हजारों साल पुरानी अरावली खतरे में! जानिए पहले कैसी थी और अब क्या हो जाएगा हाल?

जयपुर. अरावली पर्वतमाला को लेकर इन दिनों देश में एक बार फिर बहस तेज हो गई है. यह बहस केवल खनन या कानूनी परिभाषा तक सीमित नहीं है, बल्कि उस प्राकृतिक ढाल से जुड़ी है जिसने हजारों वर्षों तक उत्तर भारत के पर्यावरण, जल और सभ्यता की रक्षा की. नए नियमों और सुप्रीम कोर्ट के नवंबर 2025 के फैसले के बाद यह सवाल और गहरा हो गया है कि अरावली पहले कैसी थी, किसे अरावली माना जाता था और आज उसकी वास्तविक स्थिति क्या है.
अरावली पर्वतमाला को दुनिया की सबसे प्राचीन पर्वत श्रृंखलाओं में से एक माना जाता है. इसकी आयु लगभग 2 से 2.5 अरब वर्ष आंकी जाती है. यह गुजरात के पालनपुर से शुरू होकर राजस्थान के सिरोही, उदयपुर, राजसमंद, भीलवाड़ा, अजमेर, टोंक, जयपुर और अलवर होते हुए हरियाणा और दिल्ली तक करीब 700 से 800 किलोमीटर तक फैली हुई है. अकेले राजस्थान में इसका लगभग 550 किलोमीटर हिस्सा मौजूद है. माउंट आबू स्थित गुरु शिखर, जिसकी ऊंचाई लगभग 1722 मीटर है, अरावली की सबसे ऊंची चोटी मानी जाती है.
कैसी थी पहले अरावलीइतिहास और भूगोल बताते हैं कि अरावली कभी घने जंगलों, समृद्ध वनस्पतियों और विविध वन्यजीवों से भरपूर थी. तेंदुआ, भालू, लकड़बग्घा, सांभर, नीलगाय और सैकड़ों पक्षी प्रजातियां यहां पाई जाती थीं. विशेषज्ञों के अनुसार अरावली क्षेत्र में 45 से 50 स्तनधारी, 300 से अधिक पक्षी और 60 से 70 सरीसृप व उभयचर प्रजातियां मौजूद थीं. इसी कारण इसे दिल्ली एनसीआर का ग्रीन लंग कहा जाता रहा. अरावली थार मरुस्थल को पूर्व की ओर बढ़ने से रोकने वाली प्राकृतिक दीवार थी. इसकी चट्टानें वर्षा जल को जमीन में समाहित कर भूजल को रिचार्ज करती थीं. बनास, लूनी, साबरमती, साहिबी, रूपारेल और खारी जैसी नदियां इसी पर्वतमाला से निकलती हैं. अरावली क्षेत्र में वर्षा जल के जमीन में समाने की क्षमता आसपास के मैदानी इलाकों से तीन से चार गुना अधिक मानी जाती है, जिससे यह उत्तर भारत की जल सुरक्षा और जलवायु संतुलन के लिए बेहद अहम रहा.
अब क्या है अरावली की वर्तमान स्थितिपिछले कुछ दशकों में अरावली को अवैध और वैध खनन, अतिक्रमण, रियल एस्टेट विस्तार और सड़क निर्माण से भारी नुकसान पहुंचा है. पर्यावरण विशेषज्ञों के अनुसार लगभग 30 से 40 प्रतिशत अरावली क्षेत्र पहले ही गंभीर रूप से क्षतिग्रस्त हो चुका है. केंद्रीय सशक्त समिति की रिपोर्ट बताती है कि अकेले अलवर जिले में 1967-68 से अब तक 31 पहाड़ियां पूरी तरह समाप्त हो चुकी हैं. कई स्थानों पर पहाड़ियों को समतल कर दिया गया, जिससे जल स्रोत सूख गए, तापमान बढ़ा और प्रदूषण का स्तर भी ऊपर गया. Forest Survey of India के 2025 के आंतरिक मूल्यांकन के अनुसार राजस्थान के 15 जिलों में 12,081 पहाड़ियां 20 मीटर या उससे अधिक ऊंचाई की दर्ज की गईं, जिनमें से केवल 1,048 पहाड़ियां ही 100 मीटर या उससे अधिक ऊंची हैं. यानी लगभग 91 प्रतिशत पहाड़ियां 100 मीटर से कम ऊंचाई की हैं.
क्या है अरावली को लेकर नया नियम और विवाद20 नवंबर 2025 को सुप्रीम कोर्ट ने अरावली को लेकर एक समान परिभाषा को मंजूरी दी. इसके तहत स्थानीय स्तर से 100 मीटर या उससे अधिक ऊंची पहाड़ियों को ही अरावली हिल माना जाएगा. यदि 500 मीटर के दायरे में दो ऐसी पहाड़ियां हों, तो उनके बीच का क्षेत्र भी अरावली रेंज में आएगा. सरकार का दावा है कि इससे अस्पष्टता खत्म होगी और 90 प्रतिशत से अधिक क्षेत्र संरक्षित रहेगा. नई माइनिंग लीज पर तब तक रोक रहेगी जब तक सस्टेनेबल माइनिंग मैनेजमेंट प्लान तैयार नहीं हो जाता. हालांकि पर्यावरणविदों और सेव अरावली अभियान से जुड़े विशेषज्ञों का कहना है कि इस परिभाषा से 100 मीटर से कम ऊंचाई वाली लगभग 1.18 लाख पहाड़ियां संरक्षण से बाहर हो सकती हैं. गुरुग्राम स्थित वन विश्लेषक चेतन अग्रवाल के अनुसार 1,18,000 पहाड़ियों को बाहर कर केवल 1,048 पहाड़ियों को अरावली मानना वैज्ञानिक दृष्टि से गंभीर सवाल खड़े करता है.
असली चिंता क्या हैवन विश्लेषक चेतन अग्रवाल का कहना है कि नए फ्रेमवर्क में भारतीय वन सर्वेक्षण के आधिकारिक आंकड़ों को नजरअंदाज किया गया है, जबकि वही सबसे मजबूत वैज्ञानिक आधार हो सकते थे. उनके अनुसार Forest Survey of India के आंकड़े बताते हैं कि देश में 20 मीटर से कम ऊंचाई वाली लगभग 1,07,000 पहाड़ियां हैं, जबकि 20 से 100 मीटर के बीच ऊंचाई वाली पहाड़ियों की संख्या करीब 11,000 है. इस तरह 100 मीटर से कम ऊंचाई वाली पहाड़ियों की कुल संख्या लगभग 1,18,000 बैठती है. इसके विपरीत 100 मीटर या उससे अधिक ऊंचाई वाली पहाड़ियों की संख्या केवल 1,048 है.
गहलोत सरकार के दौर की पुरानी बहसअशोक गहलोत के पहले कार्यकाल के दौरान वर्ष 2003 में गठित एक विशेषज्ञ समिति ने सुझाव दिया था कि आजीविका, विकास और रोजगार की जरूरतों को देखते हुए केवल 100 मीटर या उससे अधिक ऊंची पहाड़ियों को ही अरावली हिल माना जाए. इस सुझाव को तत्कालीन राज्य सरकार ने केंद्र और सुप्रीम कोर्ट के समक्ष शपथपत्र के रूप में प्रस्तुत किया था. हालांकि सुप्रीम कोर्ट ने 19 फरवरी 2010 को इस परिभाषा को स्वीकार नहीं किया. अदालत ने साफ कहा था कि केवल ऊंचाई के आधार पर अरावली को सीमित नहीं किया जा सकता, क्योंकि इससे पारिस्थितिकी और पर्यावरण संरक्षण कमजोर होगा. इसके बाद यह प्रस्ताव कानूनी रूप से खारिज माना गया.
कांग्रेस का ने लगाए गंभीर आरोपकांग्रेस का आरोप है कि जिसे सुप्रीम कोर्ट ने 14 साल पहले खारिज कर दिया था, उसी 100 मीटर की परिभाषा को नवंबर 2025 में केंद्र सरकार की समिति की सिफारिश के जरिए दोबारा वैध ठहराने की कोशिश की गई. पूर्व मुख्यमंत्री अशोक गहलोत ने सवाल उठाया है कि अगर यह परिभाषा पहले गलत और पर्यावरण के लिए खतरनाक मानी गई थी, तो अब उसे सही कैसे माना जा सकता है.



