किडनी की बीमारियों का इलाज होगा आसान, डैमेज की हो जाएगी रिकवरी!

एक्यूट किडनी इंजरी (AKI) वह स्थिति है जिसमें किडनियां अचानक ठीक से काम करना बंद कर देती हैं. यह किडनी की हल्की खराबी से लेकर पूरी तरह फेल होने तक हो सकती है. यह नाम से भले लगे कि किडनी पर किसी चोट की वजह से होती है, लेकिन वास्तविकता में इसका कारण शारीरिक चोट नहीं होता.
दिल्ली के पीएसआरआई अस्पताल सीनियर कंसल्टेंट और नेफ्रोलॉजी डिपार्टमेंट के हेड डॉ. संजीव सक्सेना ने बताया की ज्यादातर लोगों में एकेआई ठीक हो जाता है, लेकिन कुछ ही लोगों में ट्रांस्पलांट या डायलिसिस की जरूरत पड़ती है. एकेआई की समस्या अगर एक बार आ जाती है, तो भविष्य में क्रोनिक किडनी डिजीज होने का खतरा बना रहता है.
वैज्ञानिकों ने देखा कि जिन चूहों को पहले से दवा दी गई, उनकी किडनी अच्छे से काम करती रही. करीब से जांच करने पर पता चला कि सेरामाइड किडनी की सेल्ज में माइटोकॉन्ड्रिया को नुकसान पहुंचाते हैं. इससे माइटोकॉन्ड्रिया ठीक से काम नहीं कर पाते हैं और इंजरी का संभावना बढ़ जाती है. लेकिन जब सेरामाइड का स्तर कम किया गया, तो माइटोकॉन्ड्रिया ठीक और स्वस्थ रहे. एकेआई को लेकर चिंता इसलिए भी अधिक है क्योंकि इससे आगे चलकर क्रॉनिक किडनी डिज़ीज का खतरा बढ़ जाता है जिसके इलाज के विकल्प बहुत कम होते हैं.
हालाँकि यह रिसर्च भविष्य में किडनी इंजरी को पूरी तरह ठीक करने की संभावना दिखाता है, लेकिन विशेषज्ञों का कहना है कि चूहों पर किए गए परीक्षणों के परिणाम हमेशा मनुष्यों पर लागू हों, यह जरूरी नहीं है. अमेरिका की कंपनी सेंटॉरस थेरेप्यूटिक्स की ओर से बनाई जा रही ये दवा अभी प्रीक्लिनिकल स्टेज में है. इसमें अभी इंसानों पर ट्रायल होना बाकी है.
इंसानों पर इस दवा के असर के बारे में वैज्ञानिक अभी कह नहीं रहे हैं. डॉ. समर्स का कहना है कि भले ही इंसानों में सेरामाइड को कम करना कारगर साबित हो, लेकिन लंबे समय तक दवा का मेटाबॉलिज़्म और साइड इफेक्ट्स की सावधानी से जांच की जरूरत है. साथ ही ये देखना भी बाकी है कि यदि किडनी को पहले से नुकसान हो चुका हो, तो यह दवा कितना असर करेगी. स्टडी के दौरान यह दवा चूहों को चोट लगने से पहले दी गई थी.
क्लीनिकल ट्रायल स्टेज पर है दवा
किसी भी दवा की क्लीनिकल ट्रायल बेहद जरूरी माना जाता है. इससे इंसानों पर होने वाले खतरों के बारे में पहले से पता लगाया जाता है. वहीं ये देखा जाता है कि लंबे समय तक इनका इस्तेमाल करने से किस तरह के बदलाव होते हैं.
डॉ. संजीव सक्सेना के अनुसार, ” किसी भी मामले में क्लीनिकल ट्रायल होने बेहद अहम होता है. इसे से पता चलता है कि भविष्य में किसी दवा का क्या असर होता है. इंसान के शरीर में कुछ भी गैर-जरूरी नहीं होता है. इस मामले में सिरामाइड को ब्लॉक किया जाता है तो देखना होगा की इसका भविष्य में शरीर में क्या असर होगा.
सेरामाइड एक प्रकार के लिपिड हैं जो त्वचा की बाहरी परत का लगभग 40 से 50 प्रतिशत हिस्सा बनाते हैं. ये एक प्रकार के गोंद की तरह काम करते हैं. ये स्किन के सेल्ज को आपस में जोड़कर एक सुरक्षा कवच बनाते हैं. इससे नमी बाहर नहीं निकलती और बाहरी खतरों से सुरक्षा मिलती है.
कब तक मिल पाएगी ये दवा?
सामान्य दवाओं के लिए दस से पंद्रह वर्ष तथा विशेष गंभीर बीमारियों की दवाओं के लिए पांच से आठ साल का समय लगता है. इसमें से क्लिनिकल ट्रायल के तीन मुख्य स्टेज में लगभग छह से आठ साल लगते हैं. इन ट्रायल्स के पूरा होने के बाद दवा कंपनी नियामक संस्था जैसे भारत में सीडीएससीओ या अमेरिका में एफडीए को आवेदन देती है, जिसकी समीक्षा में छह से बारह महीने लगते हैं.
हालांकि गंभीर या जानलेवा बीमारियों जैसे कैंसर, एचआईवी या दुर्लभ रोगों की दवाओं के लिए फास्ट-ट्रैक, ब्रेकथ्रू थेरेपी या प्राथमिकता समीक्षा जैसी विशेष सुविधाएं दी जाती हैं. इनकी वजह से यह समय घटकर पांच से आठ वर्ष तक रह जाता है.



