वीरता, सामाजिक पहचान और ऐतिहासिक गौरव का प्रतीक है यह पगड़ी, राजस्थान में है इसका खास महत्व

Last Updated:December 11, 2025, 08:00 IST
राजस्थान पारंपरिक पगड़ी: राजस्थान में पगड़ी का आभूषण सरपेच पारंपरिक और राजसी गरिमा का प्रतीक माना जाता है. यह केवल सौंदर्य बढ़ाने वाला नहीं बल्कि सामाजिक और ऐतिहासिक पहचान दर्शाने वाला आभूषण है.सोने, चांदी और रंगीन रत्नों से सजा सरपेच राजपूत समाज में वीरता, सम्मान और वंशगत गौरव का प्रतीक रहा है. आज भी यह पारंपरिक और सांस्कृतिक आयोजनों, विवाह और फोटोग्राफी में राजसी शान जोड़ता है.
राजस्थान की परंपराओं में पगड़ी केवल एक वस्त्र नहीं, बल्कि मान-सम्मान, स्वाभिमान और पहचान का प्रतीक मानी जाती है. इसी पगड़ी को और अधिक भव्य, गरिमामय एवं राजसी रूप प्रदान करता है सरपेच. सरपेच सदियों से राजपूताना संस्कृति में शौर्य, सत्ता और समृद्धि का प्रतीक रहा है. यह आभूषण न केवल सौंदर्य बढ़ाता है, बल्कि पहनने वाले की सामाजिक और ऐतिहासिक पहचान भी दर्शाता है. सरपेच एक पारंपरिक पगड़ी आभूषण है, जिसे पगड़ी के सामने या एक ओर लगाया जाता है. इसका स्वरूप ब्रोच जैसा होता है, जिसमें कलगी, मोती या नग जड़े होते हैं. यह आभूषण पगड़ी को संतुलित ढंग से सजाता है और पूरे व्यक्तित्व में राजसी प्रभाव जोड़ देता है.

ऐसा माना जाता है कि सरपेच की उत्पत्ति मुगलकालीन कलगी और राजपूत सरपटी के मिश्रण से हुई है. पुराने समय में सरपेच पहनने का अधिकार सामान्य व्यक्ति को नहीं था. इसे केवल राजा-महाराजा, राजकुमार, सामंत और उच्च पदस्थ योद्धा ही धारण कर सकते थे. दरबार, युद्ध, विजय उत्सव और राजकीय आयोजनों में सरपेच शक्ति, प्रतिष्ठा और साहस का प्रतीक माना जाता था. लेकिन फिर यह धीरे-धीरे आम जनता में लोकप्रिय होने लगा और पुरुष सरपेच को अपने सर का ताज समझने लगे.

राजपूत समाज में सरपेच मात्र आभूषण नहीं, बल्कि वीरता, आत्मसम्मान और वंशगत गौरव का प्रतीक रहा है. इसे पहनना यह दर्शाता था कि व्यक्ति निडर है, अपने कुल और परंपराओं पर गर्व करता है. यही कारण है कि कई राजपूत चित्रों और ऐतिहासिक चित्रणों में सरपेच सजे राजकुमार आज भी देखने को मिलते हैं.
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स्थानीय कारीगरों ने बताया कि सरपेच सोने या चांदी से बनाया जाता है. इसमें कुंदन कार्य, माणिक, पन्ना, मोती, हीरे तथा रंगीन नगों का सुंदर प्रयोग किया जाता है. कुछ सरपेचों में ऊपर की ओर उभरी हुई कलगी या लटकते हुए मोतियों की झालर होती है, जो इसकी भव्यता को कई गुना बढ़ा देती है. यह आभूषण राजस्थानी स्वर्णकारों की अद्भुत कारीगरी का उत्कृष्ट उदाहरण है.

सांस्कृतिक दृष्टि से सरपेच राजसी गरिमा, समृद्धि और सम्मान का प्रतीक है. यह न केवल सामाजिक हैसियत को दर्शाता है, बल्कि परंपरा और इतिहास से चले आ रहे आभूषणों का महत्व भी समझता है. सरपेच का सबसे ज्यादा उपयोग विवाह में दूल्हे के द्वारा किया जाता है. विवाह जैसे शुभ अवसरों पर सरपेच पहनना सौभाग्य और प्रतिष्ठा का सूचक माना जाता है.

आज के समय में सरपेच पारंपरिक राजपूत और राजस्थानी विवाहों, सांस्कृतिक समारोहों, लोकनृत्य प्रस्तुतियों और थीम फोटोग्राफी में विशेष रूप से देखा जाता है. आधुनिक डिजाइनरों ने भी पारंपरिक सरपेच को नए रूप में प्रस्तुत कर फैशन जगत में पुनः लोकप्रिय बना दिया है. एक बार फिर इसकी सुंदरता ने इसकी मांग को बढ़ा दिया है. समय बदला है, पर सरपेच की शान, गरिमा और ऐतिहासिक महत्व आज भी उतना ही अमर और प्रेरणादायक बना हुआ है.
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December 11, 2025, 08:00 IST
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शौर्य, गौरव और सम्मान का प्रतीक है यह पगड़ी, राजसी परंपरा का रहा है हिस्सा



