सहायता न मिली तो मिट्टी के दीपक बनाने की यह परंपरा बुझ जाएगी.
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पाली : दीपावली पर लोगों के घरों को माटी के दीपक से रोशन करने वाले उन कुम्हार समाज से जुडे़ परिवारों के घर ही अंधेरो में डूबा है. वजह मेहनत इतनी और लागत भी इतनी ज्यादा कि जो पर्याप्त मुनाफा होना चाहिए वह नहीं हो पाता जिससे इन परिवार से जुडे़ बच्चें दीपावली को खुशियों से नहीं मना पाते. दीपावली का त्योहार नजदीक आते ही सादड़ी में कुम्हारों ने मिट्टी के दीपक बनाने का काम तेज कर दिया है. दीपकों की बढ़ती मांग को देखते हुए कारीगर दिन-रात काम में जुटे हुए हैं. वे कई के सुंदर दीपक तैयार कर रहे हैं.
कुम्हार समाज में इस पारंपरिक कला को लेकर विशेष उत्साह देखा जा रहा है. हाथ से बने इन दीपकों की अपनी एक अलग पहचान और महक होती है. कुम्हार रामलाल प्रजापत बताते हैं कि इस बार मिट्टी के दीपकों के साथ-साथ मिट्टी से बनी अन्य वस्तुओं की भी अच्छी मांग है. हालांकि, कारीगरों को अपनी मेहनत और लागत के अनुपात में उचित मूल्य नहीं मिल पा रहा है. वहीं बात करें सरकार की, तो माटी कला बोर्ड द्वारा उन्हें दिए बनाने के लिए जो मशीन मुहैया कराई गई थी, वह लगातार खराब हो रही है.
सरकार सहायता करे तो जिंदा रह सकेगा यह कारोबाररामलाल प्रजापत ने चिंता जताई कि दीपक बनाने में लगने वाली मेहनत और खर्च के मुकाबले उन्हें पर्याप्त मुनाफा नहीं होता. उन्होंने सरकार से इस पारंपरिक कला को जीवित रखने के लिए आर्थिक सहयोग या विशेष योजनाएं शुरू करने की अपील की है. उनका कहना है कि यदि सरकार सहायता प्रदान करे तो कुम्हार समाज को लाभ मिलेगा और मिट्टी के दीपक बनाने की सदियों पुरानी परंपरा बनी रहेगी.
सरकार की मशीनरी भी नहीं कर रही कामप्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी द्वारा “स्वदेशी अपनाओ” और “लोकल को वोकल बनाओ” के संदेश के बीच जोधपुर के कुम्हार समाज के पारंपरिक कारीगर एक अलग ही जद्दोजहद से जूझ रहे हैं. पाली और जोधपुर रोड पर स्थित झालामंड इलाके में रहने वाले दाऊलाल, जो पीढ़ियों से मिट्टी के दीपक बनाकर अपने परिवार का गुजारा कर रहे हैं, आजकल भारी परेशानियों का सामना कर रहे हैं. माटी कला बोर्ड द्वारा उन्हें दिए बनाने के लिए जो मशीन मुहैया कराई गई थी, वह लगातार खराब हो रही है और इसका कोई समाधान नहीं मिल पा रहा. दाऊलाल के परिवार के लोग बताते हैं कि दीपावली जैसे त्योहारों में जब मिट्टी के दीपकों की मांग बढ़ जाती है, तब यह खराब मशीन उनके लिए मुश्किलें बढ़ा देती है.
कई परिवार तो छोड चुके यह कार्य मनरूपलाल कुम्हार बताते हैं कि आधुनिक युग में भी मिट्टी के दीपक बनाने की यह परंपरा जीवित है. कारीगर आज भी पुरानी विधियों का उपयोग करते हुए सहजता से इन दीपकों का निर्माण करते हैं, जिनकी बाजार में अच्छी मांग बनी हुई है. वही पार्षद रमेश प्रजापत की माने तो इन दिनों मिट्टी के दिये बनाए जा रहे हैं. पहले यह काम तीन महीने पहले ही शुरू हो जाता था, लेकिन अब लागत ज्यादा और मुनाफा कम होने के कारण बहुत कम परिवार इस कार्य से जुड़े हुए हैं.
रुपेश कुमार जायसवाल ने दिल्ली यूनिवर्सिटी के ज़ाकिर हुसैन कॉलेज से पॉलिटिकल साइंस और इंग्लिश में बीए किया है. टीवी और रेडियो जर्नलिज़्म में पोस्ट ग्रेजुएट भी हैं. फिलहाल नेटवर्क18 से जुड़े हैं. खाली समय में उन…और पढ़ें
रुपेश कुमार जायसवाल ने दिल्ली यूनिवर्सिटी के ज़ाकिर हुसैन कॉलेज से पॉलिटिकल साइंस और इंग्लिश में बीए किया है. टीवी और रेडियो जर्नलिज़्म में पोस्ट ग्रेजुएट भी हैं. फिलहाल नेटवर्क18 से जुड़े हैं. खाली समय में उन… और पढ़ें
First Published :
October 18, 2025, 14:27 IST
homerajasthan
दिवाली की रौशनी बनाने वाले कुम्हार खुद अंधेरे में, मेहनत और परेशानी में फंसे



