Rajasthan

यमराज भी कांपे उस ‘गर्जना’ से… जब भक्त की पुकार पर पत्थर फाड़कर प्रकट हुईं माता, आज भी दिखता है अदृश्य पैंथर

Last Updated:December 26, 2025, 17:02 IST

Pali News : पाली के रोहट क्षेत्र की गाजनगढ़ पहाड़ी पर स्थित गाजण माता मंदिर में सात प्रतिमाएं हैं, अखंड ज्योत जलती है और यह स्थल परिहार गोत्र की कुलदेवी का प्रमुख आस्था केंद्र है. लोक मान्यताओं के अनुसार, मंडोर के राजा नाहर राव परिहार अपनी बारात मंडोर से सिरोही लेकर जा रहे थे. राजा चाहते थे कि चामुण्डा माता उनकी बारात में साथ चलें.

ख़बरें फटाफट

पाली. राजस्थान की पहचान इतिहास, लोक कथाओं और आस्था से जुड़े उन मंदिरों से बनती है, जिनके पीछे सदियों पुरानी मान्यताएं और चमत्कारी कहानियां जुड़ी हैं. ऐसी ही एक अद्भुत और रहस्यमयी कहानी पाली जिले के रोहट क्षेत्र से सामने आती है. यहां रोहट के पास गाजनगढ़ पहाड़ी पर स्थित गाजण माता का मंदिर लोगों की गहरी आस्था का केंद्र है. मान्यता है कि यहां गाजण माता की एक नहीं बल्कि सात अलग-अलग प्रतिमाएं स्वयं प्रकट हुई थीं. इस मंदिर के पीछे जुड़ी कथा सुनकर आज भी लोग हैरान रह जाते हैं. कहा जाता है कि एक राजा की जिद और माता की शर्त ने इस स्थान को आस्था का बड़ा केंद्र बना दिया.

लोक मान्यताओं के अनुसार, मंडोर के राजा नाहर राव परिहार अपनी बारात मंडोर से सिरोही लेकर जा रहे थे. राजा चाहते थे कि चामुण्डा माता उनकी बारात में साथ चलें. पहले माता ने मना कर दिया, लेकिन राजा की जिद पर माता ने एक शर्त रखी. माता ने कहा कि यदि रास्ते में उनका कोई भक्त उन्हें रोक देगा तो वह वहीं विराजमान हो जाएंगी. राजा ने यह शर्त स्वीकार कर ली और हाथी, घोड़े व नगाड़ों के साथ भव्य बारात रवाना हुई. जब यह बारात धर्मधारी कांकड़ क्षेत्र पहुंची, तब वहां ठाकुर कृपालदेव राजपुरोहित हजार गायों को चरा रहे थे. बारात की तेज आवाज से गायें घबरा गईं और भागने लगीं. इस पर कृपालदेव ने गायों को रोकने के लिए पुकारा, हे मां रूक जा. यही शब्द माता ने सुन लिए और उन्होंने अपने सिंह को वहीं रोक दिया. शर्त के अनुसार माता वहीं विराजमान हो गईं और उसी गर्जना के साथ उनका यहां प्राकट्य हुआ. तभी से माता का नाम गाजण माता पड़ गया.

आज भी जलती है अखंड ज्योतरोहट उपखंड क्षेत्र की गाजनगढ़ पहाड़ी पर स्थित गाजण माता का मंदिर आज जन-जन की आस्था का केंद्र बना हुआ है. मंदिर में माता की सात प्रतिमाएं स्थापित हैं और यहां अखंड ज्योत निरंतर जलती रहती है. मान्यता है कि यह ज्योत वर्षों से बिना बुझे जल रही है. सन् 1960 की आसोज शुक्ला नवमी तिथि को यह गांव परिहार शासक नाहर राव द्वारा ठाकुर करपाल पांचलोड राजपुरोहित को दिया गया था. उस समय का ताम्र पत्र आज भी सुरक्षित मौजूद है, जो इस स्थान के ऐतिहासिक महत्व को दर्शाता है.

माता के प्राकट्य के पीछे छिपा रहस्यकथा के अनुसार, राजा नाहर राव ने माता के वचन की सच्चाई जानने के बाद उनसे बारात आगे ले जाने की अनुमति मांगी. माता ने राजा को आगे जाने की अनुमति दी और कृपालदेव राजपुरोहित ने राजा को तोरण वंदन के समय सावधानी रखने की चेतावनी दी. विवाह के दौरान वही घटना घटी, जिसकी भविष्यवाणी की गई थी. इसके बाद लौटते समय राजा ने कृपालदेव को देवी की पूजा का दायित्व सौंपना चाहा, लेकिन कृपालदेव ने पत्थर की पूजा करने से इनकार कर दिया. तभी चामुण्डा माता तेज गर्जना के साथ पहाड़ फाड़कर वहीं विराजमान हो गईं. इसी कारण माता को गाजण माता कहा जाने लगा.

मंदिर परिसर और पैंथर की मान्यताकथा में आगे बताया जाता है कि कृपालदेव देवी के चरणों में गिर पड़े और आजीवन सेवा का वचन दिया. राजा नाहर राव ने देवी के नाम दस हजार बीघा भूमि और धर्मधारी गांव ताम्र पत्र पर लिखकर दान किया. यह ताम्र पत्र आज भी पृथ्वी परिवार के पुख सिंह के पास सुरक्षित बताया जाता है. गाजण माता परिहार गोत्र की कुलदेवी मानी जाती हैं. मंदिर परिसर में गाजण माता के नाम से गौशाला भी संचालित है. मंदिर और गौशाला की देखरेख पासलोर परिवार और राजपुरोहित परिवार द्वारा की जाती है. स्थानीय मान्यताओं के अनुसार, पहाड़ी क्षेत्र में पैंथर का वास है. ग्रामीणों का दावा है कि उन्होंने कई बार पैंथर को मंदिर के आसपास देखा है, हालांकि आज तक वह पकड़ा नहीं जा सका है.

धीरे धीरे हुआ मंदिर का विकाससमय के साथ गाजण माता के मंदिर में श्रद्धालुओं की संख्या बढ़ती चली गई. सबसे पहले चोटिला ठाकुर जोगसिंह ने यहां दो कमरों और एक बड़े हॉल का निर्माण करवाया. इसके बाद कई भामाशाहों और गाजण माता सेवा समिति के सहयोग से मंदिर का लगातार विकास होता रहा. आज यह मंदिर एक प्रमुख धार्मिक स्थल बन चुका है, जहां दूर-दूर से श्रद्धालु दर्शन के लिए पहुंचते हैं. मंदिर के साथ बनी गौशाला और पहाड़ी पर स्थित यह आस्था स्थल आज भी राजस्थान की लोक आस्था और सांस्कृतिक विरासत का जीवंत उदाहरण है.

About the AuthorAnand Pandey

नाम है आनंद पाण्डेय. सिद्धार्थनगर की मिट्टी में पले-बढ़े. पढ़ाई-लिखाई की नींव जवाहर नवोदय विद्यालय में रखी, फिर लखनऊ में आकर हिंदी और पॉलीटिकल साइंस में ग्रेजुएशन किया. लेकिन ज्ञान की भूख यहीं शांत नहीं हुई. कल…और पढ़ें

First Published :

December 26, 2025, 17:02 IST

homedharm

यमराज भी कांपे उस गर्जना से… जब भक्त की पुकार पर पत्थर फाड़कर प्रकट हुई माता

Source link

Related Articles

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *

Back to top button

Uh oh. Looks like you're using an ad blocker.

We charge advertisers instead of our audience. Please whitelist our site to show your support for Nirala Samaj