नागों से मंच तक का सफर: सपेरा जनजाति की यूनेस्को मान्य लोककला, आस्था और संघर्ष की कहानी

उदयपुर : राजस्थान अपनी रंगीन संस्कृति, लोककलाओं और परंपराओं के लिए विश्वभर में प्रसिद्ध है. इन्हीं अनमोल विरासतों में एक नाम है – सपेरा जनजाति, जो सदियों से नाग-संस्कृति, लोकसंगीत और पारंपरिक ज्ञान की वाहक रही है. अपने विशिष्ट हुनर और परंपरागत जीवनशैली के कारण इस जनजाति की लोककला को यूनेस्को की सांस्कृतिक विरासत सूची में भी पहचान मिली है.
सपेरा जनजाति का इतिहास धार्मिक मान्यताओं से जुड़ा हुआ है. समुदाय के बुजुर्गों के अनुसार उनकी उत्पत्ति भगवान शिव के वरदान से मानी जाती है. मान्यता है कि जब शिव के भुजंग लोगों को डसते थे, तब विष से रक्षा के लिए सपेरा समाज का उद्भव हुआ. इसी कारण नाग देवता की पूजा और सम्मान उनकी संस्कृति का अभिन्न हिस्सा है.
बीन से मंच तक: बदली सपेरा जीवनशैलीबीते दौर में सपेरा गांव-गांव जाकर सांप पकड़ने, विष उतारने और लोगों को सांपों से होने वाले खतरे से बचाने का काम करते थे. साथ ही बीन की धुन पर नाग-नागिन को नचाना उनकी आजीविका का प्रमुख साधन था. यह कला ग्रामीण जीवन में सुरक्षा के साथ-साथ मनोरंजन का माध्यम भी बनी रही. समय के साथ परिस्थितियां बदलीं.
कानून बदला, सपेरों की कला भी बदलीवन्यजीव संरक्षण कानूनों के तहत सांपों को पकड़ने और रखने पर प्रतिबंध लगने से सपेरा जनजाति की पारंपरिक आजीविका प्रभावित हुई. इसके बावजूद समुदाय ने हार नहीं मानी. अब सपेरा समाज ने अपनी कला को लोकनृत्य और सांस्कृतिक प्रस्तुतियों के रूप में ढाल लिया है. महिलाएं और पुरुष बीन की धुन पर नागिन की तरह नृत्य कर पर्यटकों के सामने अपनी परंपरा को जीवंत रखते हैं.
शिल्पग्राम में सपेरा नृत्य का आकर्षणउदयपुर के शिल्पग्राम सहित कई पर्यटन स्थलों पर सपेरा जनजाति के लोकनृत्य पर्यटकों को खासा आकर्षित करते हैं. काले परिधान, सधी हुई लय और सांपों की चाल की नकल करता यह नृत्य राजस्थान की लोकसंस्कृति को अलग पहचान देता है.
लोककला के पीछे सपेरा समाज का संघर्षचमकती लोककला के पीछे इस समुदाय का संघर्ष भी छिपा है. सपेरा जनजाति लंबे समय से घुमक्कड़ जीवन जीती आ रही है. स्थायी आवास, शिक्षा और स्वास्थ्य सुविधाओं की कमी आज भी उनकी बड़ी चुनौती है. समुदाय का कहना है कि सरकार की योजनाएं कागजों में हैं, लेकिन जमीनी स्तर पर लाभ सीमित है, खासकर बच्चों के भविष्य को लेकर चिंताएं बनी हुई हैं.
नाग संस्कृति के संवाहक हैं सपेरा समाजसपेरा जनजाति आज केवल एक लोककलात्मक समुदाय नहीं, बल्कि नाग-संस्कृति, आस्था और संघर्ष की जीवित मिसाल है. इस अनमोल विरासत को सहेजना और नई पीढ़ी के लिए सुरक्षित करना समाज और सरकार – दोनों की जिम्मेदारी है.



