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Who is Tapas Roy | Tapas Roy Joins BJP- कौन हैं तपस रॉय जिन्हें BJP ने बनाया ‘ब्रह्मास्त्र’, क्या करेंगे काम, कैसे 2026 में पलटेगी पूरी बाजी?

नई दिल्ली: पश्चिम बंगाल की राजनीति में 2026 विधानसभा चुनाव से पहले हलचल तेज हो चुकी है. चुनाव से महज तीन महीने पहले भारतीय जनता पार्टी (BJP) ने बड़ा दांव खेला है. BJP ने जैसे ही अपनी नई राज्य समिति का ऐलान किया, एक नाम सबसे ज्यादा चर्चा में आ गया- तपस रॉय. तृणमूल कांग्रेस (TMC) से भाजपा में आए इस अनुभवी नेता को उपाध्यक्ष बनाकर पार्टी ने साफ संकेत दे दिया है कि वह अब केवल विपक्ष की भूमिका में नहीं रहना चाहती. BJP अब सत्ता की सीधी लड़ाई के लिए पूरी ताकत झोंकने जा रही है.

तपस रॉय को भाजपा का ‘ब्रह्मास्त्र’ कहे जाने के पीछे सिर्फ उनका पार्टी बदलना नहीं, बल्कि उनका राजनीतिक अनुभव, शहरी कोलकाता में पकड़ और टीएमसी के भीतर की कार्यशैली की गहरी समझ है. सवाल यह है कि भाजपा ने रॉय पर इतना भरोसा क्यों जताया और क्या वाकई उनकी भूमिका 2026 में बंगाल की पूरी बाजी पलट सकती है, वह संगठन में क्या काम करेंगे?

फाइल फोटो- PTI

कौन हैं तपस रॉय और क्यों अहम हैं?

तपस रॉय पश्चिम बंगाल की राजनीति का जाना-पहचाना नाम हैं. वे पांच बार विधायक रह चुके हैं. एक बार कांग्रेस से और चार बार तृणमूल कांग्रेस से. बारानगर सीट से लगातार जीत दर्ज कर चुके रॉय टीएमसी सरकार में राज्य मंत्री (योजना एवं सांख्यिकी) भी रहे हैं. इसके अलावा वे पार्टी के उप मुख्य सचेतक और दमदम-बैरकपुर जिला अध्यक्ष जैसे प्रभावशाली पदों पर रहे. इससे संगठन और सरकार दोनों का अनुभव उन्हें मिला.

TMC से BJP तक का सफर क्यों मायने रखता है?

2024 में प्रवर्तन निदेशालय (ED) की छापेमारी के बाद तपस रॉय ने तृणमूल कांग्रेस से इस्तीफा दे दिया. उनका आरोप था कि मुश्किल वक्त में पार्टी नेतृत्व ने उनका साथ नहीं दिया. इसके बाद भाजपा में शामिल होकर उन्होंने टीएमसी पर भ्रष्टाचार और अराजकता के आरोप लगाए. यह बदलाव भाजपा के लिए सिर्फ एक नेता की एंट्री नहीं, बल्कि टीएमसी के अंदरूनी ढांचे की जानकारी हासिल करने जैसा है.

BJP ने उन्हें ‘ब्रह्मास्त्र’ की तरह क्यों पेश किया?

भाजपा की नई 35 सदस्यीय राज्य समिति में तपस रॉय को उपाध्यक्ष बनाना रणनीतिक फैसला माना जा रहा है. पार्टी शहरी कोलकाता, उत्तर कोलकाता और अर्ध-शहरी इलाकों में अपनी कमजोरी मानती रही है. रॉय इन्हीं इलाकों में प्रभाव रखते हैं. भाजपा उन्हें ऐसे चेहरे के रूप में देख रही है जो टीएमसी के पारंपरिक वोट बैंक में सेंध लगा सके.

भाजपा में तपस रॉय का असली काम क्या होगा?

राजनीतिक विश्लेषकों के मुताबिक उपाध्यक्ष का पद सम्मानजनक है, लेकिन इसका मतलब केवल पद नहीं है. रॉय से उम्मीद की जा रही है कि वे उत्तर कोलकाता और शहरी इलाकों में बूथ स्तर पर संगठन मजबूत करें. टीएमसी से नाराज नेताओं और कार्यकर्ताओं को भाजपा से जोड़ें. शहरी मतदाताओं और अल्पसंख्यक वर्ग के बीच संवाद बढ़ाएं और स्थानीय मुद्दों पर भाजपा की पकड़ मजबूत करें

2026 विधानसभा चुनाव में उनकी भूमिका कितनी निर्णायक होगी?

भाजपा 2021 विधानसभा चुनाव में 77 सीटें जीतकर मजबूत विपक्ष बनी थी. 2024 लोकसभा चुनाव में भी पार्टी का प्रदर्शन अच्छा रहा. अब लक्ष्य स्पष्ट है वोट शेयर को 40% से ऊपर ले जाना. तपस रॉय जैसे नेता भाजपा को कोलकाता जैसे कठिन क्षेत्र में बढ़त दिला सकते हैं, जहां टीएमसी का दबदबा अब तक कायम रहा है.

क्या यह TMC के लिए बड़ा झटका है?

तपस रॉय का टीएमसी छोड़ना पहले ही पार्टी के लिए नुकसान माना गया था. अब भाजपा में सक्रिय भूमिका मिलने से यह झटका और गहरा हो सकता है. उत्तर कोलकाता में उनकी पकड़ और संगठनात्मक अनुभव टीएमसी के शहरी वोट बैंक को प्रभावित कर सकता है. हालांकि टीएमसी की मजबूत संगठनात्मक मशीनरी अभी भी भाजपा के लिए बड़ी चुनौती बनी हुई है.

भाजपा के भीतर संतुलन कैसे साधेगा यह फैसला?

नई राज्य समिति में पुराने आरएसएस पृष्ठभूमि वाले नेताओं और टीएमसी से आए नेताओं का मिश्रण दिखता है. दिलीप घोष जैसे पुराने चेहरे बाहर हैं, जबकि सौमित्र खान, लॉकेट चटर्जी जैसे सांसद शामिल हैं. तपस रॉय की एंट्री से यह साफ है कि भाजपा अब हार्डकोर कैडर और मास अपील दोनों को साथ लेकर चलना चाहती है.

तपस रॉय के सामने सबसे बड़ी चुनौती क्या है?

भाजपा में आने के बाद रॉय को ‘वॉशिंग मशीन’ जैसे आरोपों का सामना करना पड़ा. 2024 लोकसभा चुनाव में हार के बाद अब संगठनात्मक जिम्मेदारी में खुद को साबित करना उनके लिए जरूरी होगा. अगर वे शहरी मतदाताओं में भाजपा की छवि सुधारने में सफल होते हैं, तो उनकी राजनीतिक साख और मजबूत होगी.

क्या सच में 2026 में ‘पूरी बाजी पलट’ सकती है?

राजनीतिक जानकार मानते हैं कि केवल एक नेता से सत्ता परिवर्तन नहीं होता, लेकिन तपस रॉय जैसे चेहरे भाजपा की रणनीति को धार जरूर दे सकते हैं. अगर पार्टी आंतरिक गुटबाजी से पार पाकर जमीनी स्तर पर काम करती है, तो 2026 का मुकाबला बेहद रोचक हो सकता है.

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