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अंतरिक्ष में नासा ने भेजी नई ‘आंख’, हजारों एलियन ग्रह खोजेगा रोमन, डार्क मैटर का भी खोलेगा राज

हमारा अंतरिक्ष अंतहीन रहस्यों से भरा पड़ा है, जिनका जवाब वैज्ञानिक दशकों से खोज रहे हैं. अब उन्हीं रहस्यों से पर्दा उठाने के लिए नासा (NASA) ने अपनी नई अंतरिक्ष वेधशाला को रवाना कर दिया है. नैंसी ग्रेस रोमन स्पेस टेलिस्कोप (Nancy Grace Roman Space Telescope) रविवार को फ्लोरिडा के कैनेडी स्पेस सेंटर से स्पेसएक्स के फाल्कन हेवी रॉकेट के जरिये अंतरिक्ष के सफर पर रवाना हुआ. करीब 4.3 अरब डॉलर की लागत से तैयार यह बस के आकार का टेलीस्कोप अब धरती से लगभग 16 लाख किलोमीटर दूर लैग्रेंज प्वाइंट-2 (L2) की ओर बढ़ रहा है. यही वह इलाका है, जहां पहले से जेम्स वेब स्पेस टेलिस्कोप भी ब्रह्मांड की गहराइयों में झांक रहा है. हालांकि रोमन का काम वेब जैसा नहीं होगा. यह ब्रह्मांड को बेहद व्यापक नजरिये से देखेगा और वैज्ञानिकों को अंतरिक्ष की ऐसी तस्वीर देगा, जिसे तैयार करना मौजूदा टेलीस्कोपों के लिए बेहद मुश्किल है.

3 महीने से ज्यादा का सफर, फिर शुरू होगा असली मिशन

लॉन्च के बाद रोमन टेलिस्कोप को अपने निर्धारित स्थान एल2 तक पहुंचने में तीन महीने से ज्यादा समय लग सकता है. वहां पहुंचने के बाद इसकी असली परीक्षा शुरू होगी. नासा के मुताबिक, इस मिशन का मकसद सिर्फ अंतरिक्ष की खूबसूरत तस्वीरें लेना नहीं है. रोमन ब्रह्मांड के विशाल हिस्से का सर्वे करेगा और वैज्ञानिकों को यह समझने में मदद करेगा कि आकाशगंगाएं कैसे बनीं, ग्रह प्रणालियां किस तरह विकसित हुईं और ब्रह्मांड का विस्तार आखिर क्यों तेज होता जा रहा है.

इसे नासा की पहली ऐसी प्रमुख अंतरिक्ष वेधशाला माना जा रहा है, जिसे शुरुआत से ही ब्रह्मांड के बड़े हिस्से का तेज गति से सर्वे करने के लिए डिजाइन किया गया है.

हबल के मुकाबले 100 गुना बड़ा नजारा

रोमन की सबसे बड़ी ताकत उसका फील्ड ऑफ व्यू यानी एक बार में अंतरिक्ष के कितने बड़े हिस्से को देखने की क्षमता है. इसका दृश्य क्षेत्र हबल स्पेस टेलिस्कोप से 100 गुना से भी ज्यादा बड़ा होगा. इसका मतलब समझना हो तो एक दिलचस्प तुलना सामने आती है. जिस क्षेत्र का सर्वे करने में हबल को करीब एक सदी लग सकती है, रोमन उसी काम को लगभग एक महीने में पूरा कर सकता है.

यानी हबल हबल और वेब जहां ब्रह्मांड के खास हिस्सों को बेहद बारीकी से देखते हैं, वहीं रोमन बहुत बड़े कैनवास पर एक साथ नजर डालेगा. नासा के वैज्ञानिकों के मुताबिक, अगर हबल और वेब ने ब्रह्मांड को कीहोल से झांककर देखा है, तो रोमन मानो पूरा दरवाजा खोल देगा.

अरबों आकाशगंगाओं का बनेगा 3D नक्शा

रोमन का सबसे बड़ा वैज्ञानिक अभियान ब्रह्मांड का एक विशाल 3D नक्शा तैयार करना होगा. इसके मुख्य सर्वे में एक साल से ज्यादा का समय लग सकता है और इस दौरान दो अरब से अधिक आकाशगंगाओं का अध्ययन किए जाने की उम्मीद है. वैज्ञानिक इन आंकड़ों के जरिए ब्रह्मांड की संरचना और उसके विकास को बेहतर तरीके से समझना चाहते हैं. खासतौर पर उनकी नजर उन दो रहस्यमयी ताकतों पर होगी, जिन्हें डार्क मैटर और डार्क एनर्जी कहा जाता है.

वैज्ञानिकों के मौजूदा अनुमान के मुताबिक सामान्य पदार्थ यानी तारे, ग्रह, गैस और धूल ब्रह्मांड का करीब 5 प्रतिशत ही है. इसके मुकाबले डार्क मैटर लगभग 27 प्रतिशत और डार्क एनर्जी करीब 68 प्रतिशत हिस्से के लिए जिम्मेदार मानी जाती है. लेकिन समस्या यह है कि दोनों को सीधे देख पाना बेहद मुश्किल है.

डार्क मैटर दिखता नहीं, असर जरूर दिखाता है

डार्क मैटर रोशनी को सामान्य पदार्थ की तरह उत्सर्जित या परावर्तित नहीं करता. इसलिए इसे सीधे देखना संभव नहीं है. वैज्ञानिक इसके गुरुत्वाकर्षण प्रभावों से इसके अस्तित्व का अनुमान लगाते हैं. ऐसे में यह रोमन टेलिस्कोप विशाल संख्या में आकाशगंगाओं का अध्ययन करके यह समझने में मदद करेगा कि डार्क मैटर ने समय के साथ ब्रह्मांड की संरचना को किस तरह प्रभावित किया.

दूसरी तरफ डार्क एनर्जी ब्रह्मांड के लगातार तेज होते विस्तार से जुड़ी हुई है. वैज्ञानिक यह जानना चाहते हैं कि आखिर ब्रह्मांड का फैलाव क्यों तेज हो रहा है और इसमें डार्क एनर्जी की भूमिका क्या है.

सिर्फ तारों की दुनिया नहीं, हजारों नए ग्रह भी खोजेगा रोमन

रोमन का मिशन यहीं खत्म नहीं होता. यह हमारे सौर मंडल के बाहर मौजूद बाह्यग्रह (Exoplanets) यानी दूसरे तारों की परिक्रमा करने वाले ग्रहों की भी बड़े पैमाने पर तलाश करेगा.

नासा को उम्मीद है कि इस अभियान में हजारों नए ग्रहों की पहचान हो सकती है. इनमें कुछ बेहद असामान्य और दुर्लभ ग्रह भी हो सकते हैं, जो मौजूदा वैज्ञानिक समझ को चुनौती दें.

वैज्ञानिकों के लिए सबसे महत्वपूर्ण उपलब्धियों में से एक हमारे जैसे ग्रह प्रणालियों की सांख्यिकीय तस्वीर तैयार करना हो सकती है. यानी पहली बार यह बेहतर तरीके से समझने का मौका मिलेगा कि हमारे सोलर सिस्टम जैसी प्रणालियां ब्रह्मांड में कितनी आम या कितनी दुर्लभ हैं.

तारों की रोशनी के पीछे छिपे ग्रहों पर भी नजर

रोमन में एक प्रयोगात्मक कोरोनाग्राफ भी लगाया गया है. यह उपकरण किसी चमकीले तारे की रोशनी को रोकने में मदद करेगा, ताकि उसके आसपास मौजूद बेहद धुंधले ग्रहों को सीधे देखने की कोशिश की जा सके. यह तकनीक खास तौर पर उन ग्रहों की तस्वीर लेने में उपयोगी हो सकती है, जिन्हें उनके अपने तारे की तेज रोशनी के कारण देखना बेहद मुश्किल होता है. यानी रोमन सिर्फ यह नहीं बताएगा कि कोई ग्रह मौजूद है, बल्कि भविष्य में उसके बारे में ज्यादा प्रत्यक्ष जानकारी जुटाने की दिशा में भी रास्ता खोल सकता है.

हबल और वेब के बाद तीसरी बड़ी ‘आंख’

रोमन को हबल और जेम्स वेब का प्रतिस्पर्धी नहीं, बल्कि उनका सहयोगी मिशन माना जा रहा है. हबल ने 1990 से ब्रह्मांड की हमारी समझ को बदलने में बड़ी भूमिका निभाई है, जबकि जेम्स वेब ने 2021 के बाद बेहद दूर और शुरुआती ब्रह्मांड को देखने की क्षमता को नई ऊंचाई दी. रोमन इन दोनों से अलग तरीके से काम करेगा और यह ज्यादा बड़े क्षेत्र का सर्वे करेगा.

यही वजह है कि भविष्य में तीनों टेलीस्कोप मिलकर काम कर सकते हैं. रोमन किसी नए ग्रह या आकाशगंगा की पहचान करेगा तो वेब उसके बारे में और ज्यादा विस्तृत अध्ययन कर सकेगा.

नासा ने रोमन का प्राथमिक मिशन पांच साल के लिए तय किया है. हालांकि इसमें इतना ईंधन रखा गया है कि परिस्थितियां अनुकूल रहीं तो मिशन को करीब पांच साल और बढ़ाया जा सकता है. भविष्य में रोबोटिक टैंकर की सुविधा उपलब्ध होने पर इसे अंतरिक्ष में ईंधन भरने की संभावना भी रखी गई है.

कौन थी नैंसी ग्रेस

इस मिशन का एक खास मानवीय पहलू भी है. नैंसी ग्रेस रोमन टेलिस्कोप का नाम नासा की पहली मुख्य खगोलशास्त्री नैंसी ग्रेस रोमन के नाम पर रखा गया है. वह 1959 में नासा से जुड़ी थीं और अंतरिक्ष आधारित वेधशालाओं को आगे बढ़ाने में उनकी महत्वपूर्ण भूमिका रही. उन्हें हबल स्पेस टेलिस्कोप के विकास के लिए लंबे समय तक याद किया गया और नासा के पूर्व वैज्ञानिक एड वीलर ने उन्हें ‘हबल की मां’ तक कहा. रोमन का निधन 2018 में 93 वर्ष की उम्र में हुआ था. अब उनके नाम पर बनी यह वेधशाला अंतरिक्ष में उनकी विरासत को आगे बढ़ाएगी.

एक दिलचस्प तथ्य यह भी है कि रोमन का करीब 2.4 मीटर व्यास वाला प्राथमिक दर्पण आकार में हबल के दर्पण जितना ही बड़ा है. यह दर्पण मूल रूप से एक जासूसी उपग्रह कार्यक्रम के लिए तैयार किया गया था और बाद में नासा को उपलब्ध कराया गया. अब यही तकनीक ब्रह्मांड के सबसे बड़े सवालों के जवाब तलाशने में इस्तेमाल होगी.

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