इस बार मानसून का ‘राहु काल’, बन रहा ऐसा दुर्योग, बूंद-बूंद पानी के लिए तरसना पड़ेगा, IMD का डराने वाला अलर्ट – el nino impact southest monsoon india may face severe heat water scarcity imd warn latest updates

El-Nino Monsoon Impact: इस साल मानसून के दौरान अल-नीनो (El-Nino) के उभरने की संभावना ने मौसम वैज्ञानिकों और जलवायु विशेषज्ञों की चिंता बढ़ा दी है. शुरुआती पूर्वानुमानों के अनुसार जुलाई-अगस्त-सितंबर के दौरान अल-नीनो की स्थिति बन सकती है, जिसका सीधा असर भारत के मानसून, तापमान और कृषि पर पड़ सकता है.अमेरिका की नेशनल ओशियनिक एंड एटमॉस्फेरिक एडमिनिस्ट्रेशन (NOAA) द्वारा 29 दिसंबर को जारी अल-नीनो सदर्न ऑस्सीलेशन (ENSO) बुलेटिन में कहा गया है कि मानसून के दूसरे हिस्से में अल नीनो बनने की 48 प्रतिशत संभावना है. वहीं, 45 प्रतिशत संभावना ENSO-न्यूट्रल स्थिति की जताई गई है, जबकि ला-नीना की संभावना 10 प्रतिशत से भी कम बताई गई है. मौसम विज्ञानियों के ताजा पूर्वानुमान पर भरोसा करें इस बार मानसून कमजोर रह सकता है. दूसरी तरफ, गर्मी के सीजन में तापमान भी ज्यादा रहने का अनुमान है. ऐसे में देश के विभिन्न हिस्सों में मानी की कमी हो सकती है. अकाल जैसी आशंकाओं को भी खारिज नहीं किया जा सकता है.
भारतीय मौसम विभाग (IMD) ने अपने पूर्वानुमान में कहा कि जून-जुलाई-अगस्त के दौरान अल-नीनो के उभरने की संभावना अधिक है. IMD के महानिदेशक एम. मोहोपात्रा ने कहा, ‘यह बताना अभी जल्दबाजी होगी कि अल-नीनो किस महीने में पूरी तरह विकसित होगा. ये बहुत शुरुआती अनुमान हैं और आने वाले महीनों में तस्वीर ज्यादा साफ होगी.’ हालांकि, इस संभावना ने इसलिए चिंता बढ़ा दी है, क्योंकि अल-नीनो वर्षों में भारत में अक्सर कमजोर मानसून और अत्यधिक गर्मी देखी जाती है. NOAA के मुताबिक, अगले एक-दो महीनों तक ला नीना की स्थिति बने रहने की संभावना है और जनवरी से मार्च के बीच ENSO-न्यूट्रल स्थिति में बदलाव की 68 प्रतिशत संभावना है. लेकिन मानसून के दौरान अल नीनो का उभरना खास तौर पर इसलिए चिंताजनक है क्योंकि भारतीय अर्थव्यवस्था के लिए मानसून जीवनरेखा की तरह है. देश की लगभग 51 प्रतिशत कृषि भूमि वर्षा पर निर्भर है, जो कुल कृषि उत्पादन का करीब 40 प्रतिशत योगदान देती है. इसके अलावा देश की 47 प्रतिशत आबादी की आजीविका सीधे तौर पर कृषि से जुड़ी है.
2023-24 में बुरा हाल
पिछले अल-नीनो अनुभव भी चेतावनी देते हैं. 2023-24 का अल नीनो वैश्विक स्तर पर रिकॉर्ड तोड़ गर्मी का कारण बना था. यूरोपीय संघ की कोपरनिकस क्लाइमेट चेंज सर्विस के अनुसार, जुलाई 2023 से जून 2024 के बीच वैश्विक औसत तापमान 1991-2020 के औसत से 0.76 डिग्री सेल्सियस और औद्योगिक युग से पहले (1850-1900) के स्तर से 1.64 डिग्री सेल्सियस अधिक रहा, जो अब तक का रिकॉर्ड है. 2023 में अल-नीनो जुलाई-अगस्त के दौरान तेजी से विकसित हुआ और सितंबर तक मध्यम स्तर पर पहुंच गया था. नवंबर 2023 से जनवरी 2024 के बीच यह अपने चरम पर था. यदि 2026 में फिर से अल-नीनो उभरता है, तो इससे तापमान के नए रिकॉर्ड बनने की आशंका है, क्योंकि यह मानव-जनित जलवायु परिवर्तन से हो रही वैश्विक गर्मी को और बढ़ा देता है. विश्व मौसम विज्ञान संगठन (WMO) ने भी चेतावनी दी है कि अल-नीनो और ला-नीना जैसे प्राकृतिक जलवायु घटनाक्रम अब मानव गतिविधियों से पैदा हो रहे जलवायु परिवर्तन के व्यापक संदर्भ में हो रहे हैं, जिससे चरम मौसम, तापमान और वर्षा के पैटर्न पर गहरा असर पड़ रहा है.
दक्षिण-पश्चिम मानसून क्या है?दक्षिण-पश्चिम मानसून वह मौसमी पवन प्रणाली है, जो जून से सितंबर के बीच अरब सागर और बंगाल की खाड़ी से नमी लेकर भारत में बारिश कराती है. यही मानसून देश की सालाना कुल वर्षा का करीब 70–75 फीसदी हिस्सा देता है और कृषि से लेकर जल संसाधनों तक की रीढ़ माना जाता है.
किसानों और खेती के लिए यह मानसून क्यों जरूरी है?भारत की करीब आधी कृषि भूमि आज भी मानसून की बारिश पर निर्भर है. धान, मक्का, कपास, सोयाबीन और दालों जैसी खरीफ फसलों की बुआई और पैदावार इसी बारिश से तय होती है. मानसून अच्छा रहा तो पैदावार बढ़ती है, किसानों की आय मजबूत होती है और ग्रामीण अर्थव्यवस्था को सहारा मिलता है.
पीने के पानी और जलाशयों पर मानसून का क्या असर पड़ता है?दक्षिण-पश्चिम मानसून नदियों, झीलों और जलाशयों को भरता है. बड़े बांधों और जलाशयों में जमा पानी से शहरों और गांवों को पीने का पानी मिलता है, सिंचाई होती है और बिजली उत्पादन भी संभव होता है. कमजोर मानसून का मतलब जल संकट और सूखे जैसी स्थिति हो सकती है.
अर्थव्यवस्था और महंगाई से मानसून का क्या संबंध है?अच्छी बारिश से फसलों की आपूर्ति बढ़ती है, जिससे खाद्य महंगाई काबू में रहती है. ग्रामीण इलाकों में मांग बढ़ती है, जिसका असर उद्योग और सेवाओं पर भी पड़ता है. वहीं खराब मानसून से उत्पादन घटता है, महंगाई बढ़ती है और आर्थिक विकास की रफ्तार पर असर पड़ता है.
जलवायु परिवर्तन के दौर में मानसून को लेकर चिंता क्यों बढ़ी है?जलवायु परिवर्तन के कारण मानसून का पैटर्न बदल रहा है. कहीं बहुत ज्यादा बारिश और बाढ़ तो कहीं लंबे सूखे की स्थिति बन रही है. अनियमित और चरम मौसमी घटनाएं खेती, जल प्रबंधन और शहरों की तैयारियों के लिए बड़ी चुनौती बनती जा रही हैं, इसलिए मानसून की सटीक भविष्यवाणी और बेहतर तैयारी पहले से ज्यादा अहम हो गई है.
क्या बोले वेदर एक्सपर्ट?
जलवायु वैज्ञानिक और IPCC से जुड़े रॉक्सी मैथ्यू कोल ने कहा, ‘ला-नीना की स्थिति में हमें अपेक्षाकृत लंबा मानसून देखने को मिला. लेकिन 2026 में यदि अल-नीनो जैसी स्थिति बनती है, तो मानसून की अवधि छोटी हो सकती है और 2025 की तुलना में साल ज्यादा गर्म रह सकता है.’ ‘हिंदुस्तान टाइम्स’ की एक रिपोर्ट के अनुसार, WMO ने अनुमान जताया है कि 2025 से 2029 के बीच किसी एक साल के 2024 से भी ज्यादा गर्म होने की 80 प्रतिशत आशंका है. कोपरनिकस क्लाइमेट चेंज सर्विस के मुताबिक 2025 फिलहाल 2023 के साथ मिलकर रिकॉर्ड का दूसरा सबसे गर्म साल है. भारत में भी 2025 अपेक्षाकृत हल्की गर्मी और अच्छे मानसून के बावजूद आठवां सबसे गर्म साल दर्ज किया गया.
घबराने की जरूरत नहीं…
स्काईमेट वेदर के उपाध्यक्ष (जलवायु एवं मौसम विज्ञान) महेश पलावत ने कहा, ‘फिलहाल संकेत हैं कि मानसून की शुरुआत के आसपास अल-नीनो विकसित हो सकता है. इससे वर्षा प्रभावित हो सकती है और मानसून सामान्य से कम रह सकता है. हालांकि, स्प्रिंग बैरियर के कारण पूर्वानुमान बदल भी सकते हैं, इसलिए इसे सावधानी से देखने की जरूरत है.’ पूर्व पृथ्वी विज्ञान सचिव एम. राजीवन ने भी कहा कि यदि अल-नीनो विकसित होता है तो मानसून पर असर पड़ सकता है, लेकिन अभी घबराने की जरूरत नहीं है. आने वाले महीनों में नए आंकड़ों और मॉडलों से स्थिति और स्पष्ट होगी.



