एनिमल हसबेंडरी: खत्म हो जाएगी हरे चारे की समस्या, पशुपालक अपनाए ये तकनीक, बिना उगाए सालभर मिलेगा हरा चारा!

Last Updated:January 06, 2026, 17:39 IST
पशुपालकों के लिए साल भर पौष्टिक हरा चारा उपलब्ध कराना चुनौतीपूर्ण होता है. इस समस्या का समाधान साइलेज तकनीक है, जिसमें मक्का, ज्वार, बाजरा और नेपियर जैसी फसलें काटकर वायुरोधी स्थानों में किण्वन के माध्यम से सुरक्षित की जाती हैं. इस विधि से पोषक तत्व बेहतर बने रहते हैं, चारा पशुओं के लिए स्वादिष्ट और पचाने में आसान होता है, और खरपतवार भी नष्ट हो जाते हैं. साइलेज बनाने में फसल को सही समय पर काटकर छोटे टुकड़ों में काटा जाता है और परत-दर-परत दबाकर गड्ढे या साइलो में भरा जाता है.
पशुपालकों के लिए सबसे बड़ी समय पौष्टिक चारे की रहती है. हरा चारा पशुओं के लिए बहुत फायदेमंद रहता है. लेकिन, समय बड़ी समय है यह सालभर नहीं मिलता है. लेकिन पशुपालक साइलेज तकनीक को अपनाकर इस समस्या का समाधान पा सकते हैं. पशु चिकित्सक रामनिवास चौधरी ने बताया कि हरे चारे को साल भर सुरक्षित रखने और पशुओं को पौष्टिक आहार उपलब्ध कराने के लिए साइलेज तकनीक एक बेहतरीन विकल्प है.

उन्होंने बताया कि, यह विधि हरे चारे को किण्वन से हवा बंद स्थान में संरक्षित करने का एक तरीका है. साइलेज बनाने के लिए मक्का, ज्वार, बाजरा और नेपियर घास जैसी कार्बोहाइड्रेट से भरपूर चारा फसलों का उपयोग किया जाता है. इन फसलों को सही समय पर काटकर, छोटे टुकड़ों में काटकर कर पिट साइलो या टावर साइलो जैसे वायुरोधी स्थानों में दबाकर भरा जाता है.

पशु चिकित्सक के अनुसार, यह प्रकिया यह हरे चारे को सुखाने की तुलना में पोषक तत्त्वों को अधिक सुरक्षित रखता है. कम खर्च में उच्च गुणवत्ता वाला हरा चारा पूरे साल उपलब्ध हो जाता है, साइलेज का स्वाद हरे चारे से बेहतर होता है, जिससे पशु इसे चाव से खाते हैं और उनका पाचन भी सुधरता है. साइलेज बनाने की प्रक्रिया में अधिकांश खरपतवार नष्ट हो जाते हैं, जिससे खरपतवार युक्त चारे का भी उपयोग कर सकते हैं.
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साइलेज बनाने के लिए फसल को पूरी तरह पकने से पहले काटा जाता है. जैसे मक्का की फसल उस समय काटनी चाहिए जब भुट्टों में दाने बनना शुरू हो जाएं, जबकि ज्वार को फूल आने से पहले काटना सही रहता है. इससे चारे में पोषक तत्वों की मात्रा अधिक बनी रहती है. साइलेज तकनीक के तहत काटे गए चारे को 4 सी5 सेंटीमीटर के छोटे-छोटे टुकड़ों में काटना चाहिए.ताकि उसे गड्ढे में अच्छी तरह दबाया जा सके और हवा पूरी तरह बाहर निकल जाए, जिससे सही किण्वन हो सके.

इसके अलावा कटे हुए चारे को साइलेज गड्ढे में परत-दर-परत भरते हुए अच्छी तरह दबाना जरूरी होता है. दबाव इतना होना चाहिए कि अंदर हवा न बचे, क्योंकि हवा रहने से चारा सड़ सकता है. यदि चारे में नमी की कमी हो तो उस पर हल्का पानी छिड़कना चाहिए. इसके अलावा दलहनी चारे के मामले में नमक और शीरे का घोल मिलाना लाभकारी होता है, क्योंकि इससे किण्वन प्रक्रिया बेहतर होती है और साइलेज की गुणवत्ता में सुधार आता है.

पशु चिकित्सक रामनिवास चौधरी ने बताया कि अच्छी गुणवत्ता की साइलेज का रंग हल्का पीलापन लिए हरा होता है और उसमें लैक्टिक व एसिटिक अम्ल की हल्की, मीठी गंध आती है. यदि साइलेज से तीखी या अमोनिया जैसी बदबू आए, तो यह खराब होने का संकेत है. अच्छी साइलेज का पीएच मान 4.5 या उससे कम होता है. उन्होंने बताया कि दो से तीन महीने में साइलेज तैयार हो जाती है, जिसे पशुओं के लिए धीरे-धीरे निकालकर खिलाना चाहिए.
First Published :
January 06, 2026, 17:39 IST
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जानिए साइलेज तकनीक से पशुपालकों को सालभर पौष्टिक हरा चारा कैसे मिले



