Rajasthan

Sumitra Sharma Story | 3000 Children Lives Transformed

सीकर. राजस्थान के सीकर जिले के भादवासी गांव में रहने वाली सुमित्रा शर्मा को लोग शेखावाटी की मदर टेरेसा कहते हैं. उम्र करीब 94–97 साल, लेकिन आज भी उनके चेहरे पर वही ममता, वही ऊर्जा और वही समर्पण दिखता है, जिसकी बदौलत वे अब तक 3000 से ज्यादा अनाथ और बेसहारा बच्चों की जिंदगी बदल चुकी हैं.

अपने ‘कस्तूरबा सेवा संस्थान’ में वे आज भी 40 से अधिक बच्चों का पालन-पोषण करती हैं. उनकी शिक्षा, स्वास्थ्य, नौकरी, विवाह और पूरे जीवन की जिम्मेदारी खुद निभाती हैं. संस्थान में बच्चे मुस्कुराते हुए कहते हैं “मां अंदर हैं.” और वह सच में सबके लिए माँ ही हैं. सफेद बॉर्डर वाली साड़ी, झुर्रियों में छिपी चमक, और आँखों में अथाह स्नेह.

संघर्षों से भरा बचपन गांधी और कस्तूरबा से मिली प्रेरणा1928 में हरियाणा के रोहतक में जन्मी सुमित्रा का बचपन बेहद कठिन रहा. जन्म के 10 दिन बाद पिता का देहांत हो गया और नाना-नानी ने कराची में परवरिश की. वे बचपन में नाना के साथ नमक आंदोलन तक में शामिल हुईं, जहाँ उनके भीतर समाज सेवा का भाव जगा.

महात्मा गांधी और कस्तूरबा को असहाय बच्चों के लिए काम करते देखकर उनके भीतर भी समाज सेवा का बीज बोया गया. 15 साल की उम्र में विवाह हुआ, देश के बंटवारे का दर्द देखा, और बाद में राजस्थान के अलवर में बस गईं.

1960 में सिर्फ 3 बच्चों से शुरुआत, 3000 से ज्यादा तक सफरसुमित्रा शर्मा ने अपने सेवा कार्य की शुरुआत 1960 में सीकर में किराए के मकान से सिर्फ तीन बच्चों को अपने साथ रखकर की. एक साल में बच्चे बढ़कर 60 हो गए.

1990 में नवलगढ़ रोड पर किराए का बड़ा भवन लिया.
उन्होंने पति की रिटायरमेंट की पूरी रकम बच्चों पर खर्च कर दी.
1998 में संस्थान का रजिस्ट्रेशन हुआ और 2007 में सरकार से जमीन मिलने के बाद भादवासी गाँव में नया भवन बन गया.

3000 जीवन संवारे डॉक्टर, आर्मी ऑफिसर, टीचर और सरकारी अफसर बने बच्चेआज संस्थान के लगभग 3000 बच्चे समाज के विभिन्न क्षेत्रों में स्थापित हैं, जो सुमित्रा शर्मा के प्रयासों की सफलता की कहानी कहते हैं:

20 बच्चे सरकारी नौकरियों में हैं.
कई आर्मी में तैनात हैं.
5 बच्चे मेडिकल सेक्टर में अपनी सेवा दे रहे हैं.
कई शिक्षक, एलडीसी और अन्य पदों पर कार्यरत हैं.

कई लड़कियों की शादी भी संस्थान ने करवाई है. 18 साल की उम्र के बाद बच्चे जयपुर हॉस्टल भेजे जाते हैं, लेकिन जिम्मेदारी तब तक रहती है जब तक बच्चा अपने पैरों पर खड़ा न हो जाए.

“जब बच्चे मां कहकर बुलाते हैं… जीवन सफल लगता है”सुमित्रा कहती हैं “बच्चे जब माँ बुलाते हैं, वही मेरी पूजा है.” संस्थान की लड़कियाँ गर्मियों में जब वापस आती हैं, तो कहती हैं “मायके आ गए.” 97 वर्ष की आयु में भी वे हर बच्चे का भविष्य उसी स्नेह से संवार रही हैं, जैसे वह उनका जन्म से अपना हो. उनका जीवन इस बात का प्रमाण है कि ममता की कोई उम्र नहीं होती और सेवा ही सच्ची पूजा है.

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