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वॉरियर ऑफ इंडिया: दुश्मन की गोलियों के बीच अकेले लड़े मेजर पीरू सिंह, बहादुरी से जीत ली पहाड़ी पोस्ट; पढ़िए परमवीर चक्र विजेता की कहानी

वॉरियर ऑफ इंडिया: राजस्थान की धरती ने देश की सेना को अनगिनत ऐसे जाबाज योद्धा दिए हैं, जिन्होंने अपनी जान देकर देश की रक्षा की है. हम ऐसे ही जाबाज योद्धाओं की कहानी आपके लिए लेकर आए हैं. लोकल 18 ने देश के जांबाज योद्धा एक सीरीज शुरू की है, जिसमें रोजाना देश की सेना के योद्धाओं की कहानी बताई जाएगी. इस सीरीज शुरुआत हम शहीद मेजर पीरू सिंह शेखावत की कहानी से कर रहे हैं. जिन्हें वीरता, अदम्य साहस और दुश्मन की पूरी पोस्ट को ध्वस्त कर देने के लिए मरणोपरांत भारतीय सेना का सर्वोच्च सम्मान परमवीर चक्र से दिया जा चुका है.

शहीद मेजर पीरू सिंह शेखावत सिर्फ एक सैनिक का नाम नहीं, बल्कि साहस, जुनून और मातृभूमि के लिए अंतिम सांस तक लड़ जाने की अदम्य शौर्य-गाथा है. उनकी कहानी ऐसी है, जिसे सुनकर हर भारतीय का सीना गर्व से चौड़ा हो जाए. रणभूमि में अकेले दुश्मन की पूरी पोस्ट को ध्वस्त कर देने का उनका पराक्रम आज भी दुनिया की सबसे बड़ी सैन्य वीरताओं में गिना जाता है.

बचपन से ही रगों में दौड़ता था रणबांकुरों का खून

20 मई 1918 में झुंझुनूं के रामपुरा बेरी गांव में किसान लाल सिंह के घर एक बालक जन्मा पीरू. चार बहनों और तीन भाइयों में सबसे छोटे पर हिम्मत में सबसे बड़े. स्कूल की पढ़ाई में मन नहीं लगता था, लेकिन सेना में जाने का जुनून कम उम्र से ही सिर चढ़कर बोलता था. एक दिन स्कूल में डांट पड़ी तो पीरू ने पढ़ाई छोड़ खेतों में काम पकड़ा, लेकिन दिल में तो बस एक ही सपना था देश की वर्दी पहनना. कई बार भर्ती होने पहुंचे, पर उम्र कम निकली, फिर भी हिम्मत न टूटी.

आखिरकार 18 साल के होते ही 20 मई 1936 को पंजाब रेजिमेंट में भर्ती हो गए. यहां उन्होंने ट्रेनिंग पूरी की और पढ़ाई भी की और पदोन्नति पाई. इसके बाद वे 1945 में कंपनी हवलदार मेजर बन चुके थे. द्वितीय विश्वयुद्ध के बाद ब्रिटिश कॉमनवेल्थ ऑक्यूपेशन फोर्स के साथ उन्हें जापान भेजा गया. यह वही दौर था जब उनकी बहादुरी सेना में चर्चा का विषय बन चुकी थी.

जहां इतिहास ने शौर्य की परिभाषा बदल दी

देश की आज़ादी के बाद भारत-पाक युद्ध की आग भड़क चुकी थी. पाकिस्तानी सेना और कबाइलियों ने जम्मू-कश्मीर के तिथवाल सेक्टर पर कब्जा कर लिया था. यह मोर्चा फिर से लेना बेहद जरूरी था. जुलाई 1948 में 6 राजपूताना राइफल्स की डी कंपनी जिसमें पीरू सिंह सेक्शन कमांडर थे, को यह मिशन सौंपा गया. इसके बाद पीरू सिंह अपनी बटालियन लेकर दुश्मनों से लोहा लेने के लिए निकल पड़े. 11 जुलाई को हमला शुरू हुआ. दुश्मन ऊंचाई पर था, रास्ता सिर्फ एक मीटर चौड़ी और नीचे बिल्कुल खाई थी. ऊपर से मशीन गनें बरस रही थीं, ग्रेनेड फट रहे थे और भारतीय सैनिकों पर मौत की बारिश हो रही थी. सिर्फ आधे घंटे में 51 भारतीय सैनिक शहीद या घायल हो चुके थे. लेकिन पीरू सिंह सिर्फ सैनिक नहीं थे, जंग का तूफ़ान थे.

राजा रामचंद्र की जय की गर्जना से कांप उठा दुश्मन

दुश्मन की मीडियम मशीन गन भारतीय सैनिकों को एक-एक करके निशाना बना रही थी. यही वह पोस्ट थी जिसने सबसे ज्यादा नुकसान किया. पीरू सिंह आगे बढ़े ग्रेनेड उनके आस-पास फटे, छर्रे शरीर में धंस गए, खून रिसता रहा, लेकिन कदम नहीं रुके. पहली पाकिस्तानी पोस्ट पर पहुंचकर उन्होंने अपनी स्टेन गन और खंजर से ऐसा हमला बोला कि कुछ ही मिनटों में पूरी पोस्ट उनके दम पर चुप हो गई. जैसे ही मुड़े तो साथी कहीं नजर नहीं आए. सब या तो शहीद हो चुके थे, या घायल पड़े थे. अब पीरू सिंह पूरे मोर्चे पर अकेले थे और सामने थी वह भयावह मशीन गन वाली पोस्ट जिसे बिना जीते भारतीय सेना आगे नहीं बढ़ सकती थी.

अकेले ही दुश्मन की पूरी पोस्ट को ध्वस्त करने निकल पड़े

चेहरे के पास एक और ग्रेनेड फटा आंखों से खून बहने लगा. स्टेन गन की गोलियां खत्म हो गईं. फिर भी वह गड्ढे में कूदे, ग्रेनेड निकाला और आवाज दी जय रामजी की! धुंधली दृष्टि में भी उन्होंने निशाना लगाया और पाकिस्तानी पोस्ट पर ग्रेनेड फेंक दिया. इस दौरान दो पाकिस्तानी सैनिकों को उन्होंने खंजर से मार गिराया. गड्ढे से निकल ही रहे थे कि दुश्मन की एक और गोली उनको लग गई. उधर से गोली चली, इधर से उनका अंतिम ग्रेनेड दुश्मन की मशीन गन पर गिरा. विस्फोट हुआ और पूरी पोस्ट उड़ गई.

पीरू सिंह गिर चुके थे पर भारत जीत चुका था

उनकी शहादत ने तिथवाल की लड़ाई का पलड़ा पलट दिया और भारतीय सैनिक आगे बढ़े. अद्वितीय बहादुरी, अदम्य साहस और मातृभूमि के लिए आखिरी सांस तक लड़ने की मिसाल के लिए 17 नवंबर 1948 को हवलदार मेजर पीरू सिंह शेखावत को मरणोपरांत परमवीर चक्र देश का सर्वोच्च वीरता सम्मान दिया गया. उनकी मां जड़ाव कंवर ने यह सम्मान प्राप्त किया और यह पल झुंझुनूं ही नहीं बल्कि पूरे राजस्थान की वीर गाथाओं में एक नया अध्याय बन गया. आज भी शहीद मेजर पीरू सिंह शेखावत की यह कहानी झुंझुनू जिले में दादी और दादी अपने छोटे पीते-पोतियों को सुनाती हैं. बच्चे उनकी कहानी सुनकर बड़े होते हैं और देश की सेना में शामिल होते हैं.

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