राजस्थानी पुरुषों की शान है यह सोने का गहना, वीरता, रुतबा और पीढ़ियों की परंपरा का है जीवंत प्रतीक

Last Updated:November 24, 2025, 10:46 IST
राजस्थान पारंपरिक गहना: राजस्थान में पुरुषों द्वारा पहना जाने वाला सोने का झेला सिर्फ आभूषण नहीं बल्कि शान, परंपरा और वीरता का प्रतीक है. राजपूत, भील, गुर्जर सहित कई समुदायों में यह पीढ़ियों से पहचान का हिस्सा रहा है. झेला सोने या चांदी का खोखला छल्ला होता है, जिसे पुरुष कान में पहनते थे।. इसके रूप मूरकी, झुमका और गोखरू झूमके पुरुषों की बहादुरी और सामाजिक प्रतिष्ठा दर्शाते हैं. ग्रामीणों का मानना है कि झेला पहनना सम्मान, रुतबा और वंश परंपरा का प्रतीक है, जो आज भी गर्व से आगे बढ़ाई जा रही है.
राजस्थान की धरती सिर्फ रेगिस्तान, किले और लोकगीत के लिए नहीं, बल्कि अपनी अनोखी और शाही आभूषणों के लिए भी जानी जाती है. राजस्थान में आभूषण सिर्फ महिलाएं नहीं बल्कि पुरुषों के द्वारा भी पहने जाते हैं. यहां पुरुषों द्वारा पहने जाने वाले गहनों की परंपरा उतनी ही पुरानी है जितनी यहां की वीर गाथा है. इन्हीं में से एक है सोने का झेला, जो सदियों से राजस्थानी पुरुषों की पहचान और गौरव का हिस्सा रहा है.

सोने का झेला राजस्थान के पुरुषों द्वारा पहने जाने वाला एक पारंपरिक कान का आभूषण है जो न सिर्फ पहनने वाले शान बढ़ता है, बल्कि उसकी पहचान और परंपरा को भी बताता है. झेला पहनना केवल फैशन नहीं था यह सम्मान, रुतबा और मरदानी शान को दर्शाता है. कानों में झूलता सुनहरा झेला किसी भी पुरुष की वीरता, विरासत और सामाजिक प्रतिष्ठा को उजागर करता है.

झेला असल में सोने या चांदी से बना खोखला छल्ला होता है. जिसे पुरुष कान में पहनते थे. यह आकार में सरल भी हो सकता है और कलाकारी से भी भरा हुआ भी. राजपूत, भील, गुर्जर और कई अन्य समुदाय में झेला पहनने की अपनी-अपनी अलग-अलग परंपरा रही है. इसके कई रूप मिलते हैं, जिसमें मूरकी, झुमका और गोखरू झुमके शामिल हैं.
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पुरुषों का आभूषण सोने का झेला राजस्थान और मारवाड़ की पारंपरिक पहचान माना जाता है. सोने की पतली मगर मजबूत चेननुमा डिज़ाइन में बना यह झेला गले में पहनने वाला आभूषण होता है, जिसे खासकर शादियों, त्योहारों और सामाजिक आयोजनों में पुरुष धारण करते हैं. इसका डिज़ाइन सरल होते हुए भी राजस्थानी शान और प्रतिष्ठा का प्रतीक माना जाता है. गांवों में आज भी बुजुर्ग और युवा दोनों इसे गर्व से पहनते हैं.

मुरकी फूल के आकार का मीना काम वाला छोटा स्टड होता है, जबकि झुमका गोलाकार झुलता हुआ छल्ला है. गोखरू झूमके फैले हुए डिजाइन के साथ पुरुषों की वीरता और कठोर पहचान को बताते हैं. इनके अलावा बाला और सोने की चेन भी पुरुषों की आभूषण परंपरा का हमेशा अहम हिस्सा रहा है.

ग्रामीण कमलेश ने बताया कि सोने का झेला पहनना उनके वंश की परंपरा रही है. पहले उनके पूर्वजों के द्वारा पहना जाता था, फिर उनके पिताजी ने यह परंपरा को आगे बढ़ाया. अब हमलोग अपनी इस परंपरा को आगे बढ़ा रहे हैं. उनके अनुसार सोने का झेला धन दौलत और प्रतिष्ठा को बताता है. यह ढाई तोले से लेकर चार तोले के बीच का होता है. सोने का झेला परंपरा को पीढ़ी दर पीढ़ी आगे पहुंचाता है.
First Published :
November 24, 2025, 10:46 IST
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राजस्थानी पुरुषों की शान है यह गहना, वीरता और पीढ़ियों की परंपरा का है प्रतीक



